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इतिहास स्मृति
ताशकंद समझौता
ताशकंद समझौता भारत और पाकिस्तान के बीच 1966 में किया गया एक शांति समझौता था। इसके अनुसार, भारत और पाकिस्तान अपनी शक्ति का प्रयोग एक-दूसरे के खिलाफ नहीं करेंगे और अपने झगड़ों को शांतिपूर्ण ढंग से हल करेंगे।
भारत-पाकिस्तान के बीच 1965 में हुए युद्ध के समय चीन तथा अमेरिका का झुकाव पाकिस्तान तथा सोवियन संघ का झुकाव भारत की ओर था, इसकी झलक स्पष्ट रूप से देखने को मिली। कालांतर में सोवियत संघ, अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र महासभा के दबाव में दोनों पक्ष युद्ध विराम के लिये तैयार हुए।
युद्ध विराम के बाद सोवियत संघ की मध्यस्थता से पाकिस्तान के जनरल अयूब खान तथा भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के मध्य ताशकंद समझौता हुआ। इसके महत्त्वपूर्ण बिंदु निम्नलिखित थे-
भारत तथा पाकिस्तान आपसी विवादों को हल करने के लिये बल का प्रयोग न करके शांतिपूर्ण समाधान की कोशिश करेंगे।
1961 के वियना अभिसमय का पालन करेंगे तथा राजनयिक संबंधों को बहाल करेंगे।
दोनों देश युद्ध से पूर्व की सीमा रेखा का पालन करेंगे।
दोनाें देशों के मध्य आंतरिक मामलों में संबंध, गैर-हस्तक्षेप के सिद्धांत पर आधारित होंगे।
दोनों देश एक-दूसरे को लेकर दुर्भावनापूर्ण प्रचार नहीं करेंगे।
उपर्युक्त के अतिरिक्त दोनों देश आपसी संबंधों को बेहतर बनाने की प्रतिबद्धता हेतु सभी अधिगृहीत इलाकों से हटकर युद्ध-पूर्व की स्थिति कायम करने पर सहमत हुए। भारत के लिये इसका अर्थ सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कश्मीर के हाजी-पीर दर्रे से हट जाना था, जिसके माध्यम से घुसपैठिये फिर कश्मीर में प्रवेश कर सकते थे। भारतीय प्रधानमंत्री युद्धबंदी हेतु इस शर्त को भी मानने को तैयार हो गए। दूसरी ओर, भारत को यह भय भी था कि कहीं इस शर्त को न मानने पर भारत संयुक्त राष्ट्र संघ में सोवियत संघ का समर्थन न खो दे और साथ ही तकनीकी तथा सैन्य सहायता हेतु भी सोवियत संघ मना न कर दे।
यद्यपि भारत इस समझौते के प्रति सदैव प्रतिबद्ध रहा किंतु पाकिस्तान इन शर्तों का उल्लंघन कर कश्मीर व अन्य क्षेत्रों में आतंकी गतिविधियाँ फैलाता रहा जिसका परिणाम 1971 तथा 1999 में पुन: युद्ध के रूप में सामने आया।





















