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विकास के नाम पर मौत का जाल! रेलवे की घोर लापरवाही से बदहाल दलग्राम लेवल क्रॉसिंग

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विकास के नाम पर मौत का जाल! रेलवे की घोर लापरवाही से बदहाल दलग्राम लेवल क्रॉसिंग
हीरक बनिक, रामकृष्ण नगर, 31 जनवरी
रेलवे विभाग की घोर लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना रवैये का एक भयावह उदाहरण बन चुका है रामकृष्णनगर उप-जिले की जीवनरेखा मानी जाने वाली रामकृष्णनगर–श्रीभूमि पीडब्ल्यूडी सड़क पर स्थित दलग्राम रेलवे लेवल क्रॉसिंग। करीमगंज–दुल्लभछड़ा रेललाइन के मरम्मत कार्य की शुरुआत तो कर दी गई, लेकिन बिना किसी पूर्व योजना, बिना वैकल्पिक सुरक्षित मार्ग की व्यवस्था और बिना जनहित को ध्यान में रखे रेलवे लाइन से गिट्टियां हटाए जाने के कारण यह लेवल क्रॉसिंग आज एक खतरनाक मौत के फंदे में तब्दील हो चुकी है। बीते कुछ दिनों से उत्पन्न हालात न केवल प्रशासनिक विफलता को उजागर करते हैं, बल्कि मानव जीवन के प्रति घोर उदासीनता की भी नंगी तस्वीर पेश करते हैं।
रामकृष्णनगर–श्रीभूमि सड़क के माध्यम से ही रामकृष्णनगर उप-जिले का संपर्क जिला मुख्यालय करीमगंज, बराक घाटी तथा बाहरी बराक क्षेत्रों से बना रहता है। प्रतिदिन हजारों वाहन, कामकाजी लोग, छात्र-छात्राएं, व्यापारी, मरीज और आम यात्री इसी सड़क पर निर्भर रहते हैं। इसके बावजूद, इस अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग के दलग्राम लेवल क्रॉसिंग पर बिना किसी वैकल्पिक सुरक्षित रास्ते के मरम्मत कार्य शुरू कर दिया गया, जिसके चलते बीते दो-तीन दिनों से सैकड़ों वाहन रेलवे लाइन के दोनों ओर घंटों फंसे रहने को मजबूर हैं। भीषण यातायात जाम के कारण आम लोगों का दैनिक जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। सबसे हृदयविदारक दृश्य तब देखने को मिला जब मरीजों को ले जा रही एंबुलेंस तक इस जाम में फंस गईं। समय पर अस्पताल न पहुंच पाने की आशंका से पीड़ित परिवारों को बेबस होकर इंतजार करते देखा गया। सवाल उठता है क्या विकास के नाम पर इंसानी जान से बड़ा कुछ भी नहीं?
मजबूरी में ऑटो-रिक्शा, मोटरसाइकिल और छोटे वाहनों के चालक जान जोखिम में डालकर खुले रेलवे ट्रैक को पार करने को विवश हैं। लेकिन मौके पर न तो पर्याप्त चेतावनी बोर्ड लगे हैं, न कोई सुरक्षा कर्मी तैनात है और न ही अस्थायी सड़क या नियंत्रित पारगमन की कोई व्यवस्था की गई है। हर पल ट्रेन के आ जाने के डर के साथ लोग अपनी जान हथेली पर रखकर आवाजाही कर रहे हैं। स्थिति की गंभीरता तब और बढ़ गई जब शुक्रवार की सुबह रेलवे गेट बंद किए बिना ही ट्रेन का परिचालन किया गया। हालांकि एक बड़े हादसे से बाल-बाल बचा गया, लेकिन इस घटना ने यह साफ कर दिया कि रेलवे प्रशासन की लापरवाही कितनी जानलेवा साबित हो सकती है। यदि उस समय रेलवे ट्रैक पर कोई वाहन या पैदल यात्री मौजूद होता, तो एक भीषण त्रासदी से इनकार नहीं किया जा सकता था।
इस अव्यवस्था के चलते रामकृष्णनगर उप-जिला लगभग संपर्क-विहीन स्थिति में पहुंच गया है। कार्यालय जाने वाले कर्मचारी समय पर अपने कार्यस्थल नहीं पहुंच पा रहे हैं, परीक्षार्थी और छात्र-छात्राओं को स्कूल-कॉलेज जाने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, व्यापारी आर्थिक नुकसान झेल रहे हैं और बीमार लोग चिकित्सा सेवाओं से वंचित होने के डर में जी रहे हैं। आम जनSet featured imageता का सीधा सवाल है यदि मरम्मत कार्य विकास के लिए है, तो फिर वह आम लोगों की जान को खतरे में क्यों डाल रहा है ? सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस गंभीर समस्या की जानकारी रेलवे प्रशासन को दिए जाने के बावजूद अब तक कोई ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है। प्रशासन की यह चुप्पी और उदासीनता स्थानीय लोगों के बीच भारी आक्रोश और भय का कारण बन रही है। जब हर दिन लोगों की जान खतरे में डाली जा रही हो, तब प्रशासन का यह रवैया गैर-जिम्मेदारी की पराकाष्ठा के अलावा कुछ नहीं।
इस हालात को देखते हुए स्थानीय निवासियों और जागरूक नागरिक समाज ने राज्य के मुख्यमंत्री तथा केंद्र सरकार के रेल मंत्री से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उनकी स्पष्ट मांग है कि दलग्राम रेलवे लेवल क्रॉसिंग को अविलंब यातायात के योग्य बनाया जाए, मरम्मत अवधि के दौरान सुरक्षित वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, और जन-सुरक्षा की अनदेखी करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।
क्योंकि यह समस्या केवल किसी एक इलाके तक सीमित नहीं है यह जन-सुरक्षा, मानव जीवन के मूल्य और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न है। हादसा होने के बाद शोक व्यक्त करने या जिम्मेदारी स्वीकार करने का कोई अर्थ नहीं रह जाता। यदि समय रहते इस लापरवाही को नहीं रोका गया और भविष्य में कोई बड़ा हादसा होता है, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी रेलवे प्रशासन को ही वहन करनी होगी ऐसा स्पष्ट शब्दों में पीड़ित जनता चेतावनी दे रही है। आज दलग्राम के इस लेवल क्रॉसिंग पर खड़े होकर लोगों के मन में केवल एक ही सवाल गूंज रहा है
क्या विकास के नाम पर इंसानी जान की कीमत सचमुच इतनी सस्ती हो गई है?

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