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लघु कथा
कर्म और भक्ति से बदलता है भाग्य
कथा बहुत प्राचीन है। एक गृहस्थ किसान एक सिद्धि प्राप्त ऋषि से मानव की ललाट पर विधाता द्वारा लिखी भाग्य को पढ़ने की विधा सीखी। ऋषि मुनि ने यह विधा सिखाने के साथ- साथ यह भी बताया कि विधाता द्वारा लिखी भाग्य किसी भी सुरत मे नही बदलता है। एक दिन की बात है, गरमी का दिन था गरमी अधिक होने के कारण किसान धूप निकलने से पहले अपने खेत मे हल जोत रहा था तभी जमीन से मानव मस्तिष्क कंकाल मिला उस मस्तिष्क कंकाल के ललाट पर लिखा था। मरने के बाद इस मस्तिष्क को अच्छी तरह कुचला जाएगा परन्तु यह मस्तिष्क अभी तक सही सलामत थी। किसान को ऋषि मुनि की बात याद आई कि भाग्य का लिखा कभी बदलता नही है फिर यह मस्तिष्क सही सलामत कैसे है ? इसके भाग्य मे लिखे अनुसार यह कुचला हुआ नही है क्यो ? इन सब बातों का उत्तर जानने के उद्देश्य से कंकाल मस्तिष्क को ऋषि के पास ले जाने का निर्णय लिया। उसने अपने लाल गमछा मे उस कंकाल मस्तिष्क को अच्छी तरह बांधकर घर लाया और अपने पत्नी को हिदायत देते हुए कहा कि इस लाल गमछा को छुना तक नही,फिर स्नान और नश्ता कर यह सोचकर विश्राम करने लगा कि धूप कम होने के बाद उक्त कंकाल मस्तिष्क को ऋषि के पास ले जाएगे थोड़ी देर में ही थके हारे किसान को नींद लग गई। किसान की पत्नी सोची आखिर इस लाल गमछा मे क्या है कि मुझे छुने तक मना किए है? मै देखती हूं। किसान की पत्नी ने गमछा को खोलते ही अवाक रह गई और बोली बाप रे बाप! कंकाल मस्तिष्क से ओझा गुनी सिख रहे है इसलिए आजकल बात – बात मे सनक जाते है, इनका उपाय आज हम करती हूँ। उसने कंकाल मस्तिष्क को ओखली मे अच्छी तरह कुचल कर बाहर कचरा मे फेक दी और बोली ” ना रहेगा बाँस ना बाजेगी बांसुरी। ” किसान नींद से उठा और बंधा हुआ लाल गमछा खोजने लगा न मिलने पर अपने पत्नी से पुछा पत्नी ने क्रोधित मुद्रा में बोली आजकल आप ओझा गुनी सिखते है उस कंकाल मस्तिष्क को ओखली मे कुचलकर फेक दिए। किसान ने मन ही मन मे बोला उत्तर मिल गया अब ऋषिवर के पास जाने की आवश्यकता नहीं है। फिर पत्नी से बोला ओझा गुनी सिखने की बात नहीं है । तुम कुचलकर फेक दी , बहुत अच्छा की। अब बात खत्म करो। इस कथा से हमे यही ज्ञात होता है कि भाग्य का लिखा बदलता नही है परन्तु धार्मिक मान्यता के अनुसार मनुष्य अपने कर्म और भक्तिभाव से अपने भाग्य को बदल सकता है। धन, दौलत,पद, प्रतिष्ठा, रिश्ता – नाता सबकुछ, मनुष्य जबतक जिन्दा है तबतक काम आ भी सकता है लेकिन मरने के बाद साथ नही जाता है परन्तु एक मात्र सदकर्म और ईश्वर के प्रति भक्तिभाव ही साथ जाता ही नही बल्कि अगले जन्म में भी साथ निभाता है। इसलिए हमे सदकर्म और भक्तिभाव करते रहना चाहिए, भाग्य स्वयं करवट बदलेगी।
पवन कुमार शर्मा (शिक्षक)
दुमदुमा (असम)
मो.नं. 9954327677





















