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बाल संत रामेश्वरानंद जी का साक्षात्कार

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आत्मा का न जन्म होता है, न मृत्यु — बाल संत रामेश्वरानंद जी
फकीरटीला में संपन्न श्रीराम कथा के दौरान प्रेरणा भारती न्यूज़ नेटवर्क से विशेष बातचीत
शिवकुमार, शिलचर (फकीरटीला) से रिपोर्ट :
एनआईटी शिलचर के समीप फकीरटीला में आयोजित तीन दिवसीय श्रीराम कथा, यज्ञ एवं संत सम्मेलन भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा के वातावरण में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। आयोजन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर भगवान श्रीराम की पावन कथा का रसपान किया। सुबह से देर शाम तक भजन, प्रवचन और आरती के क्रम ने पूरे क्षेत्र को राममय बना दिया।
इस भव्य धार्मिक आयोजन में काशी से दीक्षित 16 वर्षीय बाल संत श्री रामेश्वरानंद जी ब्रह्मचारी ने श्रीराम कथा का वाचन किया। अल्प आयु में गहन आध्यात्मिक ज्ञान, संयमित जीवनशैली और ओजस्वी वाणी के कारण वे देशभर में श्रद्धालुओं के बीच विशेष पहचान बना चुके हैं। उनकी सरल शैली और गूढ़ विचारों ने श्रोताओं को गहराई से प्रभावित किया।
कार्यक्रम के दौरान प्रेरणा भारती न्यूज़ नेटवर्क ने बाल संत श्री रामेश्वरानंद जी से विशेष बातचीत की। इंटरव्यू में उन्होंने अपने आध्यात्मिक जीवन, गुरु परंपरा, युवाओं की भूमिका और समाज के प्रति दायित्वों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
महाराज जी ने गीता के संदर्भ में कहा कि आत्मा का न तो जन्म होता है और न ही मृत्यु, केवल शरीर बदलता है। उन्होंने बताया कि संभवतः पूर्व जन्मों के पुण्य के कारण उन्हें कम उम्र में ही आध्यात्मिक मार्ग अपनाने का सौभाग्य मिला। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी दीक्षा शंकर मठ के परम पूज्य अध्यक्ष स्वामी तपनानंद गिरिजी महाराज से हुई है तथा वर्तमान में उनका अध्ययन काशी में चल रहा है। काशी को उन्होंने ज्ञान और साधना की भूमि बताते हुए कहा कि वहां का वातावरण साधकों को आत्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करता है।
भगवान श्रीराम के आदर्शों पर प्रकाश डालते हुए बाल संत ने कहा कि श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं और उनका जीवन अनुशासन, संयम, सेवा, त्याग और बड़ों के सम्मान का जीवंत उदाहरण है। आज के युवाओं को चाहिए कि वे श्रीराम के आदर्शों को अपनाकर अपने जीवन को सार्थक बनाएं।
रामचरितमानस की प्रसिद्ध चौपाई ‘प्रातःकाल उठिके रघुनाथ…’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान राम प्रतिदिन माता-पिता और गुरु को प्रणाम करते थे। इससे यह शिक्षा मिलती है कि चाहे व्यक्ति कितनी भी ऊंचाई पर क्यों न पहुंच जाए, विनम्रता कभी नहीं छोड़नी चाहिए।
रामकथा के उद्देश्य पर बोलते हुए महाराज जी ने कहा कि रामकथा केवल कथा श्रवण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चरित्र निर्माण का माध्यम है। मनुष्य और पशु में अंतर धर्म और संस्कार का होता है, और रामकथा मनुष्य को सही मार्ग दिखाकर श्रेष्ठ इंसान बनने की प्रेरणा देती है।
रामचरितमानस की चर्चित चौपाई ‘ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी…’ पर अपनी राय रखते हुए उन्होंने कहा कि इसका गलत अर्थ लगाया जाता है। गोस्वामी तुलसीदास नारी या शूद्र विरोधी नहीं थे। शबरी और अहिल्या जैसे पात्रों को सम्मान देकर उन्होंने समाज में समानता और करुणा का संदेश दिया। शास्त्रों का सही अर्थ गुरु के मार्गदर्शन में ही समझा जाना चाहिए।
देश के विभिन्न हिस्सों में कथा वाचन के अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि भारत विविधताओं का देश होते हुए भी एकता, इंसानियत और धर्म की भावना से बंधा हुआ है, जो इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
भविष्य की योजनाओं पर बोलते हुए बाल संत ने कहा कि वे गुरुजी के निर्देशानुसार साधना, भजन और समाज सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ते रहेंगे। उनका उद्देश्य आध्यात्मिक साधना के साथ-साथ समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना है।
तीन दिवसीय इस आयोजन में आसपास के क्षेत्रों से भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। स्थानीय समिति और स्वयंसेवकों ने सुरक्षा, स्वच्छता और प्रसाद वितरण की व्यवस्थाएं सुचारु रूप से संभालीं। 3 तारीख को वैदिक मंत्रोच्चार, पूर्णाहुति और आरती के साथ यज्ञ एवं हवन का विधिवत समापन हुआ। अंतिम दिन श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण कर आयोजन समिति की भूरी-भूरी प्रशंसा की।
4 तारीख को श्रीराम कथा के समापन के बाद प्रेरणा भारती न्यूज़ नेटवर्क से हुई विशेष बातचीत में बाल संत श्री रामेश्वरानंद जी के विचारों ने श्रोताओं और दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया।
फकीरटीला में आयोजित यह श्रीराम कथा, यज्ञ एवं संत सम्मेलन न केवल धार्मिक आस्था को सशक्त करने में सफल रहा, बल्कि समाज में संस्कार, नैतिकता और सद्भाव की भावना को भी मजबूत करने वाला सिद्ध हुआ। श्रद्धालुओं ने इसे एक यादगार और प्रेरणादायक आयोजन बताया।

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