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ढोल_गंवार_शूद्र_पशु_नारी, चौपाई पर विवाद, हकीकत क्या है?

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ढोल_गंवार_शूद्र_पशु_नारी, चौपाई पर विवाद, हकीकत क्या है?
– अमरीश मनीष शुक्ल, प्रयागराज
“#ढोल_गंवार_शूद्र_पशु_नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी”…. तुलसीदास जी की इस एक चौपाई को लेकर खूब ड्रामा होता है। एक नेता तो अपना करियर इसी पे चला रहे हैं। यह चौपाई आज से नहीं सदियों से कुछ लोगों द्वारा विवादों के घेरे में रही है। क्या तुलसीदास ने वाकई ‘पिटाई’ की बात कही थी ? या रचा गया था सनातन के विरुद्ध कुचक्र, आखिर एक शब्द ताड़ना को हमने सदियों से गलत क्यों समझा। असल में यह चौपाई  विवाद की नहीं, बल्कि ‘मैनेजमेंट’ (Management) की एक ऐसी मास्टरक्लास है जिसे आज के बड़े-बड़े कॉर्पोरेट गुरु भी सिखाते हैं।
क्या आप जानते हैं कि जिस चौपाई को लेकर आज के दौर में सबसे ज्यादा विवाद होता है, वह असल में दुनिया का सबसे पुराना ‘मैनेजमेंट मंत्र’ (Management Mantra) है? जिसे तथाकथित बुद्धिजीवी लोग प्रताड़ना समझकर कोसते रहे, वह दरअसल रिश्तों और जिम्मेदारियों को सहेजने का एक गहरा विज्ञान है। अगर आप भी ‘ताड़ना’ (Taadna) का अर्थ सिर्फ ‘पीटना’ समझते हैं, तो यकीन मानिए—आप एक अद्भुत जीवन-दर्शन से चूक रहे हैं।
एक शब्द, पांच पासवर्ड हैं। समझिए काव्य की जादुई कला को। हम सभी ने बचपन में स्कूल की किताबों में ‘यमक अलंकार’ का वह मशहूर दोहा उदाहरण के तौर पर जरूर पढ़ा होगा।
“कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। या खाए बौराय जग, वा पाए बौराय॥”*
अगर आपने ये पढ़ा सुना है तो समझिए आप आज एक नरेटिव ध्वस्त कर देंगे…..
यहाँ एक ‘कनक’ का मतलब सोना (Gold) है और दूसरे का धतूरा (Poisonous fruit)। ठीक यही भाषाई जादू गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘ताड़ना’ शब्द के साथ किया है। उन्होंने एक ही ‘ताड़ना’ शब्द के पीछे पांच अलग-अलग अर्थ (Meanings) छिपा रखे हैं, जो व्यक्ति के स्वभाव के अनुसार बदल जाते हैं। तुलसीदास जी की चौपाई में यमक अलंकार तो नहीं है, यहां श्लेष अलंकार है।  लेकिन हम कवि की क्षमता को यहां समझ सकते हैं।
कवि विशंभर द्विवेदी अचल जी मार्गदर्शन करते हैं। कहते हैं
 इसी तरह श्लेष अलंकार का एक उदाहरण देखते है । इससे बात एकदम स्पष्ट हो जाएगी।
 रहिमन पानी राखिए ,बिन पानी सब सून।
 पानी गए न ऊबरै , मोती  मानुष   चून  ।।
 रहीम जी के इस दोहे में जैसे मोती मानुष और चून के लिए पानी का अर्थ अलग-अलग है, ऐसे ही तुलसीदास जी की चौपाई में ढोल गंवार और शूद्र आदि के लिए ताड़ना का अर्थ अलग-अलग है।
मयंक त्रिपाठी जी मार्गदर्शन करते हैं।  कहते हैं  यहां श्लेष अलंकार का एक और उदाहरण है। जहां एक ही शब्द के कई अर्थ चिपके होते हैं।
चरण धरत चिंता करत, चितवत चारहु ओर।
सुबरन को खोजत फिरत कवि, व्यभिचारी, चोर ।।
यहां सुबरन के तीनों के लिए अर्थ अलग-अलग है। कवि के लिए सुंदर शब्द, व्यभिचारी के लिए सुंदर महिला और चोर के लिए सोना। इसी तरह ढोल गवार और शूद्र आदि के लिए ताड़ना का अर्थ अलग-अलग है।
अब आते है तुलसी बाबा की
चौपाई पर……
“ढोल गंवार शूद्र पशु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।”
यहाँ गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘ताड़ना’ (Taadna) शब्द का प्रयोग एक ‘अनेकार्थी’ (Polysemous) शब्द के रूप में किया है, जिसका अर्थ हर पात्र के लिए अलग है।
जिसे दुनिया ‘प्रताड़ना’ समझती रही, असल में वह ‘परखने’ और ‘सहेजने’ का वो अद्भुत विज्ञान है, जिसे समझे बिना आप न घर चला सकते हैं और न कोई बड़ा संस्थान। आइए, इस चौपाई की परतों को बहुत सादगी से खोलते हैं।
कल्पना कीजिए, आपके घर में पाँच अलग-अलग चीजें हैं। क्या आप सबको एक ही तरीके से इस्तेमाल करेंगे? बिल्कुल नहीं!
1. लोहे का औज़ार (जैसे कुदाल या कैंची): अगर आप इसे खुले में छोड़ देंगे, तो इसमें जंग लग जाएगा। इसे तेल लगाकर, साफ़ करके रखना पड़ता है। यहाँ ताड़ना का मतलब है— जंग से बचाना।
 2. मिट्टी का घड़ा: इसे आप लोहे की तरह पटक नहीं सकते, वरना टूट जाएगा। इसे बहुत सहेज कर और सही जगह पर रखना पड़ता है। यहाँ ताड़ना का मतलब है— टूटने से बचाना।
 3. रसोई की आग: इसे अगर चूल्हे में सीमित न रखें, तो घर जल सकता है। इसे काबू में रखना जरूरी है। यहाँ ताड़ना का मतलब है— मर्यादा में रखना।
 4. छोटा बच्चा: बच्चा नासमझ होता है। उसे हर पल देखना पड़ता है कि कहीं वह आग न छू ले या गिर न जाए। यहाँ ताड़ना का मतलब है— निगरानी करना।
 5. कीमती गहने: इन्हें आप रास्ते पर नहीं छोड़ते, बल्कि तिजोरी में रखते हैं। यहाँ ताड़ना का मतलब है— सुरक्षा देना।
तुलसीदास जी ने जब कहा “सकल ताड़ना के अधिकारी”, तो उनका मतलब ‘पिटाई’ नहीं है। उनका मतलब है कि समाज या परिवार में इन पाँचों को ‘विशेष ध्यान’ (Special Attention) की जरूरत होती है।
जैसे आप स्कूल में पढ़ते थे तो “कनक कनक ते सौ गुनी…” वाले दोहे में गुरुजी ने बताया था कि  एक ‘कनक’ सोना है और दूसरा धतूरा। एक को पाकर आदमी पागल होता है, दूसरे को खाकर। शब्द एक ही है, पर काम अलग-अलग।
वैसे ही ‘ताड़ना’ का अर्थ इन पाँचों के लिए बदल जाता है।
ढोल: इसे ‘सुर’ में रखना पड़ता है (वरना शोर करेगा)।
 गंवार (नासमझ): इसे ‘समझाकर’ रखना पड़ता है (वरना खुद का नुकसान करेगा)।
 शूद्र (नया सीखने वाला): इसे ‘सिखाकर’ रखना पड़ता है (वरना काम बिगड़ जाएगा)।
 पशु: इसे ‘अनुशासन’ में रखना पड़ता है (वरना भटक जाएगा)।
 नारी: इसे ‘सम्मान और सुरक्षा’ में रखना पड़ता है (क्योंकि वह घर की नींव है)।
चाहे आप विज्ञान (Science) की बात करें या धर्म की, दोनों का एक ही नियम है— जो चीज जैसी है, उसे वैसी ही देखभाल मिलनी चाहिए।
अगर आप मोबाइल को पानी में डाल देंगे और मछली को धूप में रख देंगे, तो दोनों खराब हो जाएंगे। मोबाइल को सूखा रखना उसकी ‘ताड़ना’ है और मछली को पानी में रखना उसकी ‘ताड़ना’।
यही इस चौपाई का असली ‘मैनेजमेंट’ (Management) है: “जिसका जो स्वभाव है, उसे उसी गरिमा के साथ संभालना।” इसमें न कोई छोटा है, न बड़ा; बस सबके साथ व्यवहार का तरीका अलग है।
कल्पना कीजिए कि एक कुशल कारीगर या प्रबंधक (Manager) के पास पाँच अलग-अलग चीजें हैं। उन पाँचों को उपयोगी बनाए रखने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाने पड़ते हैं। तुलसीदास जी ने ‘ताड़ना’ शब्द का प्रयोग इसी ‘देखभाल’ या ‘मैनेजमेंट’ (Management) के लिए किया है।
इसे इस तरह समझिए:
1. ढोल (Drum):
ढोल को यदि आप बिल्कुल छोड़ देंगे, तो उसके तार ढीले हो जाएंगे और वह बेसुरा बजेगा। उसे समय-समय पर ‘कसना’ (Tightening) पड़ता है और सही तरीके से थाप देनी पड़ती है। यहाँ ताड़ना का अर्थ है—सही सुर में लाना।ढोल के संदर्भ में ताड़ना का अर्थ है ‘कसना’ (Tightening) और ‘लय में बजाना’। यदि ढोल के किनारे ढीले हों या उसे सही तरीके से थाप (Beat) न दी जाए, तो वह मधुर स्वर नहीं देता। यहाँ ताड़ना का अर्थ उसे स्वर के अनुकूल (According to rhythm) बनाना है।
ढोल के लिए ताड़ना = ट्यूनिंग (Tuning): जैसे गिटार के तार या ढोल की खाल को सही सुर निकालने के लिए ‘कसा’ जाता है, वैसे ही ढोल को सही सुर में लाने के लिए ताड़ना (बजाना) जरूरी है।
2. गंवार (Unintelligent/Uncivilized):
जो व्यक्ति अज्ञानी या जिद्दी है, उसे यदि खुला छोड़ दिया जाए तो वह अपना नुकसान कर सकता है। उसे ‘सिखाना’ (Teaching) और उस पर ‘नजर रखना’ (Keeping an eye) जरूरी है ताकि वह गलत रास्ते पर न जाए।
जो व्यक्ति नासमझ या उद्दंड है, उसे ‘शिक्षा’ (Education) और ‘निगरानी’ (Monitoring) की आवश्यकता होती है। यहाँ ताड़ना का अर्थ है उसे सही-गलत का ज्ञान देना ताकि वह समाज में मर्यादित रह सके।
गंवार के लिए ताड़ना = उपदेश (Advice): एक समझदार व्यक्ति इशारों से समझ जाता है, लेकिन एक ‘गंवार’ (नासमझ) को बार-बार टोकना और समझाना पड़ता है ताकि वह गलती न करे।
3. शूद्र (Unskilled Person):
यहाँ ‘शूद्र’ का अर्थ उस व्यक्ति से है जो काम सीख रहा है या जिसे तकनीकी ज्ञान नहीं है। उसे सफल बनाने के लिए निरंतर ‘निर्देश’ (Instructions) और मार्गदर्शन’ (Guidance) की जरूरत होती है।
यहाँ ‘शूद्र’ शब्द का प्रयोग जातिगत विद्वेष के लिए नहीं, बल्कि उस समय की ‘कार्य व्यवस्था’ (Work system) के संदर्भ में है। इसका अर्थ है ‘अकुशल’ व्यक्ति जिसे कार्य सिखाने के लिए निरंतर ‘मार्गदर्शन’ (Guidance) और ‘निर्देश’ (Instruction) की जरूरत होती है।
शूद्र के लिए ताड़ना = ट्रेनिंग (Training): यहाँ ‘शूद्र’ का अर्थ उस व्यक्ति से है जो सेवा या शिल्प का कार्य सीख रहा है। उसे कुशल बनाने के लिए गुरु का निरंतर मार्गदर्शन और ‘निगरानी’ (Supervision) जरूरी है।
4. पशु (Animals):
पशु को यदि बिना लगाम या बिना चरवाहे के छोड़ दिया जाए, तो वह खेत उजाड़ सकता है। उसे अनुशासन में रखने के लिए ‘कंट्रोल’ (Control) की आवश्यकता होती है।
पशुओं के संदर्भ में ताड़ना का अर्थ है ‘नियंत्रण’ (Control)। जैसे घोड़े की लगाम या हाथी का अंकुश। यदि पशु को अनुशासित (Disciplined) न रखा जाए, तो वह स्वयं को और दूसरों को हानि पहुँचा सकता है।
पशु के लिए ताड़ना = अनुशासन (Discipline): अगर घोड़े की लगाम ढीली छोड़ दी जाए तो वह रास्ते से भटक जाएगा। यहाँ ताड़ना का मतलब है उसे ‘कंट्रोल’ में रखना।
5. नारी (Women):
उस कालखंड और काव्य के भाव के अनुसार, यहाँ ताड़ना का अर्थ ‘संभालना'(Caring) और ‘सम्मानपूर्वक सुरक्षा’ (Protection) देना है। जैसे एक पिता अपनी पुत्री को या पति अपनी पत्नी को समाज की बुरी नजरों से बचाने के लिए सतर्क रहता है, वही ‘सतर्कता’ यहाँ ताड़ना है।
इस शब्द पर सबसे अधिक विवाद होता है, लेकिन आध्यात्मिक (Spiritual) व्याख्या के अनुसार यहाँ ताड़ना का अर्थ ‘संरक्षण’ (Protection) और ‘देखभाल’ (Care) है। जिस प्रकार एक बहुमूल्य रत्न को सुरक्षा की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार परिवार की गरिमा के रूप में स्त्री को समाज की बुरी नजरों से ‘ताड़कर’ (भांपकर) बचाना परिवार का उत्तरदायित्व माना गया है।
नारी के लिए ताड़ना = सुरक्षा (Caring): जैसे हम किसी कीमती चीज को बहुत ‘सहेजकर’ (Observing carefully) रखते हैं कि कहीं उसे कोई नुकसान न हो जाए, वैसे ही परिवार की स्त्री को सुरक्षा और सम्मान के साथ ‘सहेजने’ की बात कही गई है।
ताड़ना का असली अर्थ ‘पीटना’ नहीं, बल्कि ‘परखना’ और ‘सही स्थिति में रखना’ है।
जैसे एक माली पौधों को ‘ताड़ता’ (देखरेख करता) है ताकि वे मुरझा न जाएं, वैसे ही इन पाँचों को भी विशेष ध्यान (Attention) की आवश्यकता होती है। यदि इन पर ध्यान न दिया जाए, तो ये अपना मूल स्वभाव या उपयोगिता खो सकते हैं।
इसे आज के समय में ‘क्वालिटी कंट्रोल’ (Quality Control) या ‘मेंटोरशिप’ (Mentorship) जैसा समझा जा सकता है।
रामचरितमानस (Ramcharitmanas) की इस चौपाई को लेकर विद्वानों और भाषाविदों (Linguists) के बीच अलग-अलग व्याख्याएं रही हैं। समुद्र द्वारा श्रीराम से कहे गए इस कथन का मर्म समझने के लिए हमें उस समय की परिस्थिति और भाषा के व्याकरण (Grammar) को समझना होगा।
तुलसीदास जी का भाव ‘प्रताड़ित करना’ (Torturing) नहीं, बल्कि ‘परिष्कृत करना’ (Refining) था। समुद्र स्वयं को जड़ और मूर्ख स्वीकार करते हुए कहता है कि इन सबको अपने स्वभाव के अनुसार एक ‘मर्यादा’ (Limit) और ‘देखरेख’ की आवश्यकता होती है।
सरल शब्दों में, यह चौपाई उचित प्रबंधन (Management) और मनोविज्ञान (Psychology) की बात करती है कि किसे किस तरह संभालने से श्रेष्ठ परिणाम मिलते हैं।
जैसे ‘कनक’ का अर्थ सोना सुनकर कोई उसे ‘धतूरा’ समझकर खाने नहीं लगता, वैसे ही इस चौपाई में ‘ताड़ना’ का अर्थ हर जगह ‘पीटना’  (Beating) नहीं समझना चाहिए।
यह काव्य की सुंदरता है कि कवि ने एक ही शब्द से पांच अलग-अलग व्यवस्थाओं (Systems) को संभालने का सूत्र दे दिया है।
सरल भाषा में कहें तो ताड़ना का मतलब है— “जिसकी जो जरूरत है, उसे उस हिसाब से संभालना।”
अंत में, बात चाहे विज्ञान की हो या अध्यात्म की, नियम एक ही है— अस्तित्व की रक्षा ही उसकी ‘ताड़ना’ है।  जैसे एक जौहरी हीरे को उसकी चमक निखारने के लिए ‘ताड़ता’ (Observe) है, जैसे एक माली बगीचे को महकाने के लिए हर पौधे की जरूरत को ‘ताड़ता’ है, वैसे ही यह चौपाई हमें सिखाती है कि हमारे आसपास की हर इकाई—चाहे वह सजीव हो या निर्जीव—हमसे एक खास तरह का ‘ध्यान’ मांगती है।
तुलसीदास जी ने हमें पीटना नहीं, बल्कि ‘प्रीति’ (प्रेम) और ‘प्रतीति’ (समझ) का वह संतुलन सिखाया है, जहाँ अनुशासन कठोरता नहीं बल्कि सुरक्षा का कवच बन जाता है। जिस दिन हम ‘ताड़ना’ का अर्थ ‘पीटना’ (Beating) छोड़कर ‘सहेजना’ (Nurturing) समझ लेंगे, उस दिन समाज की हर बेसुरी धुन एक मधुर संगीत में बदल जाएगी।
धर्म हमें डराना नहीं, बल्कि जीवन जीने का ढंग सिखाता है। और यह चौपाई उस ढंग का सबसे सरल ‘यूजर मैनुअल’ (User Manual) है।
“ताड़ना दंड का विधान नहीं, बल्कि प्रेम के साथ संतुलन बनाए रखने का विज्ञान है।”
फेसबुक से साभार

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