टिकट बंटवारे के बाद असम बीजेपी में उठते सवाल और सियासी संदेश
असम विधानसभा चुनाव 2026 के लिए भारतीय जनता पार्टी द्वारा उम्मीदवारों की सूची जारी होते ही राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। टिकट वितरण की प्रक्रिया, जो किसी भी दल के लिए रणनीतिक संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है, इस बार कई स्तरों पर असंतोष और आंतरिक खींचतान को उजागर करती नजर आ रही है।
सबसे पहले, टिकट से वंचित रहे नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराज़गी खुलकर सामने आई है। कई जगहों पर पार्टी कार्यालयों में विरोध, इस्तीफे और बगावती तेवर देखने को मिले हैं। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत असंतोष का मामला नहीं है, बल्कि यह उस जमीनी कार्यकर्ता की पीड़ा भी दर्शाती है, जिसने वर्षों तक पार्टी के लिए काम किया और अब खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है।
दूसरी ओर, पार्टी नेतृत्व ने टिकट वितरण में ‘विजय की संभावना’ को प्राथमिकता देने की रणनीति अपनाई है। इसमें जातीय समीकरण, स्थानीय लोकप्रियता, संगठनात्मक पकड़ और पिछले चुनावी प्रदर्शन जैसे कारकों को ध्यान में रखा गया है। लेकिन यही गणित कई पुराने चेहरों के लिए राजनीतिक असहजता का कारण बन गया है।
असम की राजनीति में क्षेत्रीय संतुलन, विशेषकर बराक और ब्रह्मपुत्र घाटी के बीच, हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। यदि किसी एक क्षेत्र या समुदाय को उपेक्षित महसूस होता है, तो उसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है। वर्तमान परिस्थितियों में बराक घाटी से उठ रही असंतोष की आवाजें पार्टी के लिए चिंता का विषय बन सकती हैं।
इसके अलावा, विपक्षी दलों के लिए यह एक अवसर के रूप में उभर रहा है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दल इस असंतोष को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करेंगे। यदि भाजपा समय रहते इन नाराज़ नेताओं को साधने में सफल नहीं होती, तो यह बगावत चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकती है।
हालांकि, यह भी सच है कि चुनावी राजनीति में टिकट वितरण के बाद असंतोष कोई नई बात नहीं है। मजबूत संगठन और प्रभावी नेतृत्व अक्सर ऐसी स्थितियों को संभालने में सक्षम होते हैं। भाजपा के पास भी राज्य में एक सशक्त संगठनात्मक ढांचा और नेतृत्व है, जो स्थिति को नियंत्रित करने की क्षमता रखता है।
अंततः, असम विधानसभा चुनाव 2026 में टिकट वितरण के बाद की स्थिति यह संकेत देती है कि चुनाव केवल विपक्ष से मुकाबला नहीं, बल्कि भीतर की चुनौतियों से पार पाने की भी परीक्षा है। भाजपा के लिए यह समय संगठनात्मक एकता बनाए रखने और असंतुष्ट नेताओं को साथ लेकर चलने का है।
यदि पार्टी इस संतुलन को साधने में सफल होती है, तो वह चुनावी मैदान में मजबूत स्थिति में रह सकती है; अन्यथा, यह आंतरिक असंतोष विपक्ष के लिए एक निर्णायक हथियार बन सकता है।


















