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बाबा

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बाबा
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बाबा बहुत ज़्यादा बातें नहीं करते थे।
बाबा बहुत कम ही बोलते थे।
बाबा मतलब शनिवार रात का इंतज़ार, पेट्रोल के धुएँ की गंध, देवदार के पेड़ों की शालीनता, दूर्वा घास पर टिकी ओस की बूँदों को चीरकर आती धूप के मोती,
या दस रुपये की चॉकलेट में लिपटी सुनहरी पन्नी की गरिमा।

।।

बाबा से बहुत से अभिमान हैं,
बाबा से बहुत से सवाल हैं,
या फिर बाबा के लिए मेरे भीतर जमा
अपर्याप्त-सी एक बूँद गुस्सा है।

बाबा ने हमें स्वार्थी होना क्यों नहीं सिखाया!
बाबा ने लोगों को माफ़ करना क्यों सिखाया!
बाबा ने बाबा जैसे जज़्बात महसूस करना क्यों सिखाया!

उस दिन अगर लौटते समय लाई चॉकलेट
बाबा चुपके से सिर्फ़ हमें ही खिला देते,
तो शायद मैं स्वार्थ सीख जाती।

झमाझम बारिश में अगर बाबा काम पर न जाते,
तो बारिश में भीगकर अच्छा लगना
शायद मैं भी सीख जाती।

मैंने प्यार से दिए पचास रुपये
अगर मोबाइल कवर के भीतर संभालकर
मेरे नाम से मंदिर में दान न किए होते,
तो शायद मैं ईश्वर से डरना नहीं सीखती।

बिहू–पूजा में सामर्थ्य भर
ज़्यादा बनियान–चूड़ियाँ लाकर
‘बाबुकाका’ या ‘केराला काका’ को देकर
किसी को कुछ दे पाने की जो खुशी सिखाई—
अगर वो न सिखाते,
तो शायद आज मेरे खाते में
दो पैसे ज़्यादा जमा होते।

फटे केसरिया रंग के सादे कपड़े
धुलवाकर, शादी–बिहू–पूजा में
अगर बाबा न पहनते,
तो शायद ठाठ–बाट मुझे आकर्षित करता।

बाबा की वजह से
मैं बहुत कुछ नहीं सीख पाई।
बाबा की वजह से
मैं इंसानों को पहचान नहीं पाई।

बाबा की वजह से ही
जिन लोगों ने मुझे चोट पहुँचाई,
उनसे बदला लेना
मैं नहीं सीख पाई।

बाबा की वजह से ही
सीने में एक गाँठ पत्थर बाँधकर
जो भी चीज़, इंसान या अपना
चला जाना चाहता था,
उसे खींचकर अपना बना रखने में
मैं असफल रही।

सब कहते हैं, मैं बाबा जैसी हूँ।
‘बाबा की बेटी’ कहलाने पर
माँ के मन के किसी कोने में
ईर्ष्या का एक टुकड़ा
न होना संभव नहीं।

लेकिन बाबा से मेरा अफ़सोस यही है—
मैं बाबा जैसी बन नहीं पाई।

बाबा की तरह चुपचाप
आँसू बहाना नहीं सीख पाई।
बाबा की तरह
शिकायतों को दबाकर रखना
नहीं सीख पाई।

बाबा की तरह
इतनी धैर्यवान, उदार,
कोमल, निष्पाप
मैं बन नहीं पाई।

मैं बाबा की तरह निष्पाप
होने में असफल रही।
मैं बाबा की आँखों-सी
पवित्र नहीं बन पाई।

…..

वि.सू.:
मैं बाबा को शिव की तरह देखती हूँ।
नीलकंठ की तरह।

विष पीकर चलते रहने की तरह
हर दिन विष पीना
मैंने भी आदत बना लिया है—
बिलकुल बाबा की तरह,
शिव की तरह।

बाबा ने मेरे सामने
कभी एक बूँद भी
आँसू नहीं बहाए,
तो मैं बाबा की तरह
आँसू दबाना क्यों नहीं सीख पाई?

शिव की तरह प्रतीक्षा करना
मैंने सीख लिया,
लेकिन इतने सवालों के उत्तर ढूँढकर
प्यार करने वालों के बिछोह में
अफ़सोस न करना
क्यों नहीं सीख पाई?

— बबिता बोरा

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