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कुमार भास्कर वर्मा सेतु : अटल, अविचल, अग्रगामी असम की झलक – डॉ. हिमंत विश्व शर्मा

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कुमार भास्कर वर्मा सेतु : अटल, अविचल, अग्रगामी असम की झलक – डॉ. हिमंत विश्व शर्मा

वर्मन वंश के अंतिम राजा कुमार भास्कर वर्मा ने 594 ईस्वी से (कुछ लोगों के अनुसार 600 ईस्वी से) 650 ईस्वी तक कामरूप पर शासन किया था। कुमार भास्कर वर्मा कामरूप के सबसे प्रसिद्ध और सम्मानित शासक थे। कामरूप के राजा होने के बावजूद, कुमार भास्कर वर्मा सदैव एक अखिल भारतीय तथा विश्वमुखी दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़े। कुमार भास्कर वर्मा के शासनकाल में उनके निमंत्रण को स्वीकार करने हुए 640 ईस्वी से 643 ईस्वी के बीच प्रसिद्ध चीनी यात्री हिउवेंन सांग असम अर्थात प्राचीन कामरूप आए थे और उन्होंने अपने यात्रा-वृत्तांत में कामरूप के संबंध में अनेक महत्वपूर्ण तथ्य उल्लेखित किए हैं। कामरूप की मिट्टी की उर्वरता तथा कृषि के उगयोगिता, यहाँ के लोगों का कृषि कार्य से जुड़ा होना, प्राचीन कामरूप की सिंचाई व्यवस्था, नदी या बाँध से नहरें निकालकर नगरों के चारों ओर जल उपलब्ध कराने की व्यवस्था, कामरूप की समशीतोष्ण जलवायु, लोगों की सरलता, विद्या-अध्ययन के प्रति रुचि और उनकी स्मरण शक्ति, उनकी देव-पूजा की परंपरा, विद्यानुरागियों का दूर-दूर से कामरूप आना — इन सभी विषयों का वर्णन हिउवेंन सांग की यात्रा-वृत्तांत मिलता है। उस अर्थ में, असम को पहली बार विश्व समुदाय के समक्ष परिचित कराने का श्रेय महान शासक कुमार भास्कर वर्मा को जाता हैं। हिउवेंन सांग की यात्रा वृतांत में यह भी उल्लेख है कि वे शासक विद्यानुरागी थे और उनकी प्रजा उनका अनुसरण करती थी। यह यात्रा-वृत्तांत असम के संबंध में एक विश्वसनीय ऐतिहासिक दस्तावेज है।

उत्तर भारत में कुमार भास्कर वर्मा का प्रभाव

अखिल भारतीय तथा विश्वमुखी दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ते हुए कुमार भास्कर वर्मा ने प्राचीन भारत के उत्तरी भाग के समकालीन महापराक्रमी राजा हर्षवर्धन के साथ मित्रता स्थापित की थी और कूटनीतिक और सैन्य गठबंधन बनाया था। प्रख्यात पराक्रमी हर्षवर्धन का शासनकाल भारत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। कुमार भास्कर वर्मा ने सम्राट हर्षवर्धन के साथ कूटनीतिक संबंध बनाए रखते हुए एक-दूसरे को काफी सम्मान और महत्व दिया था। हर्षवर्धन के बड़े भाई राज्यवर्धन की हत्या करने वाले गौड़ के राजा शशांक को हर्षवर्धन के साथ मिलकर पराजित कर कुमार भास्कर वर्मा ने कामरूप की सीमाओं का विस्तार उत्तर बंगाल तक किया था। इसके अतिरिक्त दक्षिण-पूर्व बंगाल, सिलेट और त्रिपुरा भी उनके शासनकाल में कामरूप के अंतर्गत थे, ऐसा हिउवेंन सांग के वृत्तांत से ज्ञात होता है। उन्होंने यह भी लिखा है कि चीन देश जाने वाला समुद्री मार्ग कामरूप के राजा के अधीन था। कुमार भास्कर वर्मा के शासनकाल में असम की कीर्ति समस्त भारत में फैल गई थी और वह काल असम के इतिहास का स्वर्णिम युग था। अविवाहित रहने के कारण “कुमार राजा” के रूप में भी विख्यात कुमार भास्कर वर्मा के शासन ग्रहण करने के समय से ही असमिया कैलेंडर (भास्कराब्द) की गणना प्रारंभ हुई। आज हम सरकारी रूप से इसी कैलेंडर का उपयोग कर रहे हैं।

महाधिराज हर्षवर्धन ने कन्नौज में प्रसिद्ध चीनी यात्री हिउवेंन सांग के सम्मान में आयोजित धर्मसभा में कामरूप के सम्राट कुमार भास्कर वर्मा को सर्वाधिक सम्मानित आसन पर बैठाया था। इस अवसर पर निकाली गई विशाल धार्मिक शोभायात्रा में महाधिराज हर्षवर्धन भगवान ‘इंद्र’ के वेश में तथा सम्राट कुमार भास्कर वर्मा ‘ब्रह्मा’ के वेश में एक ही पंक्ति में चल रहे थे। अन्य सभी उनके पीछे थे। वहाँ हर्षवर्धन के अधीन अठारह राजा, बीस राजकुमार, लगभग तीन हजार बौद्ध पंडित तथा समान संख्या में ब्राह्मण एकत्रित हुए थे। वहां कुमार भास्कर वर्मा को इस प्रकार प्राथमिकता देना यह दर्शाता है कि, उस समय कामरूप के सम्राट का स्थान और मर्यादा विशिष्ट थी और उनका प्रभाव तथा महत्व असीम था।

प्राचीन कामरूप में प्राचीन काल से ही एक सुव्यवस्थित, शक्तिशाली और जिम्मेदार शासन व्यवस्था थी – इसका प्रमाण कुमार भास्कर वर्मा द्वारा प्रदत्त ताम्रपत्र प्रस्तुत करते हैं। सम्राट कुमार भास्कर वर्मा के पास 30 हजार नौकाओं सहित विशाल नौसेना और 20 हजार हाथियों सहित कुशल सेना थी। एक जिम्मेदार शासक के रूप में उन्होंने कामरूप की सुरक्षा को विशेष महत्व दिया और इस मामले में कोई समझौता नहीं किया।

कुमार भास्कर वर्मा के समय में कामरूप की समृद्धि

उनके समय में प्राचीन कामरूप की आर्थिक स्थिति काफी समृद्ध थी। कुमार भास्कर वर्मा के समय कामरूप में बाँस-बेंत के सामग्री, पाट-मूगा के वस्त्र, अगर से सुगंधित द्रव्य, गन्ने से गुड़ आदि के उत्पादन साथ साथ बर्तन और स्वर्ण आभूषण निर्माण की विभिन्न उद्योग थे। कुमार भास्कर वर्मा द्वारा दूत हंसवेग के माध्यम से महाराज हर्षवर्धन को भेजे गए उपहारों की सूची से यह स्पष्ट होता है। इस सूची में ‘अभगा’ एक नामक अद्भुत छतरी, बाँस-बेंत की चटाइयां, रेशमी थैले में अगर से निर्मित सुगंध, विभिन्न बर्तन, मिट्टी के पात्रों में तरल गुड़, पाट-मूगा के वस्त्र आदि सम्मिलित थी। उपहार की इस सूची में सांची के पत्तों की पांडुलिपियाँ और चित्र भी शामिल थे। अर्थात कामरूप साहित्य और कला का भी केंद्र था।

असम के राजनीतिक इतिहास में जिन लोगों ने बाहरी आक्रमणों के विरुद्ध उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की थी उनमें कुमार भास्कर वर्मा का प्रतिरोध संग्राम सदा स्मरणीय रहेगा। अतुलनीय विद्वता, सैन्य शक्ति और युद्धक्षेत्र में आक्रमण एवं गठबंधन की अद्वितीय रणनीति प्रदर्शित करने वाले इन सातवीं शताब्दी के राजा से आज भी हम साहस और प्रतिरोध की क्षेत्र में प्रेरणा लेते हैं। जिस समय असम के स्थानीय लोग बाहरी लोगों की धार्मिक आक्रमणों के कारण अपनी भाषा, संस्कृति और भूमि खोने की आशंका से जूझ रहे हैं, ऐसे एक कठिन समय में साहसपूर्वक प्रतिरोध संघर्ष चलाने में कुमार भास्कर वर्मा का अपराजेय संघर्ष हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है।

कामरूप के इस महान शासक के नाम पहले ही नलबाड़ी में एक राज्य विश्वविद्यालय की स्थापित किया जा चुका है तथा इस बार राज्य सरकार ने ब्रह्मपुत्र पर नव-निर्मित गुवाहाटी-उत्तर गुवाहाटी को जोड़ने वाले सुंदर सेतु को कुमार भास्कर वर्मा के नाम पर समर्पित किया है। सेतु का नाम होगा – कुमार भास्कर वर्मा सेतु

सेतु निर्माण की पृष्ठभूमि

2016 में असम में पहली बार भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए सरकार का गठन हुआ और मुझे गुवाहाटी विकास विभाग का मंत्री बनाया गया। मैंने सिंगापुर की सरकारी संस्था सुरबाना जुरोंग (Surbana Jurong) को गुवाहाटी आमंत्रित किया और उन्हें ब्रह्मपुत्र पर नियोजित दो पुलों के वास्तुशिल्प डिजाइन तैयार करने की जिम्मेदारी दी। ये दो सेतु पलाशबाड़ी-सुवालकुची तथा गुवाहाटी-उत्तर गुवाहाटी को जोड़ने वाले थे। सुरबाना जुरोंग द्वारा हमारी योजना संभव होने की पुष्टि के बाद, हमने आवश्यक धन की व्यवस्था कैसे की जाए, इस पर चर्चा और विचार-मंथन शुरू किया। उस समय मैं असम सरकार के वित्त मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाल रहा था। हमने केंद्रीय वित्त मंत्रालय के माध्यम से ब्रिक्स (BRICS) डेवलपमेंट बैंक से भी परिचित “न्यू डेवलपमेंट बैंक” से संपर्क किया। ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका – इन पांच राष्ट्र की इस अंतरराष्ट्रीय बैंक ने परियोजना के लिए वित्त स्वीकृत किया। यह न्यू डेवलपमेंट बैंक द्वारा समर्थित असम और पूर्वोत्तर का पहला परियोजना है।

शर्तों के अनुसार बैंक सेतु के लिए 80 प्रतिशत और राज्य सरकार 20 प्रतिशत धन देगी तथा बैंक द्वारा दी गई राशि राज्य सरकार को नहीं, बल्कि केंद्र सरकार को लौटानी होगी। अर्थात, लगभग तीन हजार करोड़ रुपये की लागत से बने इस सेतु में लगभग दो हजार करोड़ भारत सरकार और लगभग एक हजार करोड़ असम सरकार ने व्यय किए हैं।

इस सेतु ने दक्षिण और उत्तर गुवाहाटी को नगर के मध्य भाग से जोड़कर लंबे समय की आवश्यकता पूरी की। यह सेतु यात्रा की समय कम करने के साथ साथ और ट्रैफिक जाम की समस्या भी दूर करेगा। क्योंकि इससे पहले दोनों तटों के यात्री के लिए केवल सराइघाट सेतु ही एकमात्र मार्ग था। अब हैदराबाद-सेकंदराबाद और अहमदाबाद-गांधीनगर की तरह दो महानगर विकसित करना संभव होगा। बढ़ती आबादी के कारण गुवाहाटी की वहन क्षमता स्वाभाविक रूप से कम हो रही है और ऐसे में महानगर के विस्तार का कोई विकल्प नहीं है, यह निश्चित है। नया पुल उस आवश्यकता को भी पूरा करेगा।

तकनीकी पक्ष

इस सेतु के कई नए पहलू हैं। यह सेतु लगभग 33 मीटर चौड़ा और छह लेन युक्त है। वाहनों के अलावा पैदल यात्रियों के लिए भी फुटपाथ रखा गया है। सराइघाट के पुराने और नए दोनों सेतु मिलाकर कुल पाँच लेन हैं, जबकि यह एक ही सेतु छह लेन का है। 200 मीटर लंबे स्पेन जोड़कर और ब्रह्मपुत्र के मध्य स्तंभों की संख्या कम कर निर्माणकार्य के लिए एक्स्ट्राडोज्ड तकनीक का उपयोग किया गया है। सेतु से जुड़े सहायक केबल्स इसकी भार क्षमता बढ़ाते हैं। मुख्य सेतु की लंबाई 1.2 किमी है। भूकंप सुरक्षा हेतु “फ्रिक्शन पेंडुलम बेयरिंग” तकनीक से युक्त यह देश का दूसरा एक्स्ट्राडोज्ड सेतु है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसका निर्माण असम लोक निर्माण विभाग ने किया है — यह अत्यंत गर्व का विषय है। इससे पहले ब्रह्मपुत्र पर बने पुलों में से कोई भारतीय रेलवे द्वारा बनाया गया था, तो कोई भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) द्वारा बनाया गया था। पहली बार असमिया इंजीनियरों, अधिकारियों-कर्मचारियों और श्रमिकों ने ऐसा विश्व स्तरीय पुल बनाया है। असम सरकार की निर्माण संस्था लोक निर्माण विभाग ही पलाशबाड़ी-सुआलकुची को जोड़ने वाले 3.6 किलोमीटर लंबे चार लेन वाले एक्स्ट्राडोज्ड पुल का निर्माण कार्य भी कर रही है। पहले यह कल्पना से परे था। यह नए असम के बेजोड़ आत्मविश्वास का परिणाम है।

प्रधानमंत्री का आगमन

9 फरवरी, 2019 को देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने इस गुवाहाटी-उत्तर गुवाहाटी लिंक सेतु की शिलान्यास किया था। वही प्रधानमंत्री 14 फरवरी, 2026 को इस सेतु का उद्घाटन करेंगे। जनता के लिए आधिकारिक तौर पर खुलने के बाद, 28 फरवरी तक पुल केवल पैदल चलने वालों के लिए खुला रहेगा। इस दौरान असम की जनता पुल पर पैदल चलकर वहां से दिखाई देने वाले मां कामाख्या धाम, नीलाचल पहाड़ सहित गुवाहाटी और महाबाहु ब्रह्मपुत्र की अपूर्व प्राकृतिक सुंदरता का आनंद ले सकेंगे। बाद में वाहनों की यातायात शुरू होगी। पुल के उद्घाटन के दिन ही प्रधानमंत्री जी ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट,गुवाहाटी’ (IIM)की आधारशिला की स्थापना भी करेंगे।

संभावनाओं से भरा असम

निसंदेह यह असम के लिए एक स्वर्णिम युग है। असम और उत्तर-पूर्व के प्रति अटूट प्रेम और गहरी जिम्मेदारी के साथ प्रधानमंत्री जी ने इस क्षेत्र की तेजी विकास के लिए जो कुछ भी किया है, उसके लिए असम की जनता की ओर से उन्हें धन्यवाद और आभार व्यक्त करने के साथ-साथ असम में उनका स्वागत करता हूँ। आज हम जो असम देख रहे हैं, हमारी संभावनाएं उससे कहीं अधिक हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा उद्घाटन किया गया गुवाहाटी के लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का सुंदर और विश्व स्तरीय नया टर्मिनल आगामी 22 फरवरी से चालू हो जाएगा। कुछ दिनों बाद गुवाहाटी में रिंग रोड बनेगा। ब्रह्मपुत्र पर नारंगी-कुरुवा और पलाशबाड़ी-सुआलकुची को जोड़ने वाले सेतुओं सहित चार और नए सेतु होंगे। थोड़ा आगे बढ़ने पर जागीरोड का सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट और काजीरंगा में 34 किलोमीटर का एलिवेटेड कॉरिडोर है। उसके बाद नुमलीगढ़ और गोहपुर के बीच ब्रह्मपुत्र के नीचे से रेल और सड़क यातायात के लिए दोहरी सुरंग सड़क होगी। इसके अलावा, विस्तारित नुमलीगढ़ तेल रिफाइनरी, चौथी इकाई के साथ सक्रिय नामरूप उर्वरक कारखाना आदि आधुनिक असम की पहचान हैं।

यह अटल, अविचल, अग्रगामी असम का प्रतिबिंब है। हम सभी को मिलकर असम की इस अनिरुद्ध गति को जारी रखना ही होगा। प्राचीन काल में कुमार भास्कर वर्मा जैसे महान सम्राट द्वारा दिखाए गए विश्व-उन्मुख दृष्टिकोण के साथ हमें असम को आगे ले जाना ही होगा।

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