फॉलो करें

बिहार प्रदेश प्रेम की अद्भुत और अमर कहानियों की धरती  है, एक मजदूर से लेकर वरिष्ठ नेता तक प्रेम कहानी की पटकथा लिखें हैं 

27 Views
बिहार प्रदेश प्रेम की अद्भुत और अमर कहानियों की धरती  है, एक मजदूर से लेकर वरिष्ठ नेता तक प्रेम कहानी की पटकथा लिखें हैं 
————————————
वेलेंटाइन डे स्पेशल स्टोरी
अनिल मिश्र/पटना
बिहार प्रदेश  प्रेम की अद्भुत और अमर कहानियों की धरती है, जहाँ दशरथ मांझी द्वारा पत्नी की याद में बाईस साल तक पहाड़ काटकर रास्ता बनाने (माउंटेन मैन) जैसी मिसाल, मधुबनी के 60 वर्षीय बुजुर्ग की अनोखी शादी, और मोतिहारी में पत्नी के लिए पैंसठ लाख का मंदिर बनवाने जैसी प्रेम दास्तानें मौजूद हैं।  जहां गया जिले के दशरथ मांझी की अमर प्रेम कहानी  अपनी पत्नी ‘फगुनिया’ के प्रेम में पागल दशरथ मांझी ने बाईस सालों की कड़ी मेहनत से गया की गहलौर घाटी में पहाड़ का सीना चीरकर रास्ता बना दिया। पत्नी की मृत्यु के बाद यह जुनून उन्हें ‘माउंटेन मैन’ बना गया। वहीं मोतिहारी का अनोखा मंदिर: बालकिशुन राम ने अपनी पत्नी शारदा देवी की याद में एक मंदिर बनवाया, जहाँ आज भी हर सुबह-शाम चाय और भोग अर्पित किया जाता है। उन्होंने अपनी पत्नी के त्याग को भगवान के बराबर माना है। जबकि मधुबनी का अनोखा विवाह: मधुबनी के फुलपरास में 60 वर्षीय ठकाई यादव ने अपनी बुजुर्ग महिला मित्र के साथ प्रेम विवाह रचाया, जिसने इलाके में खूब चर्चा बटोरी। वहीं अररिया की अजब प्रेम कहानी: अररिया में एक युवक द्वारा अपनी प्रेमिका के लिए पूरे गाँव की बिजली काट देने की घटना सामने आई, जिसे बाद में गिरफ्तार कर लिया गया।सियासी प्रेम कहानियों में बिहार प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव-राबड़ी देवी वहीं वर्तमान प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार-मंजू सिन्हा जैसी जोड़ियां  के अलावा दिवंगत उपमुख्यमंत्री और राज्य सभा सदस्य रहे सुशील मोदी और ईसाई धर्म से ताल्लुक रखने वाली जेसी  जॉर्ज भी बिहार की जानी-मानी प्रेम कहानियों में शुमार हैं, जो राजनीतिक और निजी जीवन के उतार-चढ़ाव में साथ रहीं।आइए शुरू करते हैं बिहार प्रदेश के पिछड़े जिलों में शुमार और एक दिहाड़ी मजदूर और समाज में सबसे बेहद गरीब एवं हाशिये पर रहने वाले मुसहर जाति से आने वाले प्यार की यह अद्भुत कहानी रचने वाले और एक प्रेम कहानी में अलग पटकथा लिखने वाले बिहार के गया जिले के गहलौर घाटी की है।गहलौर के दशरथ मांझी ने अपनी पत्नी के प्रेम में ऐसा जुनून दिखाया कि दुनिया हैरान रह गई। गया के पहाड़ी क्षेत्र के गहलौर गांव की यह कहानी आज प्यार करने वालों के लिए एक उदाहरण है।साथ ही यह परिभाषा भी कि सच्चा प्रेम क्या होता है। दशरथ मांझी अपने हाथों से बाईस सालों तक उस पहाड़ की चट्टानों को काटते रहे, जहां उनकी पत्नी फगुनिया की मौत हुई थी। एक सामान्य मजदूर से दशरथ मांझी के माउंटन मैन बनने का सफर उनकी पत्नी फगुनिया के ज़िक्र किए बिना अधूरा है। दरअसल वर्ष 1959 में  दशरथ  मांझी एक मजदूर थे।पहाड़ों पर जाकर काम करते थे। पत्नी फाल्गुनी देवी (फगुनिया देवी) उनके लिए रोज उबड़-खाबड़ पहाड़ के रास्ते खाना और पानी लेकर आया करती थी। सन् 1959 में उस दिन रोज की तरह पत्नी फाल्गुनी देवी अपने पति दशरथ मांझी के लिए खाना और पानी लेकर पहाड़ के रास्ते जा रही थी। उसी वक्त उनका पैर फिसला।पैर फिसलते ही फाल्गुनी का घड़ा फूटा और गंभीर चोट लगी।इस बीच नजदीक का अस्पताल करीब पचपन से साठ किलोमीटर दूरी पर था। गहलौर और जिद्दी पहाड़ की वजह से मांझी की फगुनिया को वक्त पर इलाज नहीं मिल सका और वो  इह लोक छोड़कर चल बसीं। इस घटना से  दशरथ मांझी काफी आहत हुए। इसके बात यहीं से शुरू हुआ दशरथ मांझी का इंतकाम। सन् 1960 से 1982 के बीच दशरथ मांझी के दिल और दिमाग में बस एक ही बात थी कि पत्नी फगुनिया की मौत का बदला पहाड़ से लेना है। उसके बाद एक दिन नहीं, एक सप्ताह नहीं,  एक महीने नहीं, एक साल नहीं बल्कि पूरे बाईस सालों तक छेनी और हथौड़ी पहाड़ को काटने के लिए चलाई और 360 फीट ऊंचा और 30 फीट चौड़ा पहाड़ काट डाला।जिसके कारण आज गया जिले के गहलौर घाटी की पहचान आज अपने देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों तक है।गहलौर घाटी में प्रेम की परिभाषा को समझने के लिए देश से ही नहीं बल्कि विदेशों से भी लोग आते हैं। देश विदेश से आने वाले यहां की प्रेम कहानी जानकर हैरान रह जाते हैं। ऐसी अद्भुत प्रेम कहानी की पटकथा लिख देने वाले दशरथ मांझी के समाधि स्थल को नमन करना नहीं भूलते। कई तो ऐसे हैं, जो इस प्रेम कहानी को शाहजहां और मुमताज की प्रेम के प्रतीक ताजमहल से भी बड़ा मानते हैं।फगुनिया के लिए दशरथ मांझी के इस मजबूत इरादों को सिनेमा और किताबों में भी उतारा गया।साल 2015 में रिलीज ‘मांझी: द माउंटेन मैन’ को आज ग्यारह साल पूरे हो गए हैं।इस फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दीकी, राधिका आप्टे लीड रोल में थे। एक रिपोर्ट की माने तो केतन मेहता के डायरेक्शन में इस फिल्म ने अभी तक पन्द्रह करोड़ से ऊपर तक की कमाई है।वहीं बिहार प्रदेश के मोतिहारी में चार बेटों और एक बेटी का यह संयुक्त परिवार आज भी उसी प्रेम की छांव में एकजुट है। मोतिहारी का यह मंदिर अब महज ईंट-पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि मोहब्बत की वह जीवंत तस्वीर है, जहां इश्क सजदा बन गया है और यादें इबादत। बिहार की मिट्टी से इस वैलेंटाइन डे पर ऐसी मोहब्बत की खुशबू उठी है, जिसने हर दिल को नम कर दिया। पूर्वी चंपारण जिले के चकिया प्रखंड अंतर्गत भुवन छपरा गांव में एक सेवानिवृत्त पंचायत सचिव ने अपनी दिवंगत पत्नी की याद में पैंसठ लाख रुपये की लागत से भव्य मंदिर बनवाकर प्रेम, त्याग और समर्पण की ऐसी मिसाल कायम की है, जो इश्क़ को इबादत बना देती है।बालकिशुन राम जब अपनी दास्तान सुनाते हैं, तो आवाज़ भर्रा जाती है। बचपन में पिता का साया उठ गया था। पढ़ाई छूट गई। मगर शारदा देवी ने अपने गहने बेचकर उनका दोबारा नामांकन करवाया। खुद मजदूरी की, घर संभाला और पति को आगे बढ़ने का हौसला दिया। संघर्षों की राह पर चलते-चलते बालकिशुन पंचायत सचिव बने और इस मुकाम के पीछे पत्नी का त्याग खामोश नींव की तरह खड़ा रहा। वो ‘मार्कीन’ की साड़ी पहनती थीं वही कपड़ा जिसे मारवाड़ी दुकानदार दुकान में बिछाते हैं। मगर कभी शिकवा नहीं किया। मां का कर्ज़ कोई नहीं चुका सकता, लेकिन मेरी पत्नी ने मां से भी बढ़कर मेरे लिए किया।शारदा देवी 2007 से दिल की बीमारी, शुगर और उच्च रक्तचाप से जूझ रही थीं। इलाज चलता रहा, मगर किस्मत को कुछ और मंज़ूर था।बालकिशुन कहते हैं, मैंने भगवान को नहीं देखा, लेकिन भगवान के रूप में मेरी पत्नी मेरे सामने थीं।आज भी हर सुबह-शाम मंदिर में दीप जलता है। प्रतिमा के सामने चाय का कप रखा जाता है क्योंकि उन्हें चाय पसंद थी। दोपहर का भोग और रात का भोजन भी श्रद्धा से अर्पित किया जाता है।मंदिर में किसी देवी-देवता की मूर्ति नहीं, बल्कि उनकी जीवनसंगिनी शारदा देवी की आदमकद प्रतिमा स्थापित है। वर्ष 2022 में हार्ट अटैक से शारदा देवी का निधन हो गया था ठीक उस वक्त, जब उनके पति बालकिशुन राम की सेवानिवृत्ति में महज छह महीने बचे थे। अचानक आई इस जुदाई ने उनकी दुनिया उजाड़ दी। तन्हाई और ग़म के साए में डूबे बालकिशुन ने ठान लिया कि रिटायरमेंट पर मिली करीब पैंसठ लाख रुपये की पूरी राशि वो अपनी पत्नी की याद को अमर करने में लगा देंगे।करीब तीन वर्षों की मेहनत और इंतज़ार के बाद यह मंदिर बनकर तैयार हुआ। इसका उद्घाटन बिहार सरकार के पर्यटन मंत्री राजू कुमार सिंह ने किया। तब से यह मंदिर इलाके में श्रद्धा और चर्चा का केंद्र बन गया है। जबकि बिहार के दिवंगत उपमुख्यमंत्री और राज्य सभा सांसद रहे  सुशील मोदी और जेसी जॉर्ज की प्रेम कहानी बेहद दिलचस्प है।जिस दौर में बिहार में प्रेम विवाह को सामाजिक मान्यता न के बराबर मिली थी उस दौर में सुशील मोदी ने दूसरे धर्म को मानने वाली लड़की से प्रेम विवाह करने का फैसला लिया। दरअसल सुशील मोदी और जेसी जॉर्ज दोनों अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े थे। मुंबई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का मुख्यालय हुआ करता था। सुशील मोदी बैठक में शामिल होने मुंबई गए थे।तभी वहीं से सुशील मोदी को मुंबई से कश्मीर जाना पड़ा और इस दौरान ट्रेन में सुशील मोदी की मुलाकात सामने बैठी एक लड़की से होती है।पुस्तक प्रेम ने सुशील मोदी और जेसी मोदी को एक दूसरे से करीब लाया।जब शादी तय हुई तो उसमें शामिल होने के लिए संघ के तमाम नेता पहुंचे, जिसमें नानाजी देशमुख, भाऊराव देवरस, अटल बिहारी वाजपेयी भी शामिल रहे। संघ की शाखा के बगल के मैदान में ही शादी समारोह संपन्न हुआ था। हालांकि अब सुशील मोदी जी और उनकी पत्नी इस दुनिया में नहीं है। लेकिन बिहार प्रदेश में एक मजदूर से लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, सैय्यद शहनाज हुसैन और पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव भी प्रेम कहानी की पटकथा लिखने में सफल रहे हैं।

Share this post:

Leave a Comment

खबरें और भी हैं...

लाइव क्रिकट स्कोर

कोरोना अपडेट

Weather Data Source: Wetter Indien 7 tage

राशिफल