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आईआईटी गुवाहाटी में युवा सम्मेलन के साथ आरएसएस शताब्दी वर्ष का आयोजन, राष्ट्र निर्माण और सभ्यतागत दायित्व पर जोर

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आईआईटी गुवाहाटी में युवा सम्मेलन के साथ आरएसएस शताब्दी वर्ष का आयोजन, राष्ट्र निर्माण और सभ्यतागत दायित्व पर जोर
गुवाहाटी, 22 मार्च : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में गुवाहाटी महानगर द्वारा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी में एक ‘युवा सम्मेलन’ का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में शहर के प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों – आईआईटी गुवाहाटी, एम्स गुवाहाटी, राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एनएलयू), नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्यूटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (नाइपर-जी), गुवाहाटी विश्वविद्यालय, कॉटन विश्वविद्यालय, एनआईटी, आईआईआईटी सहित अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों के सैकड़ों विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए इस युवा सम्मेलन को “मिनी भारत” की संज्ञा दी, जहाँ देश की विविधता और एकता विभिन्न शैक्षणिक, भाषाई और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आए युवाओं के माध्यम से प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देती है।
अपने उद्बोधन में श्री होसबाले ने कहा कि भारत की प्रत्येक भाषा राष्ट्रीय भाषा है, जबकि कुछ भारतीय भाषाएँ संपर्क भाषा के रूप में संवाद को सुगम बनाती हैं। उन्होंने संस्कृत को भारतीय भाषाओं की सांस्कृतिक आधारशिला बताते हुए कहा कि संघ की प्रार्थनाएँ, आज्ञाएँ और वाद्य परंपराएँ संस्कृत साहित्य, भारतीय रागों और स्वदेशी सांस्कृतिक विरासत से प्रेरित हैं। वैदिक मंत्र “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत सभी दिशाओं से श्रेष्ठ विचारों का स्वागत करता है, किन्तु अपनी मूल सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहता है।
आधुनिकता पर विचार रखते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिकीकरण को केवल पाश्चात्यकरण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वास्तविक आधुनिकता नवाचार को अपनाने के साथ-साथ शाश्वत सभ्यतागत मूल्यों को बनाए रखने में है। उन्होंने सनातन चिंतन को “नित्य नवीन और चिर पुरातन” बताते हुए कहा कि संघ की स्थापना इन्हीं स्थायी सांस्कृतिक मूल्यों के पुनर्जागरण तथा स्वतंत्रता के दशकों बाद भी संस्थानों और बौद्धिक विमर्शों पर प्रभाव डाल रही औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति के उद्देश्य से हुई थी।
भारत की सभ्यतागत एकता का उल्लेख करते हुए श्री होसबाले ने कालिदास, आदि शंकराचार्य और राम मनोहर लोहिया जैसे विचारकों का संदर्भ दिया। लोहिया के उद्धरण के माध्यम से उन्होंने कहा कि भगवान राम उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ने के प्रतीक हैं, भगवान कृष्ण पूर्व और पश्चिम को जोड़ते हैं, जबकि शिव तत्व सम्पूर्ण भारत की एकात्म चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। पूर्वोत्तर भारत का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि असम आंदोलन के दौरान अवैध घुसपैठ के विरोध में संघ के स्वयंसेवकों ने रचनात्मक भूमिका निभाई, जो राष्ट्रीय विषयों के प्रति उनकी सक्रिय भागीदारी को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि भाषा, परंपरा और जीवनशैली की विविधता समाज को विभाजित करने के बजाय उसे और सशक्त बनाती है, क्योंकि साझा सांस्कृतिक चेतना राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधती है।
उन्होंने निःस्वार्थ राष्ट्रभक्ति, सामाजिक संगठन और चरित्र निर्माण के महत्व पर बल देते हुए कहा कि संतुलित विकास के लिए व्यक्तिगत और राष्ट्रीय चरित्र दोनों आवश्यक हैं। भौतिक प्रगति और आध्यात्मिक मूल्यों का उन्नयन साथ-साथ चलना चाहिए। स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यदि भौतिक आवश्यकताएँ पूरी न हों तो सांस्कृतिक विमर्श अधूरा रह जाता है।
राष्ट्रीय परिवर्तन के संदर्भ में उन्होंने व्यवस्था परिवर्तन और सामाजिक परिवर्तन दोनों की आवश्यकता पर बल दिया, जिससे जाति, पंथ, जनजाति या भाषा के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त किया जा सके। उन्होंने ‘पंच परिवर्तन’ की धारणा का उल्लेख करते हुए भारतीय परिवार व्यवस्था के संरक्षण, पर्यावरण के प्रति दैनिक जीवन में उत्तरदायित्व, सामाजिक समरसता के सुदृढ़ीकरण, नागरिक अनुशासन के विकास तथा शिक्षा, उद्योग और विकास मॉडल में ‘स्व’ की भावना को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया।
पूर्वोत्तर भारत के संदर्भ में उन्होंने कहा कि यहाँ की जनजातीय परंपराएँ विविधता में एकता का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करती हैं और साझा सांस्कृतिक भाव को प्रतिबिंबित करती हैं। उन्होंने कहा कि यूनिटी का अर्थ यूनिफ़ॉर्मिटी नहीं, बल्कि एकता तथा समरसता हमारी विविधता को शक्ति में बदलती हैं। असम के युवा आंदोलनों का उल्लेख करते हुए उन्होंने युवाओं से सेवा और सामाजिक पहल के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।
संवाद सत्र के दौरान श्री होसबाले ने हिंदुत्व, धर्मनिरपेक्षता, जनसांख्यिकीय परिवर्तन, आरक्षण नीति, नशा-समस्या और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रश्नों के उत्तर दिए। उन्होंने कहा कि राज्य को सभी उपासना पद्धतियों के प्रति समान व्यवहार करना चाहिए और धार्मिक मामलों में तुष्टिकरण के बजाय निष्पक्षता बनाए रखनी चाहिए। नशा-समस्या पर उन्होंने सामाजिक जागरूकता के साथ अंतरराष्ट्रीय तस्करी नेटवर्क के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की आवश्यकता पर बल दिया।
आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस और डिजिटल परिवर्तन के युग में “मानसिक उपनिवेशवाद से मुक्ति” का आह्वान करते हुए उन्होंने आधुनिक तकनीकों को अपनाने के साथ स्वदेशी दृष्टि और सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़े रहने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि जो भी व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से राष्ट्र के लिए कार्य करता है, वही स्वयंसेवक की भावना का प्रतिनिधित्व करता है, चाहे उसका औपचारिक संगठनात्मक संबंध हो या नहीं।
अपने संबोधन के समापन में उन्होंने युवाओं से राष्ट्र विकास में सक्रिय योगदान देने का आह्वान करते हुए कहा कि भारत की सभ्यतागत दृष्टि मानवता के मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है और नैतिक मूल्यों तथा सामाजिक उत्तरदायित्व पर आधारित सामूहिक प्रयास ही एक सशक्त और समरस राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।
इस कार्यक्रम में आरएसएस असम क्षेत्र संघचालक डॉ. उमेश चक्रवर्ती, गुवाहाटी महानगर संघचालक श्री गुरु प्रसाद मेधी, विभिन्न शिक्षण संस्थानों के प्रमुख, प्राध्यापकगण तथा गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

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