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भाषा मे निखालसता हो। 

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भाषा मे निखालसता हो। 
धरा पर मनुष्य के पास भाषा ही एक ऐसा माध्यम है जिसके जरीये हम अपने मन की भाव को एक दुसरे के साथ आदान – प्रदान कर सकते है। भाषा संयमित और विनम्र होना चाहिए। भाषा एक ऐसा अस्त्र है जिससे आग लग सकती है और बुझ भी सकती है। आग लगना और बुझना  यह सब भाषा के संयम और प्रयोग पर निर्भर करता है। भाषा से व्यवहार झलकता है और व्यवहार से यह पता चलता है कि व्यक्ति सिर्फ पाला गया है कि परिवार मे संस्कार भी मिला है। भाषा मे स्पष्टता, सरलता,शुद्धता, विनम्रता होनी चाहिए तथा कटु भाषा का परहेज होना चाहिए क्योंकि हम जानते है कि गोली का घाव समय बितने पर भर जाता है परन्तु कटु बोली का घाव जल्द नही भरता है इसलिए संत कबीर दास जी भी अपने प्रसिद्ध दोहे मे लिखे है कि ” ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय औरन को शीतल करे आपहुं   शीतल होय। ” भाषा अर्थात बोली ही एक ऐसा अचुक शस्त्र है जो बड़ा – बड़ा संघर्ष को शांतिपूर्ण ढंग से स्थायी समाधान कर  सदभावना ला सकता है। भाषा मे अहंकार का आगमन  व्यक्ति का पतन का कारण बन जाता है। अत्याचारी,दुराचारी तथा आतताइयों आदि अपवाद है उन्हें जिस भाषा मे समझ आए उसे उसी भाषा मे समझाना आवश्यक है परन्तु समाज मे हठी तथा अहंकारी व्यक्ति को धौंस या चेतावनी देने की आवश्यकता पड़ जाए तो हमें मर्यादित भाषा का ही प्रयोग करने का संभवतः प्रयत्न करना चाहिए। मर्यादित एवं संयमित भाषा समाज मे लोगों को जोड़ने का कार्य करती है इसलिए हमे मर्यादित भाषा का प्रयोग करना चाहिए ताकि हमारा समाज एकत्रित, संगठित होकर  सुरक्षित महसूस कर सके और भावी पीढ़ी भी सुरक्षित हो सके।
पवन कुमार शर्मा  (शिक्षक)
दुमदुमा  (असम)
मो. नं. 9954327677

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