एनसीईआरटी पुस्तक विवाद : गाल पर पड़ा तमाचा
– राधा रमण
एनसीईआरटी ने भले ही कक्षा 8 की अपनी सामाजिक विज्ञान (सोशल साइंस) की किताब से ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ वाला चेप्टर हटाने का फैसला कर लिया है और देश के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से इस चूक के लिए माफी मांग ली है, लेकिन यह मामला फिलहाल थमता नहीं दिखाई देता है। देश के वरिष्ठ वकील और पूर्व केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल द्वारा अदालत को जानकारी देने बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का स्वत: संज्ञान लिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने दोटूक कहा कि दुनिया में किसी को भी न्यायपालिका को बदनाम करने और उसकी अखंडता को धूमिल करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। यह एक सोची-समझी और गहरी साजिश लगती है। मुझे पता है ऐसे लोगों से कैसे निपटना है। जिम्मेदार लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। मामले की गहराई से जांच होगी और केस बंद नहीं किया जाएगा।
इसके बाद मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले की सुनवाई के लिए अपनी अध्यक्षता में, न्यायाधीश जोयमाल्या बागची और न्यायाधीश विपुल एम पंचोली की एक पीठ गठित कर दी है। यह पीठ इस मामले की सुनवाई करेगी। साथ ही उक्त पुस्तक के प्रकाशन, प्रसारण और बिक्री पर रोक लगा दी। अदालत ने साफ- साफ कहा कि पुस्तक की डिजिटल प्रति भी कहीं दिखाई नहीं पड़नी चाहिए, अन्यथा उसे अदालत की अवमानना मानी जाएगी। साथ ही किताब की सभी प्रिंट और डिजिटल कॉपियों को तुरंत जब्त कर सार्वजनिक पहुंच से हटाने का आदेश दिया। अदालत की फटकार से सरकार और एनसीईआरटी दोनों के हाथ-पांव फूले हुए हैं। एनसीईआरटी की तरफ से अदालत में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट से माफी मांगते हुए कहा कि चेप्टर तैयार करने वाले दो लोगों को काम से विरत कर दिया गया है। साथ ही यूजीसी या किसी मंत्रालय के साथ उनके काम करने पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया गया है। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि ‘यह तो बहुत आसान होगा और वह बच निकलेंगे। उन्होंने गोली चलाई और न्यायपालिका का खून बह रहा है। यह एक सोची-समझी चाल है। पूरे शिक्षक समुदाय को यह बताया जाएगा कि भारतीय न्यायपालिका भ्रष्ट है और मुकदमें लंबित पड़े हैं। फिर यह बात छात्रों तक पहुंचेगी और उसके बाद उनके माता-पिता तक। ऐसा लगता है कि न्यायपालिका को बदनाम करने के लिए यह एक गहरी और सुनियोजित साजिश रची गयी है। किसी भी दोषी को छोड़ा नहीं जाएगा और इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा मिलेगी।‘
मुख्य न्यायाधीश की फटकार अनायास नहीं कही जा सकती। दरअसल, नियमों के मुताबिक एनसीईआरटी ने पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए तीन लेयर कमेटी की व्यवस्था कर रखी है, जिसमें 57 विषय विशेषज्ञों को जिम्मेदारी दी गयी है, ताकि किसी स्तर पर गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं रहे। जिस विवादास्पद पाठ्यपुस्तक की बात हो रही है, उसे तैयार करने के लिए भी तीन कमेटियां बनाई गयी थी। पहली कमेटी पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति के अध्यक्ष आईआईटी गांधीनगर के अतिथि प्राध्यापक मिशेल डैनिनो थे। इसमें मिशेल के अलावा 14 सदस्य शामिल थे। इसके अलावा पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति के कामकाज पर नजर रखने के लिए एक 23 सदस्यीय समीक्षक समिति बनाई गयी थी। उसके अध्यक्ष डीपीएस गुरुग्राम की निदेशक और प्रधानाचार्या अदिति मिश्रा थीं। तीसरी और आख़िरी कमेटी राष्ट्रीय पाठ्यक्रम व शिक्षण अधिगम सामग्री समिति थी, जिसका काम पाठ्यपुस्तक में शामिल सामग्री को अंतिम रूप देना था। इस समिति में 19 सदस्य थे। इसका अध्यक्ष राष्ट्रीय शैक्षिक योजना व प्रशासन संस्थान के कुलाधिपति एम सी पंत को बनाया गया था। तीनों कमेटियों के सभी सदस्य अपने विषय के विशेषज्ञ बताये जाते हैं।
एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों को तैयार करने की जो व्यवस्था है, उनमें पहले चरण में बच्चों को किस कक्षा के स्तर पर क्या पढ़ाना है, इसका फ्रेमवर्क तैयार किया जाता है। फिर, उसी फ्रेमवर्क के तहत पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति को नई पाठ्यपुस्तकों को तैयार करने का जिम्मा दिया जाता है। इसके लिए विषय की जरूरत को देखते हुए संबंधित विशेषज्ञों को कमेटी में शामिल किया जाता है। उनमें आपस में चर्चा की जाती है। फिर दूसरी कमेटी समीक्षक समिति उसका अध्ययन करती है। उसके अग्रसारित करने के बाद तीसरी और आखिरी कमेटी राष्ट्रीय पाठ्यक्रम व शिक्षण अधिगम सामग्री समिति उसका अध्ययन कर पुस्तक प्रकाशन के लिए भेजती है।
ऐसे में सवाल उठना वाजिब है कि इतने काबिल लोगों के होते हुए आखिर यह विवादास्पद विषय पाठ्यक्रम में शामिल कैसे हो गया ? साथ ही पुस्तक छपकर बाजार में कैसे आ गई ? इसे साजिश नहीं तो और क्या कहा जाएगा ? अव्वल तो न्यायपालिका में भ्रष्टाचार आठवीं कक्षा के छात्रों को पढ़ाने का कोई तुक नहीं था। एक अदालत ही है जिस पर देश के करोड़ों लोगों की उम्मीद टिकी है। अगर, अदालत की गरिमा का क्षरण हो जाए, अदालत निष्पक्ष नहीं रहे तो लोगबाग न्याय की उम्मीद लिये कहां जाएंगे ? यह भी मान लीजिए कि लेखक ने अपनी कुंठा से अथवा किसी के बहकावे में आकर विवादास्पद पाठ लिख दिया तो कमेटी के बाकी लोग क्या धतूरा खाकर बैठे थे ? किसी ने उस पर आपत्ति क्यों नहीं जताई ? आश्चर्य है कि इतनी बड़ी चूक हो गयी और पुस्तक छपने से पहले किसी को पता नहीं चला। माना कि एनसीईआरटी एक स्वायत्तशासी संगठन है। तो क्या एनसीईआरटी की कमेटियां महज खानापूरी के लिए हैं ?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एनसीईआरटी के निदेशक और केन्द्रीय शिक्षा सचिव को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साथ ही सिलेबस से जुड़ी बैठकों की कार्यवाही और विवादित चेप्टर लिखने वाले लेखकों के नाम और उनकी योग्यता बताने को भी कहा है। इससे यह पता चलता है कि मामले की सुनवाई आगे भी जारी रहेगी। फिलहाल अगली सुनवाई के लिए 17 मार्च की तारीख तय की गयी है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने भी कहा है कि विवादित चेप्टर तैयार करने में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि सरकार न्यायपालिका का पूरा सम्मान करती है और उसका अपमान करने का सरकार का कोई इरादा नहीं है।
बहरहाल, ऐसा लगता है कि बात निकली है तो बहुत दूर तलक जाएगी। यह पहला मामला नहीं है, जब सुप्रीम कोर्ट को शिक्षण संस्थानों के मामले में दखल देना पड़ा है। इससे पहले हाल ही में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के एक नियमन को लेकर भी विवाद हो गया था। इससे सामाजिक सद्भाव बिगड़ने लगा था। उसकी अनुगूँज अब भी यदाकदा सुनाई पड़ती है। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उस नियमन पर रोक लगा दी थी। उसकी भी जांच चल रही है। उस समय भी शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने जांच के बाद कार्रवाई करने की बात कही थी। बेशक, सुप्रीम अदालत को मामले की तह तक जाना और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी ही चाहिए ताकि समाज में सद्भाव बना रहे। ।





















