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 वाह! पनघट। 

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 वाह! पनघट। 
 हां  पनघट
सखियों की जमघट
मन की बातें करती
जहाँ समस्या सुलझाती
कमर पर गगरी
ना होती शहरी
वसंत मे कू कोयल की
और छम- छम  गूंज पायल की
गगरी छल – छल छलकती
बलखाती, संभलती
पगडंडी पर चलती
सरकती दुपट्टा संभालती
शीर्ष पतियों से लालिमा विदा लेती
इधर सखियाँ घर लौटती
अब यह छटा कल हुई
अब घर – घर नल हुई
गाँव- बस्ती की बातें पुरानी हुई
अब लोगों की नजरियाँ भी शैतानी हुई॥
पवन कुमार शर्मा ( शिक्षक)
दुमदुमा  (असम)
मो.नं.9954327677

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