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सिपाही विद्रोह के 168वीं वर्षगांठ पर शहीदों की स्मृति कार्यक्रम आयोजित 

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सिपाही विद्रोह के 168वीं वर्षगांठ पर शहीदों की स्मृति कार्यक्रम आयोजित 

लखीपुर 12 जनवरी : लखीपुर सम-जिला क्षेत्र के विन्नाकांदी पार्ट 2 इलाके का ‘बिन्नाकांदी वांगखाम लैकाई सिपाही विद्रोह स्मारक संरक्षण समिति’ द्वारा उत्तर-पूर्व भारत तथा दक्षिण असम में सिपाही विद्रोह के अंतिम युद्धक्षेत्र ‘वांगखाम लैकाई’ की युद्ध का 168 वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आज एक स्मारक सभा का आयोजन किया गया। सिपाही विद्रोह की अंतिम युद्ध की 168वीं वर्षगांठ पर, प्राणों की आहुति देने वाले शहीदों को श्रद्धापूर्वक याद किया गया। लखीपुर क्षेत्र के विधायक तथा मंत्री कौशिक राय इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। प्रख्यात लेखक, शोधकर्ता और नेहरू कॉलेज के पूर्व प्रधानाचार्य अबिद राजा मजूमदार विशिष्ट अतिथि थे।कबुगंज जनता कॉलेज के प्रोफेसर एन.डी. होदाम्बा सिंह, सामुदायिक स्मारक संरक्षण समिति के अध्यक्ष वाई. मणि सिंह, सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल गौरकिशोर सिंह, मोइरापायबी संगठन की के. अरुणा देवी और मणिपुर के सिपाही विद्रोह के नायकों में से एक राजकुमार नरेंद्रजीत सिंह के वंशज राजकुमार दूसरीगोपाल सिंह और बिन्नाकांदी सिपाही विद्रोह पर लिखित पुस्तक “बिन्नाकांदी अरण्ये 1858″ की संपादक मीता दास पुरकायस्था भी उपस्थित रही। मंत्री कौशिक और अन्य लोगों द्वारा शहीदों को पुष्पांजलि अर्पित की गई और प्रार्थनाएं की गईं। स्वागत भाषण स्वागत समिति के अध्यक्ष काइशम बीरेंद्र सिंह ने दिया, जबकि आई. नीलबीर सिंह ने सिपाही विद्रोह के इतिहास का संक्षिप्त विवरण दिया। मुख्य अतिथि कौशिक राय ने अपने भाषण में कहा कि सिपाही विद्रोह का अंतिम युद्धक्षेत्र बिन्नाकांदी क्षेत्र का वांगखेम लैकाई के बारे में प्रचार की कमी के कारण, यह स्थान जनता की नज़रों से छिपा रहा है। हालांकि, सामुदायिक संरक्षण समिति ने दो कट्ठा ज़मीन खरीदकर यहां एक स्मारक का निर्माण किया है। इस स्थान को प्रसिद्धि दिलाने के लिए, एक स्मारक का निर्माण अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए और अधिक भूमि की आवश्यकता है। उन्होंने घोषणा की कि बराक घाटी विकास विभाग जल्द ही स्मारक के निर्माण के लिए 50 लाख रुपए आवंटित करेगा। साथ ही, वे भूमि खरीदने के लिए अपने निजी कोष से वित्तीय सहायता प्रदान करने का वादा किया। प्रोफेसर एन.डी. होदंबा सिंह ने सिपाही विद्रोह के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया कि विद्रोह चटगांव में 34 वीं नेटिव रेजिमेंट के सैन्य शिविर से शुरू हुआ था।कई असफलताओं के बाद, यह तत्कालीन कछाड़ जिले के मालेगढ़ (जो अब श्रीभूमि जिला है) और फिर हैलाकांदी तक पहुंचा।वांगखेम लाइकाई की युद्ध में, भूख और नींद की कमी से थके-हारे स्थानीय सिपाही पीछे हटने पर विवश हो गए। इस युद्ध में 30 विद्रोही सिपाही शहीद हुए और दो ब्रिटिश सैनिक मारे गए तथा दो घायल हुए। अंग्रेजों के विरोधी मणिपुर के राजकुमार नरेंद्रजीत सिंह भी इसी युद्ध में शहीद हुए थे।उन्होंने विद्रोही सिपाहियों का नेतृत्व किया। बाद में, पीछे हट रहे सिपाहियों के साथ मणिपुर जाते समय, उन्हें ब्रिटिश सेना ने गिरफ्तार कर लिया। आज की इस सभा में 12 जनवरी, 1858 को विद्रोही देशी सिपाहियों और ब्रिटिश सेना के बीच हुए असमान युद्ध के बारे में जानकारी प्रस्तुत की गई।”बिन्नाकांदी अरण्य 1858” पुस्तक की लेखिका मीता दास पुरकायस्थ, सेवानिवृत्त सेना लेफ्टिनेंट कर्नल जी.के. सिंह, के. अरुणा देवी, विद्रोही राजकुमार नरेंद्रजीत सिंह के उत्तराधिकारी राजकुमार दुसरीगोपाल सिंह और वरुण सिंह ने भी अपने विचार प्रस्तुत किया।

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