57 Views
परावर्तन के योद्धा राजेश्वर जी
भारतवर्ष के सभी मुसलमानों व ईसाइयों के पूर्वज हिन्दू हैं। उन्हें अपने पूर्वजों के पवित्र धर्म में वापस लाने के महान कार्य को अपने जीवन का लक्ष्य बनाने वाले श्री राजेश्वर जी का जन्म 16 फरवरी, 1916 को दिल्ली में श्री भगवानदास जी के घर में हुआ था। वे कक्षा में सदा प्रथम आते थे।
धनाभाव के कारण पिताजी ने इन्हें कक्षा दस के बाद पढ़ाने से मना कर दिया; पर इनके बड़े भाई श्री लुभाया राम के आग्रह पर पिताजी मान गये और फिर राजेश्वर जी ने ट्यूशन पढ़ाते हुए बी.एस-सी. किया। उन दिनों छुआछूत और जन्मना जातिभेद का जोर था; पर इन्होंने अपनी मां और भाभी को समझाकर रसोई में एक सफाईकर्मी के बेटे को काम पर रखा। इससे पड़ोसियों ने दो वर्ष तक इनके घर से खानपान का बहिष्कार किया।
1934 में इन्होंने पचकुइया मार्ग पर देखा कि एक मुसलमान कुएं से पानी लेकर हरिजन महिलाओं की बाल्टियों में डाल रहा है। साथ ही वह उनसे गन्दे मजाक भी कर रहा था। उन दिनों हरिजन कुएं की मुंडेर पर अपने घड़े नहीं रख सकते थे। यह देखकर राजेश्वर जी प्रतिदिन वहां आकर घड़ों में पानी भरने लगे। इस पर उस मुसलमान से झगड़ा भी हुआ; पर राजेश्वर जी डटे रहे और फिर धीरे-धीरे वे महिलाएं स्वयं ही कुएं से पानी लेने लगीं।
उन दिनों सफाईकर्मी सिर पर मैला ढोकर ले जाते थे। 1939 में राजेश्वर जी शिमला में रहते थे। उन्होंने एक दिन सफाईकमियों के नेता सोहनलाल के साथ खाना बनाकर खाया। उसने बताया कि हिन्दुओं के व्यवहार से दुखी होकर वे सब धर्मान्तरण करने वाले थे; पर अब वे यह नहीं करेंगे। पहाड़गंज (दिल्ली) में अंधविश्वास के कारण कई हिन्दू महिलाएं नमाज से लौटते हुए मुसलमानों से बच्चों के मुंह पर फूंक लगवाती थीं। राजेश्वर जी ने अपने मित्रों के साथ ‘हिन्दू धर्म संघ’ नामक संस्था बनाकर इस कुप्रथा को बन्द कराया।
राजेश्वर जी कालबाह्य हो चुकी रूढ़ियों के विरोधी थे। 1941 में उन्होंने प्रतीकात्मक दहेज लेकर अन्तरजातीय विवाह किया। इसके लिए जानबूझ कर वह तिथि चुनी, जिसमें विवाह वर्जित है। इसके बाद आर्य समाज के माध्यम से उन्होंने बड़ी संख्या में अन्तरजातीय और दहेज रहित विवाह कराये।
1946 में पहाड़गंज में मुसलमानों ने बकरीद पर गाय का जुलूस निकालकर उसे काटने की योजना बनाई। राजेश्वर जी ने अपने भाई बंसीलाल तथा एक स्वयंसेवक पूरनचंद के साथ उस जुलूस पर हमला कर गाय को छुड़ा लिया।
राजेश्वर जी सभी सामाजिक व धार्मिक संस्थाओं में सक्रिय रहते थे। वे दक्षिण दिल्ली के विभाग संघचालक थे। 1983 में वि.हि.प. की बैठक में एक कार्यकर्ता ने कहा कि सब हिन्दुओं को एक-एक हरिजन महिला को बहिन बनाना चाहिए। राजेश्वर जी उसी दिन राममनोहर लोहिया अस्पताल की एक सफाईकर्मी महिला शान्तिदेवी को अपनी धर्म बहिन बनाकर घर लौटे।
राजेश्वर जी हिन्दुओं की घटती जनसंख्या से बहुत दुखी रहते थे। इसके लिए वे छुआछूत मिटाने और परावर्तन की गति बढ़ाने पर जोर देते थे। उन्होंने चार पूर्णकालिक कार्यकर्ता रखकर सैकड़ों मुसलमानों और ईसाइयों को समझाकर, बिना लालच के हिन्दू बनाया। कई हिन्दू कन्याओं को मुसलमानों के चंगुल में फंसने से भी बचाया।
उन्होंने कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण के लिए ‘परावर्तन क्यों और कैसे’ नामक पुस्तक लिखी। उन्होंने अपनी पूरी सम्पत्ति अपने और पत्नी के नाम पर बनाये ‘राजेश्वर चंद्रकांता धर्मार्थ न्यास’ के नाम कर दी, जिससे उन दोनों के देहांत के बाद भी परावर्तन कार्य में बाधा न आये।
कहने की बजाय करने में अधिक विश्वास रखने वाले परावर्तन के इस महान योद्धा का देहांत 11 फरवरी, 1999 को हुआ।





















