मातृभाषा, भारतीय चिंतन और भाषाई विविधता का सम्मान — 21 फरवरी की प्रासंगिकता
भारत विविध भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं का देश है। यहाँ यह भावना गहराई से निहित है कि “भारत की हर भाषा हमारी अपनी भाषा है।” व्यक्ति जहाँ भी रहे, वहाँ की भाषा को अपनाना और अपनी मातृभाषा को पूर्ण रूप से जानना–समझना, यही भारतीय चिंतन की मूल भावना है।
भारतीय दर्शन—चाहे उसे भारतीय दर्शन कहें, वैदिक परंपरा या हिंदू चिंतन—सदैव समन्वय, सह-अस्तित्व और सामूहिक सुख की बात करता आया है। “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की भावना हमारे सांस्कृतिक मूल में रही है। विविधता में एकता का विचार हमारी परंपरा का आधार है। जैसे हाथ की पाँचों उँगलियाँ अलग-अलग होते हुए भी एक मुट्ठी बनाती हैं, वैसे ही भारत की अनेक भाषाएँ और संस्कृतियाँ मिलकर राष्ट्र की एकता को सशक्त बनाती हैं।
भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि किसी समाज की जीवनशैली, कला, परंपरा, खान-पान, पर्यावरण और भावनात्मक संसार की अभिव्यक्ति है। राजस्थान और उत्तर-पूर्व भारत की भौगोलिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परिस्थितियाँ भिन्न हैं, इसलिए उनकी भाषाएँ भी अलग स्वरूप लिए हुए हैं। एक भाषा की सांस्कृतिक अनुभूति को दूसरी भाषा में पूर्णतः व्यक्त करना सदैव संभव नहीं होता।
उदाहरणस्वरूप, “श्रीकृष्ण राधा की बांसुरी चुरा लेते हैं” जैसे वाक्य को यदि नवद्वीप या मायापुर की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में समझा जाए तो यह भक्ति और माधुर्य से भर जाता है। किंतु जब वही भाव किसी विदेशी भाषा में अनुवादित होता है, तो उसकी सांस्कृतिक गहराई और भावनात्मक रस पूर्णतः व्यक्त नहीं हो पाता। इसीलिए क्षेत्रीय भाषाओं का संरक्षण और संवर्धन आवश्यक है।
आज के समय में वैश्विक प्रभाव और पश्चिमी विचारधाराओं के प्रसार के बीच भारतीय चिंतन की मूल भावना को समझना और संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। शिक्षा संस्थानों और समाज के प्रबुद्ध वर्ग की जिम्मेदारी है कि वे युवा पीढ़ी को समन्वय, सह-अस्तित्व और सांस्कृतिक आत्मगौरव का पाठ पढ़ाएँ।
अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की पृष्ठभूमि
ने 17 नवंबर 1999 को 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मान्यता प्रदान की। यह घोषणा 1999 में आयोजित 30वें आम सम्मेलन में 188 देशों के समर्थन से की गई।
इस दिवस का पहला वैश्विक आयोजन 21 फरवरी 2000 को हुआ। बाद में 2002 में ने प्रस्ताव संख्या 56/262 के माध्यम से इसे औपचारिक मान्यता दी।
इस पहल की पृष्ठभूमि में कनाडा निवासी दो बांग्लाभाषी— और —का प्रारंभिक प्रस्ताव तथा बांग्लादेश सरकार के प्रयास महत्वपूर्ण रहे।
यह दिवस 21 फरवरी 1952 को ढाका में मातृभाषा बांग्ला के सम्मान में अपने प्राण न्यौछावर करने वाले भाषा शहीदों की स्मृति में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य भाषाई और सांस्कृतिक विविधता की रक्षा करना तथा बहुभाषिकता को प्रोत्साहित करना है।
भारत जैसे बहुभाषी राष्ट्र में यह दिवस हमें स्मरण कराता है कि मातृभाषा का सम्मान, स्थानीय भाषाओं का संरक्षण और अन्य भाषाओं का आदर—इन्हीं के संतुलन में राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक समृद्धि निहित है।
– प्रशांत महाराज




















