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” मेरा अभिलाषा “
बोल सिखा दूं गूंगों को आवाजों मे
पर नही है जीभ
जिंदा हूँ पर ठहरा जनाजों मे॥
दिखाऊँ अंधे को उजाले नजारों मे
पर नही है ज्योति
भटक गया हूँ काले अंधकारो मे ॥
चलना सिखा दूं लंगड़े को पहाड़ो मे
पर नही बैसाखी
रो रहा हूँ गिरकर हजारों मे॥
लाऊँ डूबे बन्दे को किनारो मे
पर नही है कश्ती
फंसा हूँ बीच मझधारो मे॥
पिलाऊं दुश्मनों को प्रेमरस ख्वाबों मे
पर नही है जाम
डूबा हूँ ईर्ष्या के सैलाबों मे॥
सिखाऊं हैवानो को इंसानियत बातों में
पर नही है शब्द
लूटा हूँ हिंसा की काली रातो मे॥
पवन कुमार शर्मा ( शिक्षक)



















