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ग्रामीण-केंद्रित भारतीय सामाजिक यथार्थ के सौंदर्यशास्त्रीय भाष्यकार : मुंशी प्रेमचंद
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक काल में जिन कुछ मनीषी साहित्यकारों ने भारतीय साहित्य पर गहरा, स्थायी और व्यापक प्रभाव डाला, उनमें मुंशी प्रेमचंद सर्वप्रथम स्मरणीय हैं। साहित्य-जगत में वे सर्वमान्य रूप से ‘उपन्यास-सम्राट’ के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनका जन्म 31 जुलाई 1880 को हुआ। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के उथल-पुथल भरे काल में उनके साहित्यिक जीवन का आरंभ हुआ और उनकी रचनाएँ स्वतंत्रता-चेतना की सशक्त वाहक बनकर उभरीं। उनकी प्रारम्भिक रचनाओं में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध विद्रोह और देशमुक्ति की आकांक्षा स्पष्ट रूप से प्रतिध्वनित होती है। इसी कारण 1910 में प्रकाशित उनका कहानी-संग्रह **‘सोज़-ए-वतन’** ब्रिटिश सरकार द्वारा विद्रोहात्मक घोषित कर दिया गया।
प्रेमचंद का साहित्य-भंडार एक के बाद एक कालजयी उपन्यासों और कहानियों से समृद्ध है। **‘सेवासदन’, ‘रंगभूमि’, ‘निर्मला’, ‘कायाकल्प’, ‘ग़बन’** तथा **‘गोदान’** जैसी रचनाओं में उन्होंने भारतीय समाज की विषमता, मानवीय संकट और नैतिक द्वंद्व को गहरी कलात्मक चेतना के साथ उकेरा है। उनकी अंतिम प्रकाशित कहानी **‘क्रिकेट मैच’** है, जो उनके निधन के पश्चात 1938 में *जमाना* पत्रिका में प्रकाशित हुई।
मात्र छप्पन वर्ष की आयु में, 8 अक्टूबर 1936 को इस महान साहित्यकार का देहावसान हो गया।
**‘मुंशी प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ’** उनके अमर सृजन-संसार का एक मूल्यवान स्मारक-संग्रह है।
प्रेमचंद की आरंभिक साहित्यिक कृतियों में *A Little Trick* और *A Moral Victory* जैसी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन-तंत्र के साथ आत्मसमर्पण और सहयोग करने वाले भारतीय समाज के एक वर्ग को तीखे व्यंग्य और कटाक्ष के द्वारा उजागर किया।
1920 के दशक में महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले असहयोग आंदोलन और उससे जुड़ी सामाजिक पुनर्निर्माण की चेतना ने प्रेमचंद की साहित्यिक दृष्टि को गहराई से प्रभावित किया। इस कालखंड में उनकी रचनाओं में भारतीय समाज के बहुआयामी संकट—गरीबी और आर्थिक असमानता, ज़मींदारी शोषण की क्रूर वास्तविकता (**‘प्रेमाश्रम’, 1922**), दहेज-प्रथा से उत्पन्न सामाजिक विघटन (**‘निर्मला’, 1925**), शिक्षा-सुधार की अनिवार्यता तथा औपनिवेशिक सत्ता का राजनीतिक दमन (**‘कर्मभूमि’, 1931**)—सशक्त सामाजिक यथार्थ के आलोक में चित्रित हुए।
जीवन के अंतिम चरण में प्रेमचंद ने ग्राम-जीवन को मानवीय समाज के जटिल द्वंद्व, संघर्ष और त्रासदी का प्रमुख मंच बनाया। उनका कालजयी उपन्यास **‘गोदान’** तथा कहानी-संग्रह **‘कफ़न’** (1936) इस यथार्थवादी दृष्टि की परिपूर्ण अभिव्यक्ति हैं। प्रेमचंद का मत था कि समकालीन साहित्य में प्रचलित अतिशय भावुकता, कोमलता और तथाकथित ‘नारीसुलभ’ प्रवृत्तियों के स्थान पर सामाजिक यथार्थ की निर्मम, ठोस और निर्भीक प्रस्तुति ही हिंदी साहित्य का मौलिक और प्रामाणिक आदर्श होनी चाहिए।
सरल और सादे जीवन-यापन में ही प्रेमचंद के व्यक्तित्व की वास्तविक महिमा विकसित हुई। सदैव प्रफुल्ल मानसिकता के साथ वे जीवन की असमानताओं और कटु यथार्थ से निरंतर संघर्षरत रहे। इस संघर्ष को उन्होंने केवल पीड़ा नहीं, बल्कि एक सचेत प्रतियोगिता के रूप में स्वीकार किया, जिसमें विजय प्राप्त करना ही उनका लक्ष्य था। कहा जाता है कि प्रेमचंद सहज हास्य-बोध से संपन्न थे। विषमता-ग्रस्त जीवन के तीव्र दबाव में भी हास्य-भाव को अक्षुण्ण रखना उनके अदम्य साहस और दृढ़ व्यक्तित्व का प्रमाण है।
सरलता, सौजन्य और उदारता उनके चरित्र की मूल आधारशिलाएँ थीं। मित्रों के प्रति उनका हृदय जितना स्नेहिल था, उतनी ही गहरी और असीम उनकी करुणा निर्धन और उत्पीड़ित जनों के प्रति थी। मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण प्रेमचंद वस्तुतः एक उच्चकोटि के मानवतावादी स्रष्टा थे। ग्राम-जीवन से उनका अत्यंत आत्मीय संबंध था; वही उनकी चेतना का प्रमुख आश्रय था। इसलिए उनके वस्त्र-विन्यास में भी ग्रामीण सादगी और अनाड़ंबर जीवन-बोध की छाप स्पष्ट दिखाई देती थी।
जीवन का बड़ा भाग गाँवों में व्यतीत करने के कारण वे सामान्य जन-जीवन के संघर्ष को गहराई से अनुभव कर सके। बाह्य रूप से साधारण और अलंकरण-विहीन होते हुए भी उनका अंतर्जगत् अपराजेय जीवन-शक्ति और सृजनात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण था। जो भी उनके व्यक्तित्व के निकट आता, वह अनिवार्यतः उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था। आडंबर और कृत्रिमता के प्रति उनमें स्वाभाविक वितृष्णा थी। भोग-विलास न उनके जीवन का अंग था, न ही उसकी ओर उनका कोई आकर्षण। अन्य महापुरुषों की भाँति आत्मनिर्भरता को उन्होंने जीवन का आदर्श माना और अपने कार्य स्वयं करने को ही सम्मान की दृष्टि से देखा।
प्रेमचंद ने अपने मामा के जीवन की एक विशेष घटना को आधार बनाकर साहित्य-साधना का आरंभ किया। मात्र तेरह वर्ष की आयु में लिखी गई वह पहली रचना पूर्ण होते ही उन्होंने साहित्य-साधकों की पंक्ति में अपना स्थान बना लिया। 1894 ई. में उन्होंने **‘होनहार बिरवार के चिकने-चिकने पात’** नामक नाटक की रचना की। इसके पश्चात 1898 में एक उपन्यास तथा लगभग उसी समय ऐतिहासिक उपन्यास **‘रूठी रानी’** की रचना कर उन्होंने अपनी सृजन-क्षमता का विस्तार किया। आगे चलकर 1902 में **‘प्रेमा’** और 1904–05 में **‘हमख़ुरमा-ओ-हमसवाब’** उपन्यास लिखे। इन कृतियों में विधवा-जीवन की करुण यथार्थता और उससे जुड़ी सामाजिक विषमता को उन्होंने गहरी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया।
आर्थिक अस्थिरता के दौर में, 1907 ई. में उन्होंने पाँच कहानियों का संग्रह **‘सोज़-ए-वतन’** (देश की पीड़ा) प्रकाशित किया, जिसमें देशभक्ति की चेतना को जन-साधारण के दुःख और शोषण की वास्तविकताओं से जोड़ा गया। पुस्तक के विद्रोही स्वर ने अंग्रेज़ शासकों का ध्यान आकृष्ट किया। उस समय वे ‘नवाब राय’ छद्मनाम से लिखते थे। पहचान उजागर होने पर उन्हें गिरफ्तार कर अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत किया गया और उनके सामने ही पुस्तक को जलाया गया। भविष्य में बिना अनुमति लेखन न करने का कठोर आदेश भी दिया गया।
इस दमन से बचने के लिए उन्होंने मुंशी दयानारायण निगम को पत्र लिखकर सूचित किया कि वे अब ‘नवाब राय’ अथवा ‘धनपत राय’ नाम से लेखन नहीं करेंगे। तभी दयानारायण निगम ने उनके लिए **‘प्रेमचंद’** नाम का प्रस्ताव रखा। उसी क्षण से धानपत राय साहित्य-इतिहास में सदा के लिए प्रेमचंद के नाम से प्रतिष्ठित हो गए।
इसके बाद उन्होंने **‘सेवासदन’, ‘मिल मज़दूर’** तथा 1935 में अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति **‘गोदान’** की रचना की। *गोदान* उनके संपूर्ण साहित्य साहित्य-संसार की सर्वाधिक चर्चित और सम्मानित कृति है। जीवन के अंतिम चरण में वे **‘मंगलसूत्र’** उपन्यास लिख रहे थे, किंतु नियति की विडंबना से वह अधूरा ही रह गया। इससे पूर्व उन्होंने महाजनी शोषण और पूँजीवादी सभ्यता की अमानवीय प्रवृत्तियों की तीव्र आलोचना करते हुए **‘महाजनी सभ्यता’** शीर्षक निबंध लिखा।
1936 ई. में प्रेमचंद दीर्घकालिक रोग से पीड़ित हो गए। इसी अवस्था में उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना में सक्रिय सहयोग प्रदान किया। भीषण आर्थिक संकट और समुचित चिकित्सा के अभाव में 8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हो गया। इस प्रकार वह महाज्योति निर्वाण को प्राप्त हुई, जिसने अपने जीवन-दीप को कण-कण करके क्षीण करते हुए भारतीय समाज के अंधकारमय पथ को आलोकित किया।
लेखक – शुभ दास





















