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सनातन संस्कृति का संविधान है मनुस्मृति उसका अपमान असहनीय – प्रो. छोटेलाल त्रिपाठी
मनुस्मृति के सम्मान में देशभर के सन्त, विद्वान एक जुट हो – प्रो. कमलाकान्त त्रिपाठी
कठुआ/जम्मू – पावन पवित्र बाबा श्रीकाशी विश्वनाथ जी की नगरी काशी में कुछ भटके हुए लोगों द्वारा देश के कुछ स्थानों पर मनुस्मृति को जलाने एवं अपमान करने जैसे निंदनीय कृत्य पर श्रीकाशी विद्वद्धर्मपरिषद् (संस्थापित श्री श्री 1008 श्री मौनी बाबा चैरिटेबल ट्रस्ट- न्यास) की बैठक काशी में वरिष्ठ उपाध्यक्ष एवं सम्मानित न्यासी प्रो. सुधाकर मिश्र जी के आवास पर बुलाई गई। बैठक में सनातन धर्म, संस्कृति एवं परम्परा को आजतक शास्त्रीय निर्णय में दिशा देने वाली सनातन संस्कृति की अद्वितीय स्मृतिग्रन्थ मनुस्मृति पर गहन चर्चा हुई। कुछ सनातन विरोधियों तत्वों द्वारा आए दिन कुछ न कुछ उत्पात किया जा रहा है और अब तो मनुस्मृति को भी जलाने और अपमान की घटनाएं देखने को मिल रही है जो असहनीय है।
इस अवसर पर अपने व्यक्तव्य देते हुए श्रीकाशीविद्वद्धर्मपरिषद् के अध्यक्ष प्रो. छोटेलाल त्रिपाठी जी ने कहा कि सनातन संस्कृति का संविधान है मनुस्मृति और उसका अपमान असहनीय। कुछ वर्ष पहले लोकतंत्र में संविधान आया और हम लोग उसे गीता और श्रीरामचरितमानस की तरह सम्मान करते हैं लेकिन आजकल खुली छूट के चलते कुछ लोग ऐसी गलतियां कर रहे हैं जो भविष्य के लिए ठीक नहीं है। इन्हें कड़ी से कड़ी सजा होना चाहिए।
इसी क्रम में अपनी बात रखते हुए परिषद् के कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. कमलाकान्त त्रिपाठी जी बताया कि देश में हमारे धर्मशास्त्र के प्रति ऐसे जघन्य अपराध किए जा रहे हैं और सन्त, महात्मा और विद्वान लोग मौन साधकर समाधिस्थ हो गए है। यदि ऐसे मुद्दों पर शास्त्र को पढ़ने और उसी के ज्ञान से जीने वाले विद्वान नहीं बोलेंगे तो एक आने वाले दिनों में कुछ और भी देखने को मिलने लगेगा। खास करके जगतगुरु और धर्माचार्यों को आगे आना चाहिए नहीं तो आने वाली पीढ़ी उन्हें माफ नहीं करेगी। धर्माचार्यों का ऐसे गम्भीर मुद्दे पर मौन साधकर समाधिस्थ हो जाना यह गम्भीर चिंतन का विषय है। अब तो धर्मशास्त्री विद्वान जो परिषद् के नाम की दुकान सजाए बैठे है उनका मुख भी अनर्गल धन के भोग से आच्छादित हो गया है। देशभर में सच को सच कहने का साहस केवल श्रीकाशीविद्वद्धर्मपरिषद् में ही दिख रहा है और आगे भी इसे मुद्दों पर पुरजोर विरोध एवं कार्यवाही का प्रयास रहेगा।
वक्ता के क्रम न्यास के सम्मानित न्यासी एवं परिषद् के वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रो. सुधाकर मिश्र ने कहा कि मनुस्मृति सामान्य ग्रन्थ मात्र नहीं बल्कि भगवान मनु द्वारा समाज संचालन हेतु संग्रह सूत्रों से परिपूर्ण एक व्यवस्थित व्यवस्था है। जिसमें समाज संचालन की सम्पूर्ण जानकारी शास्त्र सम्मत दी गई है। और ऐसे ग्रन्थ को जलाने वाले को यथाशीघ्र सजा होना चाहिए ऐसे कृत्य के लिए घोर निंदा करते हुए प्रस्ताव पारित किया गया।
इसी क्रम श्री श्री 1008 श्री मौनी बाबा चैरिटेबल ट्रस्ट न्यास के मुख्य न्यासी व गुरुकुल एवं मन्दिर सेवा योजना प्रमुख जम्मू कश्मीर प्रान्त डॉ. अभिषेक कुमार उपाध्याय ने बताया कि भारतीय संविधान से देश चलता है लेकिन आज भी ठीक ढंग से विचार किया जाए तो सनातन धर्म, संस्कृति एवं परम्परा में विश्वास रखने वाला समाज हमारी स्मृतियों में प्रोक्त नियमों के आधार पर चलते हैं। आजकल बिना पढ़े लिखे एवं विसंगतियों के साथ प्रकाशित ग्रन्थों को आधार बनाकर कुछ वर्ग विशेष के लोग ऐसे कृत्य कर रहे हैं हम उनको बताना चाहते हैं कि यदि उन्हें ठीक से मूल मनुस्मृति का पता चल जाए तो वे ऐसा कभी भी नहीं करेंगे। हमारा संविधान दस से अधिक देशों के संविधान के आधार पर अपने सांस्कृतिक और मानव मूल्यों को सम्माहित करते हुए बना है। यदि हम इस विषय की गहनता से बात करें तो इंग्लैंड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, रूस, जापान, जर्मनी, अफ्रीका और फ्रांस का जो संविधान है उसके निर्माताओं ने पहले हमारे वेद, पुराण एवं मनुस्मृति जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों का अध्ययन करके अपना संविधान बनाया और वे कहे भी है की मनुस्मृति दुनिया की सबसे व्यवस्थित संविधान की आधार ग्रन्थ है क्योंकि उसमें समाज संचालन की उन सम्पूर्ण जानकारी को अलग अलग अध्याय में क्रमवार विस्तारित किया गया है जो आजकल के नासमझ लोग इसे एक वर्ग विशेष की रोजी रोटी का ग्रन्थ कह करके जलाकर सनातन संस्कृति का अपमान कर रहे हैं। ऐसे अत्याचारियों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई करते हुए केन्द्र एवं राज्य सरकार को समाज को न्याय दिलाने का प्रयास करना पड़ेगा चाहिए नहीं तो ऐसे जहर फैलाने वाले समाज को बरगलाने का कार्य करेंगे और ऐसे कृत्य पर समस्त विश्व उपहास उड़ाएगा। विचार करें तो आजतक अन्य धर्म संप्रदायों में उनके पवित्र ग्रन्थ पर कोई टिप्पणी भी नहीं कर सकता जलाने और अपमान की बात तो बहुत दूर की है। ऐसे भटके हुए लोगों को सबक सिखाने के लिए हमें एक जुट होने की आवश्यकता है।
अन्त में उपस्थित सभी विद्वानों का धन्यवाद एवं निंदा प्रस्ताव का वाचन करते हुए परिषद् के कोषाध्यक्ष डॉ. आशीषमणि त्रिपाठी ने शांति मंत्र का पाठ किया। इस अवसर पर परिषद् के परामर्शदात्री समिति के सदस्य डॉ. गुरुदेव प्रसाद मिश्र डॉ शिवाकांत तिवारी, गणपतिदेव प्रसाद मिश्र सहित अन्य गणमान्य सदस्य उपस्थित रहें।





















