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तिरंगा पूछता है!
यह तिरंगा जब लहराता है,
तो सिर्फ़ हवा से नहीं लहराता—
यह लहू से उठी हुंकार है,
जो हर नागरिक से पूछ जाता—
बताओ!
क्या अब भी देश तुम्हारी आदत है,
या सिर्फ़ अवसर की सियासत है?
शहीदों ने माँ से वादा तोड़ा,
पर वतन से कभी नहीं डोले,
हँसते-हँसते प्राण चढ़ा दिए,
और हम…?
हमने क्या उनके सपने तोले?
क्या गणतंत्र केवल तारीख़ है?
या रोज़ निभाई जाने वाली शपथ है?
सरहद पर जो जाग रहा है,
उसकी नींद हमारे नाम है,
पर शहरों में जो सोए बैठे,
क्या वे भी इस देश के काम हैं?
कफ़न ओढ़े खड़ा सिपाही पूछे—
जब देश जले, तब तुम कहाँ थे?
तुमने सच का साथ दिया था,
या भीड़ में शामिल बस खड़े थे?
देश बचता है हथियारों से,
या चरित्र की दीवारों से?
यह भारत है—
जहाँ मज़हब नहीं, मनुष्य पहले है,
जहाँ विविधता बोझ नहीं,
यही इसकी सबसे बड़ी ताक़त है।
फिर क्यों बाँटने वाले हाथों को
हम ताली देकर बढ़ाते हैं?
और जोड़ने वाले दीपों को
क्यों हवा में बुझ जाने देते हैं?
विकास की बात बहुत होती है,
पर विवेक साथ क्यों नहीं चलता?
गणतंत्र कोई विरासत नहीं
जो तिजोरी में बंद रखी जाए,
यह रोज़-रोज़ की साधना है,
जो आचरण में उतर जाए।
अगर आज चुप रहे हम सब,
तो कल इतिहास पूछेगा—
तुम्हारे पास तिरंगा था,
पर क्या तुम्हारे पास साहस भी था?
तो उठो!
तिरंगे की लाज बचानी है,
शहीदों की नींद बचानी है।
यह भारत माँ का प्रश्न है—
और इसका उत्तर
हमें अपने जीवन से लिखना है!
जय हिंद! 
जय भारत! 
हरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव
मौलिक, स्वरचित
२६-०१-२०२





















