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राजनीतिक विवाद का हथियार न बनें-राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम्।

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पिछले कुछ समय से राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम् ‘ पर खूब चर्चाएं हो रहीं हैं। वास्तव में ‘वंदे मातरम्’ कोई साधारण गीत नहीं है। यह भारत की आज़ादी की लड़ाई का सबसे बड़ा प्रतीक रहा है। इसे 1875 में बंकिमचंद्र चटर्जी ने लिखा था और बाद में अपने उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया। ‘वंदे मातरम्’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, जिसमें ‘वंदे’ का अर्थ है-‘मैं वंदना करता हूँ, प्रणाम करता हूँ।’ तथा ‘मातरम्’ का मतलब ‘माता को’ से है।इस प्रकार ‘वंदे मातरम्’ का शाब्दिक अर्थ है- ‘मैं माता को प्रणाम करता हूं।’ पाठकों को बताता चलूं कि यहाँ ‘माता’ से आशय ‘भारत माता’ से है। बहरहाल,जब हमारा देश गुलाम था, तब यही गीत लोगों को लड़ने की ताकत देता था। इसी को गाते हुए कई क्रांतिकारी हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़ गए थे। गौरतलब है कि 1905 में बंगाल विभाजन के समय यह(वंदे मातरम् ) अंग्रेजों के खिलाफ जन-आंदोलन का नारा बन गया था। अंग्रेज सरकार इस गीत से इतनी डर गई थी कि सरकार ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया था। उस दौर में वंदे मातरम् हिंदू या मुस्लिम का नहीं, बल्कि पूरे भारत की आज़ादी का नारा था।लेकिन बाद में कुछ मुस्लिम नेताओं ने यह कहकर इसका विरोध शुरू किया कि इसमें भारत माता को देवी मानकर पूजा जैसा भाव है, जो इस्लाम के नियमों के खिलाफ है और यहीं से इस गीत पर धार्मिक विवाद शुरू हुआ। 1937 में कांग्रेस ने समझदारी दिखाते हुए तय किया कि वंदे मातरम् की केवल पहले दो ही पैराग्राफ राष्ट्रगीत माने जाएँ, क्योंकि उनमें केवल भारत की सुंदरता, प्रकृति और गौरव का वर्णन है, किसी देवी-देवता का नहीं। यहां पाठकों को बताता चलूं कि 24 जनवरी 1950 को, जब जन गण मन को भारत का राष्ट्रीय गान (नेशनल ऐनथम) घोषित किया गया था, उस समय राजेन्द्र प्रसाद ने कहा कि वंदे मातरम-‘ जिसने स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है- को भी उतना ही सम्मान मिलना चाहिए जितना राष्ट्रीय गान को मिलता है।’ उन्होंने स्पष्ट किया कि वंदे मातरम और जन गण मन- दोनों को समान दर्जा दिया जाए। डॉ राजेन्द्र प्रसाद के स्वयं के शब्दों में कहें तो -‘जन-गण-मन’ शब्दों और धुन से युक्त रचना भारत का राष्ट्रीय गान होगी।‘वंदे मातरम’, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, उसे भी जन-गण-मन के समान ही सम्मान और समान दर्जा प्राप्त होगा।’ दूसरे शब्दों में कहें तो 1950 में जन-गण-मन को राष्ट्रगान बनाया गया और ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगीत का सम्मान मिला, लेकिन इसे कानूनन गाना अनिवार्य नहीं किया गया। वास्तव में, भारत के संविधान में वंदे मातरम् को गाने की कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है। अक्सर इसे अनुच्छेद 51 से जोड़कर देखा जाता है, जबकि वास्तविक प्रावधान अनुच्छेद 51(क) में निहित है, जो नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख करता है। इसमें राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ का सम्मान करना नागरिकों का कर्तव्य बताया गया है, लेकिन वंदे मातरम् राष्ट्रगान नहीं, बल्कि राष्ट्रगीत है। इसलिए इसे गाना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट भी स्पष्ट कर चुका है कि किसी व्यक्ति को उसकी आस्था, अंतरात्मा और धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) के विरुद्ध किसी गीत को गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। हाँ, यह अवश्य अपेक्षित है कि वंदे मातरम् का अपमान न किया जाए और उसका सम्मान किया जाए, क्योंकि यह देश की स्वतंत्रता-चेतना और राष्ट्रभाव का प्रतीक है। बहरहाल,आज भी कुछ नेता यह कहते हैं कि ‘वंदे मातरम्’ गाने के लिए किसी को मजबूर नहीं किया जा सकता। इसी कारण यह गीत बार-बार राजनीतिक विवाद का हथियार बन जाता है। वास्तव में, ‘वंदे मातरम्’ को राजनीतिक विवाद का हथियार बनाना न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि इसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व के साथ अन्याय भी है। यह गीत किसी एक वर्ग, धर्म या दल का नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम से उपजी राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है। इसे जबरन थोपने या इसके आधार पर लोगों की देशभक्ति पर सवाल खड़े करने की प्रवृत्ति समाज में वैमनस्य बढ़ाती है। राष्ट्रप्रेम का संबंध भावनाओं से होता है, दबाव से नहीं। इसलिए वंदे मातरम् जैसे पवित्र गीत को राजनीतिक स्वार्थों से दूर रखकर उसे सम्मान, समावेश और सद्भाव का प्रतीक बनाए रखना ही सच्ची राष्ट्रसेवा है।सरल शब्दों में कहें तो ‘वंदे मातरम्’ किसी धर्म का नहीं, बल्कि देश की आज़ादी, संघर्ष और बलिदान का प्रतीक है। आज जब भारत आगे बढ़कर महाशक्ति बनना चाहता है, तब ऐसे अनावश्यक और बनावटी विवाद देश को कमजोर करते हैं। अब इसकी 150वीं जयंती पर 8-9 दिसंबर 2025 को संसद में 10 घंटे तक चर्चा होनी है, तो यह अवसर है कि इस विवाद को हमेशा के लिए खत्म किया जाए।

सुनील कुमार महला

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