फॉलो करें

वनवासियों के हितैषी राजा विजयभूषण सिंहदेव

10 Views
11 जनवरी/जन्म-दिवस
वनवासियों के हितैषी राजा विजयभूषण सिंहदेव
भारत में सैकड़ों साल से ईसाई मिशनरियां काम कर रही हैं। वे सेवा के जाल में फंसा कर भोले-भाले वनवासियों को ईसाई बनाती हैं। यह धर्मान्तरण कभी-कभी राष्ट्रान्तरण जैसी बीमारी भी बन जाता है। वे उन्हें आदिवासी कहकर भारत और शेष हिन्दू समाज से काट देते हैं। छत्तीसगढ़ में इन षड्यंत्रों को रोकने में जशपुर के राजा विजयभूषण सिंहदेव की बड़ी भूमिका रही।
राजा विजयभूषण सिंहदेव का जन्म जशपुर राजपरिवार में 11 जनवरी, 1926 को हुआ था। ब्रिटिश सरकार ने तत्कालीन राजा विष्णुप्रताप सिंहदेव पर दबाव डालकर 1905 में वहां अपना प्रतिनिधि बैठा दिया। उनके साथ रोमन कैथोलिक चर्च भी वहां आ गया। चर्च ने जशपुर के पास ‘घोलेंग’ गांव में पहला केन्द्र बनाया। अगले 15 साल में वहां सैकड़ों स्कूल, अस्पताल और चर्च बने। ब्रिटिश एजेंट के कारण राजा चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते थे। यद्यपि उन्हें अंग्रेजों से इतनी घृणा थी कि उनसे हाथ मिलाकर वे तुरंत हाथ धोते थे।
1922 में मिशन ने वनवासियों को भड़काकर विद्रोह करा दिया और राजा को रांची जाने को मजबूर कर दिया। चार साल बाद वे वापस आये और तभी उनका देहांत हो गया। उनके पुत्र देवशरण सिंहदेव राजा बने; पर उनका कार्यकाल केवल छह वर्ष रहा। उनके बाद पांच वर्षीय विजयभूषण सिंहदेव राजा बने। अवयस्क होने के कारण यहां भी ब्रिटिश एजेंट ही सर्वेसर्वा था।
एक जनवरी, 1948 को जशपुर रियासत का भारत में विलय हुआ। राजा का कहना था कि यह राज्य मेरे पूर्वजों ने अपने पराक्रम से बनाया है। मैं अपने हस्ताक्षर से इसे नहीं दे सकता। अतः उनकी सहमति से दीवान टी.सी.आर.मेनन ने हस्ताक्षर किये। उन्होंने अपनी अधिकांश सम्पत्ति भी शासन को दे दी। 1949 में उनका विवाह बीकानेर के राजा गंगाशरण सिंह की पौत्री जया कुमारी से हुआ। मेवाड़ के महाराणा तथा विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष भगवंत सिंह उनके बड़े साढू थे। वे तीन बार विधायक, एक बार लोकसभा और एक बार राज्यसभा सांसद रहे। हिन्दू समर्थक होने से तत्कालीन कांग्रेस सरकार उनकी अधिकांश योजनाएं अस्वीकार कर देती थीं। विकास के अभाव में वहां नक्सलवाद पनपने लगा। अतः वे राजनीति छोड़कर सामाजिक और धार्मिक कामों में लग गये। वे करपात्री जी महाराज के परम भक्त थे तथा उनसे मंत्र दीक्षा भी ली थी।
1948 में बालासाहब देशपांडे एक सरकारी अधिकारी के नाते जशपुर में आये। उनके प्रयास और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की योजना से 1952 में वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना हुई। उसका केन्द्र जशपुर बनाकर मोरुभाऊ केतकर को वहां भेजा गया। राजा विजयभूषण ने पहले दो कमरे और फिर पूरा महल ही छात्रावास को दे दिया। कल्याण आश्रम को अपनी भावी योजनाओं के लिए महल के पास चार एकड़ तथा फिर बगीचा और करदना गांव की 150 एकड़ भूमि भी दी। वे प्रतिवर्ष पर्याप्त धन और जरूरत पड़ने पर राशन सामग्री भी देते थे। संस्था का नाम ‘कल्याण आश्रम’ उनके सुझाव पर ही रखा गया। 1963 में रामनवमी पर संस्था के नवनिर्मित भवन का उद्घाटन सरसंघचालक श्री गुरुजी ने किया। इससे उन्हें बहुत हर्ष हुआ।
राजा विजयभूषण ने अनेक हिन्दू संस्थाओं को धन और जमीन दी; पर अपनी सक्रियता के कारण कल्याण आश्रम उनके दिल में बसा था। शिक्षाप्रेमी होने के कारण उन्होंने बिहार से अध्यापक बुलाकर अपने क्षेत्र में 24 विद्यालय खोले। वे कल्याण आश्रम के कार्यकर्ता तथा छात्रों के साथ आम आदमी की तरह बस से स्वयं तीर्थों में जाते थे। 17 अगस्त, 1982 को वनवासियों के सच्चे हितैषी राजा का देहांत हो गया। कल्याण आश्रम के गठन और उसके विस्तार में उनका योगदान सदा याद रहेगा। उनके वशंज भी पूर्वजों की परम्परा के अनुसार देश, हिन्दू और वनवासी हित में संलग्न हैं।भारत में सैकड़ों साल से ईसाई मिशनरियां काम कर रही हैं। वे सेवा के जाल में फंसा कर भोले-भाले वनवासियों को ईसाई बनाती हैं। यह धर्मान्तरण कभी-कभी राष्ट्रान्तरण जैसी बीमारी भी बन जाता है। वे उन्हें आदिवासी कहकर भारत और शेष हिन्दू समाज से काट देते हैं। छत्तीसगढ़ में इन षड्यंत्रों को रोकने में जशपुर के राजा विजयभूषण सिंहदेव की बड़ी भूमिका रही।

Share this post:

Leave a Comment

खबरें और भी हैं...

लाइव क्रिकट स्कोर

कोरोना अपडेट

Weather Data Source: Wetter Indien 7 tage

राशिफल