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नीतीश कुमार : सप्त-क्रांति आंदोलन के सच्चे सिपाही – – ई0 प्रभात किशोर

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नीतीश कुमार : सप्त-क्रांति आंदोलन के सच्चे सिपाही – – ई0 प्रभात किशोर

15 अगस्त 2021 को, अपनी स्वतंत्रता की 75 वीं वर्षगांठ ‘अमृत महोत्सव‘ मनाते हुए भारत ने एक इतिहास रचा है। वहीं बिहार में एक और इतिहास गढ़ा गया है, जहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह के 17 साल 52 दिन के मुख्यमंत्रित्व काल के रिकॉर्ड को तोड़ चुके हैं । लगभग दो दशक से बिहार की राजनीति नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द घूम रही है । विधानसभा चुनाव 2025 में बिहार ने एक बार फिर उनके नेतृत्व में आगे बढ़ने का निर्णय किया । उनके नेतृत्व में एनडीए 243 में से 202 सीटें प्रााप्त कर सत्ता में लौटी और वह रिकॉर्ड 10वीं बार मुख्यमंत्री बने ।

हरनौत (नालंदा) के कल्याणबीघा गांव के कुर्मी किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले नीतीश कुमार ने 1974 में अपनी राजनीतिक यात्रा प्रारंभ की जब जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में छात्र आंदोलन हुआ था। पटना स्थित बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (अब एनआईटी) में अध्ययन करते हुए, उन्होंने खुद को पूरी तरह से क्रांति के लिए समर्पित कर दिया। उन्हें 1974 में मीसा के तहत और 1975 में आपातकाल के दौरान हिरासत में लिया गया । 1977 में, उन्होंने हरनौत निर्वाचन क्षेत्र से वरिष्ठ समाजवादी नेता भोला प्रसाद सिंह के खिलाफ विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन सफल नहीं हो सके। वह पुनः 1980 का चुनाव निर्दलीय अरुण सिंह से हार गए, जिन्हें बेलछी नरसंहार में गलत तरीके से फंसाया गया था। 8वें लोकसभा चुनाव 1984 में, वरिष्ठ कांग्रेस नेता और इंदिरा गांधी सरकार में पूर्व मंत्री श्री धर्मवीर सिंह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर में कांग्रेस (आई) के एक नवागंतुक प्रत्याशी से हार गए। हरनौत और चंडी क्षेत्र में धर्मवीर बाबू की हार से जनता में भारी आक्रोश था। नीतीश ने लोकसभा चुनाव में उनके लिए प्रचार किया था। इससे नीतीश को अपने तीसरे प्रयास में 1985 में विधानसभा के लिए निर्वाचित होने में मदद मिली, जिसके बाद उनके राजनीतिक ग्राफ में तेजी से उछाल आया।

नीतीश कुमार को 1987 में युवा लोक दल का अध्यक्ष और 1989 में नवगठित जनता दल का प्रधान महासचिव बनाया गया। 1989, 1991, 1996, 1998, 1999 में वे बाढ़ निर्वाचन क्षेत्र से और 2004 में नालंदा निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुने गए। । अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में, उन्होंने 1990 में राज्य मंत्री (कृषि), 1998 में कैबिनेट मंत्री (रेलवे), 1999 में भूतल परिवहन मंत्री, 1999 में कृषि मंत्री और 2001 में रेल मंत्री के रूप में कार्य किया। पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की मृत्यु के पश्चात लालू प्रसाद को विधायक दल के नेता के रूप में चुने जाने तथा 1990 में जनता दल के सत्ता में आने पर उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में चुनने हेतु विधायकों का समर्थन जुटाने में नीतीश ने अहम भूमिका निभायी । वह बिहार राजनीति के ‘चाणक्य‘ के रूप में प्रसिद्ध हुए। । नीतीश और लालू दोनों को बिहार में देवीलाल के दाएं और बाएं हाथ कहा जाता था लेकिन जब मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू हुई तो उन्होंने वी.पी. सिंह का साथ दिया।

जनता दल जनता से कुछ वादों पर सत्ता में आया था। नीतीश ने विभिन्न परियोजना कार्यों के क्रियान्वयन के लिए राज्य सरकार को कार्ययोजना प्रस्तुत की, लेकिन अब वे लालू की प्राथमिकता नहीं रह गये थे। उनके सुझावों को दरकिनार कर दिया गया और लालू के द्वारा उनके संबंध में उल-जुलूल टिप्पणियां की जाने लगी। नीतीश कुमार को धीरे-धीरे पार्टी कार्यक्रमों से भी किनारे किया जाने लगा और लालू के साथ उनका बने रहना असहनीय हो गया। 1994 में कुर्मी समाज और लव-कुश सम्मेलन की आक्रामक रैली शासन के खिलाफ समाज के गैर-यादव वर्गों में नाराजगी का संकेत थी। नीतीश काफी देर से रैली में शामिल हुए और उन्होंने महसूस किया कि लड़ाई लड़ने का उपयुक्त समय आ गया है। अन्य छोटे कारीगरों और भूमिहीन समुदायों के द्वारा भी अपनेे उत्थान और सत्ता में समान हिस्सेदारी हेतु आवाज उठाई गई।

1994 में जनता दल में टूट हुई तथा वरिष्ठ समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीस के नेतृत्व में समता पार्टी का गठन किया गया था। 1995 के चुनाव में नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश किया गया था, लेकिन पार्टी बुरी तरह फ्लॉप हो गई। गहन विचार-विमर्श के उपरान्त भाजपा-समता पार्टी गठबंधन अस्तित्व में आया और इसका सकारात्मक प्रभाव आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में देखा गया। वर्ष 2000 के चुनाव में, किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला और तत्कालीन राज्यपाल द्वारा नीतीश को मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया था। लेकिन वह विधायकों से बहुमत का समर्थन जुटाने में सफल नहीं हुए और महज 7 दिनो में त्याग पत्र देना पड़ा। 2004 में वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के पतन के बाद, उन्होंने खुद को पूरी तरह से बिहार के लिए समर्पित कर दिया और राज्य सरकार के कुशासन के खिलाफ कई यात्राओं का नेतृत्व किया। नवंबर 2005 के चुनाव में उनके नेतृत्व में एनडीए को पूर्ण बहुमत मिला और उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। तब से वह अपने नामित उत्तराधिकारी जीतन राम मांझी के 278 दिनों के शासन को छोड़कर मुख्यमंत्री हैं।

नीतीश कुमार ने खुद को जातिवाद और पारिवारिक मंडली से दूर रखा। राजद के माई समीकरण और कांग्रेस, भाजपा या कम्युनिस्टों की उच्च जाति वर्चस्व की राजनीति के विपरीत समाज के नीतीश सभी वर्गों के साथ संतुलित सामाजिक इंजीनियरिंग के साथ आगे बढ़े। उन्होंने नौकरशाही के साथ-साथ पार्टी संगठन में अपनी ही जाति के लोगों के वास्तविक अधिकारों की कीमत पर हमेशा अन्य जातियों को प्राथमिकता दी। वरिष्ठतम आईएएस अधिकारी के.डी. सिन्हा को इस कारण मुख्य सचिव नहीं बनाया गया है क्योंकि वे उनकी जाति के थे। इसी तरह से आईपीएस अधिकारी आशीष रंजन सिन्हा को स्वजातीय होने के कारण डीजीपी के पद से हाथ धोना पड़ा । पार्टी का मेरूदंड होने के बावजूद, उनकी जाति के लोगों को लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा या विधान परिषद की उम्मीदवारी और मंत्री पद पर कभी भी समुचित हिस्सेदारी नहीं मिली। लगभग 30 प्रतिशत जनसंख्या वाली अत्यंत पिछड़ी जातियाँ, पिछड़े पसमांदा मुस्लिम, महादलित और महिलाएँ हमेशा से ही उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता रहे। वस्तुतः 2020 के बिहार चुनाव एनडीए बनाम महागठबंधन नहीं था, बल्कि नीतीश बनाम अन्य सभी था । जब भाजपा के कोर सवर्ण मतदाताओं ने नीतीश को हरानेे में कोर कसर नहीं छोड़ी, तब यही अभिवंचित तबके जिन्हें साइलेंट वोटर कहा जाता है, राजनीतिक अखाड़े में नीतीश के पीछे मजबूती से खड़े थे ।

(लेखक अभियंता एवं शिक्षाशास्त्री हैं।)

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