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समाज के रीति- रिवाज में परिवर्तन जरुरी
समाज के रस्में- रिवाज में सुधार के लिए परिवर्तन स्वीकार योग्य है। यही वजह है कि आज हमारे समाज के रीति- रिवाज में कई सुधारवादी परिवर्तन देखने को मिल रहा है। समयानुसार समाज में सुधार योग्य परिवर्तन आवश्यक भी है। पहले यह प्रथा प्रचलित थी कि पुत्र के विवाह मे तिलक के दिन ही प्रीतिभोज का आयोजन किया जाता था, इससे संगे- संबंधियों, आस – पड़ोस के लोग पुत्रवधू की सुरत देखने से वंचित रह जाते थे। धीरे धीरे इस प्रथा मे बदलाव आया और आज बहू प्रीतिभोज जोरशोर से प्रचलित है। यह एक समयानुसार आवश्यक परिवर्तन है। प्रीतिभोज के नाम पर बुफे सिस्टम भी परिवर्तन का एक अच्छा उदाहरण है। बुफे सिस्टम से हमें कोई शिकायत नही है परंतु भोजन लेने के लिए पंक्ति मे खड़े होकर भीड़ मे धीरे-धीरे भोजन स्थल तक सरकना बड़ा ही असहज महसुस होता है। दुबारा पंक्ति मे प्रवेश करने का साहस नही होता है। यही वजह है कि कुछ लोग अपने थाली मे एक ही बार मे सारे मेनू परोस लेते हैं, भले ही प्रत्येक मेनू के बारे मे उसे ज्ञात हो या न हो अथवा काफी कम मेनू लेकर ही संतुष्ट हो जाते है। दुसरी ओर खड़े- खड़े खाना भी असहज लगता है। पुराने सिस्टम की बात करे तो बेंच पर पंक्तिबद्ध बैठकर खाने की मजा ही अलग है। भोजन परोसने वाले सभी के थाली मे प्रेम भाव से भोजन परोसते जाते हैं तथा बार- बार समर्पण भाव से पुछते है कि कुछ और चाहिए क्या? बीच- बीच मे आतिथ्य अपने प्रेम भाव से ओतप्रोत हाथ जोड़कर सभी से पूछते रहते है कि भोजन कैसा है? कोई कमी तो नही है? अर्थात करबद्ध होकर यह जताने की कोशिश करते है कि मेरा आतिथ्य स्वीकार करे। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रेम, सदभावना, समर्पण का अनूठा भाव देखने को मिलता है। सभी की पसंद को एक पहलू मे बांधना संभव या उचित भी नही है इसलिए सभी की अपनी- अपनी पसंद है हलाकि दोनों सिस्टम अपनी- अपनी जगह सही है।अत: सभी की पसंद का सम्मान होनी चाहिए।
पवन कुमार शर्मा (शिक्षक)
दुमदुमा (असम)
मो. नं.९९५४३२७६७७





















