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।। जिधर मैं, उधर तुम ।।
प्राणों की कम्पन में तुम,
हृदय की धड़कन में तुम…
मेरे अस्तित्व का सार तुम,
मेरे हर श्वास का आधार तुम… ।।
मेरी सांसों में छुपी हुई है तेरी सांसे…
मन में मेरे एक रेखा बसी है तेरी…
सांसों में तुम, मन में भी तुम…
हृदय में तुम, सर्वत्र तुम ही तुम…।।१।।
मेरे भास-आभास में तुम…
मेरे सपनों के एकांत में तुम…
ज़िंदगी की सुगंध का गंध तुम…
मेरी कविता का हर अक्षर तुम…।।२।।
मन मेरा तुम्हारा दिवाना…
एकांत में तुमने ही संभाला मुझे…
ओ प्रिये… ओ प्रिये…
जिधर मैं, उधर तुम…
देह मेरा — प्राण तुम…।।३।।
तुम मैं हो…
जो भी हूँ, तुझसे ही हूँ…
जो भी है, तुम ही हो…
……
……
।। जिधर मैं — उधर तुम ।।
अच्युत उमर्जी
पुणे, महाराष्ट्र





















