कोलकाता में प्रकाशित हुआ विप्लव चक्रवर्ती का उपन्यास ‘उन्नीस पैसे की सिनेमा’
कोलकाता।
गीत, साहित्यिक चर्चा और कविता पाठ के माध्यम से विप्लव चक्रवर्ती द्वारा लिखित उपन्यास ‘उन्नीस पैसे की सिनेमा’ का भव्य लोकार्पण कोलकाता में संपन्न हुआ। कार्यक्रम को सुपर्णा दत्त की मधुर संगीत प्रस्तुति ने एक सांस्कृतिक ऊँचाई प्रदान की। मंच पर उपस्थित विशिष्ट साहित्यकारों के कर-कमलों से प्रसिद्ध साहित्यकार सैयद हसमत जलाल ने उपन्यास का औपचारिक विमोचन किया।
कार्यक्रम की संकल्पना और साहित्यिक सूत्रधार कवयित्री एवं संपादक मीता दास पुरकायस्थ रहीं। उन्होंने कहा कि बराक घाटी की पत्रिका ‘नया दिगंत’ में जब यह उपन्यास धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ था, तब इसने बड़ी संख्या में नए पाठकों का ध्यान आकर्षित किया। पाठकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया के कारण ही इसे पुस्तक रूप में प्रकाशित करने की प्रेरणा मिली। उन्होंने बताया कि नक्सल आंदोलन की पृष्ठभूमि में एक विस्थापित परिवार की असहायता को ऐतिहासिक संदर्भों के साथ उपन्यास में प्रभावी ढंग से उकेरा गया है।
‘अथ-पथ’ पत्रिका के संपादक साधन चंद्र चंद नाथी ने अपने विस्तृत वक्तव्य में বাংলা भाषा के क्रमिक विकास पर प्रकाश डालते हुए मंगलकाव्य और मनसामंगल काव्य के उदाहरणों के माध्यम से विप्लव चक्रवर्ती के लेखन की साहित्यिक परंपरा से तुलना की। उन्होंने उपन्यास की विषयवस्तु पर श्रोताओं का विशेष ध्यान आकर्षित किया और प्रसंगवश बंकिमचंद्र, शरतचंद्र तथा समकालीन साहित्य पर भी अपने विचार रखे।
बौद्धिक मंच के अध्यक्ष डॉ. नृसिंहमुरारी दे ने कहा कि विप्लव चक्रवर्ती के लेखन में ऑफबीट विषय बार-बार नए शिल्प और दृष्टिकोण के साथ उभरते हैं। उन्होंने कहा कि विप्लव की कहानियाँ और उपन्यास उन्हें अत्यंत प्रभावित करते हैं।
‘उन्नीस मई’ पत्रिका के संपादक विश्वजीत राय ने कहा कि उन्होंने विप्लव की कविताएँ पढ़ी हैं और कुछ कहानियाँ भी उन्हें काफी पसंद आई हैं। विप्लव का लेखन सरल, सहज और प्रभावी है। वे अनावश्यक जटिल भाषा से बचते हैं। उपन्यास की विषयवस्तु ने उन्हें इसे पढ़ने के लिए उत्सुक कर दिया है।
कार्यक्रम के अध्यक्ष, वरिष्ठ साहित्यसेवी एवं संपादक सैयद हसमत जलाल ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में বাংলা भाषा और बांग्ला भाषी समाज की पहचान से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रकाश डाला। उन्होंने असम में বাংলা भाषा के मुद्रित साहित्य के आँकड़ों के उदाहरण प्रस्तुत करते हुए मीता दास पुरकायस्थ के प्रकाशन कार्य को ‘वैचारिक रूप से क्रांतिकारी’ बताया और उसकी सराहना की।
कार्यक्रम में देवश्री दे और दिशा चट्टोपाध्याय ने अपनी स्वरचित कविताओं का पाठ किया। संपूर्ण आयोजन बौद्धिक मंच के तत्वावधान में नया दिगंत प्रकाशनी द्वारा आयोजित किया गया, जबकि कार्यक्रम का संचालन मीता दास पुरकायस्थ ने किया।




















