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उधारबंद शिक्षा सदन हायर सेकेंडरी स्कूल में विविध कार्यक्रमों के साथ गरिमामय आयोजन किया गया।

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बराक घाटी के (बराक उपत्यका बंग साहित्य संस्कृति सम्मेलन) की उधारबंद आंचलिक समिति द्वारा अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर उधारबंद शिक्षा सदन हायर सेकेंडरी स्कूल में विविध कार्यक्रमों के साथ गरिमामय आयोजन किया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत कृतिम शहीद वेदी पर पुष्पांजलि अर्पित कर भाषा शहीदों को श्रद्धांजलि देने से हुई। इस अवसर पर जिला समिति के सह-सभापति ब्रजेश्वर सिंह, केंद्रीय समिति के पूर्व सदस्य अकमल अली बरभुइया, कार्तिक राय, आंचलिक समिति के सभापति भास्कर दास, सचिव नुरुल हुदा, सह-सचिव (प्रशासनिक) किशोर भट्टाचार्य, सह-सचिव (संगठनात्मक) मृन्मयी पुरकायस्थ, सांस्कृतिक संपादिका जया चक्रवर्ती, कोषाध्यक्ष अबुल हुसैन बरभुइया, सह-सभानेत्री ऊषा रानी सिंह, निहार कांति राय सहित अन्य पदाधिकारियों ने श्रद्धासुमन अर्पित किए।

कार्यक्रम में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने विशेष आकर्षण पैदा किया। उद्घाटन गीत अर्पिता राय ने प्रस्तुत किया। आमंत्रित कलाकार कार्तिक राय एवं अनिमा दत्ता ने सुमधुर संगीत से वातावरण को भावपूर्ण बना दिया। समिति के कलाकारों द्वारा नृत्य प्रस्तुति भी दी गई।

चर्चा सत्र की शुरुआत जिला सह-सभापति ब्रजेश्वर सिंह ने की। इसके बाद सभापति भास्कर दास, सामान्य सचिव नुरुल हुदा, अकमल अली बरभुइया, कार्तिक राय, मृन्मयी पुरकायस्थ, किशोर भट्टाचार्य, अबुल हुसैन बरभुइया, बिजन बिहारी चक्रवर्ती एवं सह-सभापति निहार कांति राय सहित वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए।

वक्ताओं ने मातृभाषा के संरक्षण और संवर्धन पर विशेष बल देते हुए कहा कि प्रत्येक जाति की पहचान उसकी भाषा से होती है। भाषा माँ के दूध के समान है। इतिहास साक्षी है कि जब-जब भाषा पर आघात हुआ, तब-तब लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी। वर्ष 1952 में तत्कालीन पाकिस्तान सरकार द्वारा उर्दू को थोपने के विरोध में आंदोलन करने पर सलाम, बरकत, जब्बार सहित अनेक भाषा सेनानी शहीद हुए।

बराक घाटी में भी 19 मई 1961 को 11 भाषा शहीदों ने बलिदान दिया। इसके अतिरिक्त 1972 में बिजन चक्रवर्ती, 1986 में जगन्मय देव एवं दिव्येंदु दास, तथा 1996 में सुदेष्णा सिन्हा ने भाषा आंदोलन में अपने प्राण न्योछावर किए।

वक्ताओं ने कहा कि भाषा हमारी अस्मिता और आत्मपरिचय का आधार है, किंतु आज की युवा पीढ़ी में मातृभाषा के प्रति अपेक्षित सम्मान और ममत्व का अभाव चिंताजनक है। इसी उद्देश्य से बराक उपत्यका बंग साहित्य संस्कृति सम्मेलन युवा वर्ग में मातृभाषा के प्रति जागरूकता और अध्ययन-चर्चा को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयासरत है।

कार्यक्रम का समापन मातृभाषा के संरक्षण और संवर्धन के संकल्प के साथ हुआ।

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