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दहलीज़ तक आया एक मेहमान

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दहलीज़ तक आया एक मेहमान
जो चला जाता है, वह चला जाता है—
पर जो आदतों में जकड़ा रह जाता है,
वही जानता है
आदतों को छोड़ने की आदत की पीड़ा।
कभी-कभी
अधूरे मिलन में ही
जीवन की प्राप्ति छिपी होती है।
कभी-कभी
रिश्तों का नाम न होना ही
भविष्य को शांत बना देता है।
और कभी-कभी
जिस व्यक्ति को आप चाहते हैं
उसका आपका न होना ही
ईश्वर का सबसे बड़ा आशीर्वाद होता है।
कभी किसी से दूर रहकर
आप अपना अस्तित्व समझ पाते हैं।
कुछ रिश्तों का कोई भविष्य नहीं होता—
दो समानांतर रेखाओं की तरह,
केवल दृष्टि के भ्रम में
मिलती हुई प्रतीत होती हैं।
कभी-कभी
दिल जिसे खोजता है,
उसका दरवाज़े पर मेहमान बनकर
लौट जाना ही बेहतर होता है।
दिखाए गए पलों को
एक रात का सपना मानकर
मिटा देना ही बेहतर होता है।
लोग आते हैं—
कभी गर्म हवा के झोंके बनकर
आपको छू जाते हैं,
तो कभी तूफ़ान की तरह
पहले से अस्त-व्यस्त जीवन को
और बिखेर जाते हैं।
समय लगता है।
समय के साथ सब ठीक होता है—
लेकिन मन के भीतर जलती
अस्थिरता की आग
अक्सर आत्मा को जगा रखती है,
और कुछ सवालों का शोर
प्रेत की तरह पीछा करता रहता है—
“मेरी गलती कहाँ ?”
या
“क्यों सिर्फ मैं ही ?”
विशेष टिप्पणी: निःस्वार्थ प्रेम करने वाला व्यक्ति
जेब में कंडोम का पैकेट लेकर नहीं घूमता है
— बबिता बोरा
शिलचर, असम

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