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राष्ट्रीय विज्ञान दिवस : जिज्ञासा से जागरण तक, प्रयोग से प्रगति तक जब प्रकाश ने राष्ट्र का आत्मविश्वास जगाया- डा. सुजीत तिवारी
कल्पना कीजिए एक साधारण प्रयोगशाला, सीमित संसाधन, परंतु भीतर असीम जिज्ञासा। एक वैज्ञानिक प्रकाश की किरण को काँच से गुजारता है और उस सूक्ष्म परिवर्तन में भविष्य का भारत देख लेता है। वह क्षण भौतिकी का प्रयोग के साथ भारतीय आत्मविश्वास का उदय था।
28 फ़रवरी 1928 को चंद्रशेखर वेंकट रामन द्वारा की गई ‘रमन प्रभाव’ की खोज ने यह सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा राजनैतिक पराधीनता के परे और भौगोलिक सीमाओं से बड़ी होती है। औपनिवेशिक दौर के भारत में यह खोज केवल वैज्ञानिक उपलब्धि एक बौद्धिक स्वतंत्रता की घोषणा थी।
राष्ट्रीय विज्ञान दिवस हमें हर वर्ष यह याद दिलाता है कि जब समाज प्रश्न पूछना सीखता है, तभी वह आगे बढ़ता है। जैसा कि भारत के पूर्व राष्ट्रपति और वैज्ञानिक ए पी जे अब्दुल कलाम ने कहा था—
“विज्ञान मानवता का वरदान है और उसका सही उपयोग ही विकास का आधार है।”
चंद्रशेखर वेंकट रामन द्वारा की गई खोज रमन प्रभाव यह बताता है कि जब प्रकाश किसी पदार्थ से गुजरता है तो उसकी तरंगदैर्घ्य में सूक्ष्म परिवर्तन होता है। यह परिवर्तन पदार्थ की आंतरिक संरचना के रहस्य खोल देता है। आज रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी का उपयोग चिकित्सा, रसायन, पर्यावरण, नैनो प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष अनुसंधान तक में हो रहा है।कैंसर की प्रारंभिक पहचान, औषधियों की गुणवत्ता जाँच, फॉरेंसिक विश्लेषणइन सभी क्षेत्रों में यह तकनीक अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई है। यह उदाहरण हमें बताता है कि मौलिक शोध का प्रभाव समय के साथ और भी व्यापक हो जाता है।
जैसा कि अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा थ। था “विज्ञान की असली शक्ति जिज्ञासा में ही निहित है।
विज्ञान एक विशेष सोचने का तरीका है जो जो निरीक्षण aur परीक्षण का एक अलग नजरिया प्रदान करत है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण समाज को तर्कशील, जागरूक और जिम्मेदार बनाता है। जो स्वयं के साथ साथ किसीको भी जबरन सही कहने के विपरित गलतियां ढूँढने में प्रोत्साहित करता है और कई परीक्षणों के पाश्चात्य निष्कर्ष निकाला जाता है l क्योंकि jab निर्णय प्रमाण पर आधारित होते हैं, तब विकास स्थायी होता है।
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ को राष्ट्र निर्माण का अनिवार्य तत्व माना था। उनका विश्वास था कि वैज्ञानिक सोच ही आधुनिक भारत की नींव रखेगी।
आज कृषि में ड्रोन तकनीक, कृत्रिम उपग्रह का तथ्य, डिजिटल भुगतान प्रणाली, जैव प्रौद्योगिकी, हरित ऊर्जा और अंतरिक्ष अनुसंधान ये सब उसी वैज्ञानिक संस्कृति के परिणाम हैं। वैश्विक आर्थिक और राजनैतिक परिस्थितियों हमें सदैव आत्मनिर्भर होने को कहती हैंl पर सही शब्दों में ‘आत्मनिर्भर भारत’ का विचार भी तभी साकार होगा जब अनुसंधान और नवाचार को सामाजिक आंदोलन का रूप दिया जाए।
विज्ञान की गहराई को समझने के लिए भाषा का सहज होना आवश्यक है। अंग्रेजी से दुनिया में चलनेवाले विषयों के बारे में पता लगा सकते हैं, हर भारतीय विज्ञान को अपनी तरह से सोच और अपना नहीं पाएगा l शिक्षा नीति 2020 ने मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा पर बल देकर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। जब विद्यार्थी अपनी भाषा में विज्ञान पढ़ता है, तो वह अवधारणा को आत्मसात करता है, केवल याद नहीं करता।
महात्मा गांधी ने भी शिक्षा को मातृभाषा से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया था। ज्ञान का लोकतंत्रीकरण तभी संभव है जब विज्ञान की सामग्री भारतीय भाषाओं में सुलभ हो। इससे ग्रामीण और वंचित वर्ग की प्रतिभाएँ भी आगे आएंगी।
सरकारी पहल और भविष्य की दिशा
अटल टिंकरिंग लैब, स्टार्टअप प्रोत्साहन योजनाएँ, अनुसंधान छात्रवृत्तियाँ, सुपरकंप्यूटिंग मिशन और अंतरिक्ष कार्यक्रम—ये सभी प्रयास युवा पीढ़ी को शोध और नवाचार की ओर प्रेरित कर रहे हैं।
किन्तु चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। अनुसंधान पर निवेश बढ़ाना, उद्योग–शिक्षा संस्थानों के बीच मजबूत सहयोग स्थापित करना और ग्रामीण क्षेत्रों तक वैज्ञानिक अवसंरचना पहुँचाना आवश्यक है।
जैसा कि विक्रम साराभाई ने कहा था “ तकनीक का उद्देश्य समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान होना चाहिए।उद्योग, विश्वविद्यालय और विज्ञान आधारित समाज
विश्वविद्यालय ज्ञान के केंद्र हैं और उद्योग उसके अनुप्रयोग के माध्यम। जब दोनों के बीच समन्वय होता है, तब नवाचार जन्म लेता है। स्टार्टअप संस्कृति ने युवाओं को जोखिम लेने और नए प्रयोग करने का साहस दिया है।
विज्ञान आधारित समाज में नागरिक केवल उपभोक्ता नहीं होते, बल्कि सहभागी होते हैं। वे पर्यावरण संरक्षण को समझते हैं, ऊर्जा बचत को अपनाते हैं और डिजिटल साक्षरता को महत्व देते हैं।
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का एक और कथन यहाँ स्मरणीय है
“विज्ञान सपनों को क्रिया में बदलने की शक्ति देता है” विज्ञान के इस सामर्थ्य को जानकर ही स्वामी विवेकानंद जी ने प्रेरणा दिया था जिससे प्रेरित होकर जमशेद जी टाटा ने टाटा इंस्टिट्यूट की स्थापना की थी , जो आज इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस बैंगलोर, के रूप में विख्यात है.
राष्ट्रीय विज्ञान दिवस केवल एक एक सतत स्मरण की तिथि है कि विकास का मार्ग प्रयोगशालाओं से होकर समाज तक जाना चाहिए । यह दिन हमें अतीत की उपलब्धियों पर गर्व करना सिखाता है, वर्तमान की चुनौतियों को समझने का साहस देता है और भविष्य के लिए नए सपने देखने की प्रेरणा देता है।
यदि हमारे विद्यालय जिज्ञासा को सम्मान दें, विश्वविद्यालय मौलिक शोध को प्रोत्साहित करें, उद्योग नवाचार को अपनाएँ और नागरिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जीवन का हिस्सा बनाएँ, तो भारत ज्ञान आधारित महाशक्ति बनने की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा सकता है।
विज्ञान अंधकार में जलता हुआ वह दीपक है, जो रास्ता दिखाने के साथसाथ, आगे बढ़ने का साहस भी देता है। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस उसी साहस, उसी जिज्ञासा और उसी जिम्मेदारी का उत्सव है एक ऐसे भारत के लिए, जो तर्क, शोध और मानवीय मूल्यों के साथ विकास की नई ऊँचाइयों को छूने को तैयार है।





















