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टिकट बंटवारे को लेकर उधारबंद में मंथन, राजदीप ग्वाला के नाम पर बढ़ती सहमति”

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प्रेरणा भारती | उधारबंद

असम विधानसभा चुनाव की सरगर्मियाँ तेज़ हो चुकी हैं। जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहा है, वैसे-वैसे विभिन्न दलों में टिकट को लेकर गतिविधियाँ बढ़ती जा रही हैं। उधारबंद विधानसभा क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। इस बार उधारबंद में सत्तारूढ़ दल भाजपा के लिए उम्मीदवार चयन एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।

डीलिमिटेशन के बाद उधारबंद में मतदाताओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिसके कारण दावेदारों की संख्या भी बढ़ गई है। वर्तमान में भाजपा में लगभग 15 संभावित उम्मीदवारों के नाम चर्चा में हैं, जिनमें दो को बाहरी उम्मीदवार माना जा रहा है। चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहा है, राजनीतिक समीकरण भी तेज़ी से बदल रहे हैं।

राजनीतिक सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत विश्व शर्मा ने उधारबंद में संगठन को मज़बूती देने के उद्देश्य से एक नए और ऊर्जावान चेहरे के रूप में राजदीप ग्वाला को आगे लाने का प्रयास किया था। राजदीप ग्वाला को एक कर्मठ, संगठननिष्ठ और विकासोन्मुख नेता के रूप में देखा जा रहा है, जिनकी प्रशासनिक समझ और जनता से सीधा संवाद स्थापित करने की क्षमता पार्टी के लिए लाभकारी हो सकती है।

हालाँकि, उम्मीदवार चयन को लेकर स्थानीय और बाहरी उम्मीदवारों के बीच मतभेद उभरकर सामने आए, जिससे पार्टी के भीतर असंतोष की स्थिति बनी। कुछ नेताओं द्वारा अलग-अलग स्तर पर जनसंपर्क अभियान चलाए गए, जो अब एक साझा मंच पर आकर पार्टी हित में आगे बढ़ने की बात कर रहे हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि पार्टी जिसे भी उम्मीदवार बनाएगी, वे उसका समर्थन करेंगे—बशर्ते निर्णय संगठन और क्षेत्र के व्यापक हित को ध्यान में रखकर लिया जाए।

दो बार के विधायक मिहिर कांत सोम भी पुनः टिकट के दावेदार हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लगातार दो कार्यकाल के बाद क्षेत्र में आंशिक सत्ता-विरोधी माहौल बन चुका है। ऐसे में पार्टी के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह समय की मांग को समझे और नए नेतृत्व को अवसर दे।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यदि भाजपा उधारबंद में एक नए, स्वीकार्य और कार्यकर्ता-प्रिय चेहरे को मैदान में उतारती है, तो वह न केवल आंतरिक असंतोष को कम कर सकती है, बल्कि विपक्ष को भी मज़बूत चुनौती दे सकती है। इस संदर्भ में राजदीप ग्वाला का नाम एक ऐसे नेता के रूप में सामने आता है, जो संगठन और जनता—दोनों के बीच संतुलन स्थापित करने की क्षमता रखते हैं।

अब सबकी निगाहें भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर टिकी हैं—कि वह उम्मीदवार चयन में जनमत और जमीनी हकीकत को कितना महत्व देता है। उधारबंद की जनता भी इसी फैसले के इंतज़ार में है कि अंततः विकास, संगठनात्मक मजबूती और क्षेत्रीय स्वीकार्यता को प्राथमिकता देकर किसे मैदान में उतारा जाता है.

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