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बराक घाटी में स्थायी हाईकोर्ट बेंच की मांग को लेकर बड़ा प्रशासनिक और कानूनी घटनाक्रम

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बराक घाटी में स्थायी हाईकोर्ट बेंच की मांग को लेकर बड़ा प्रशासनिक और कानूनी घटनाक्रम

गौहाटी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को सौंपा गया 112 पृष्ठों का विस्तृत अतिरिक्त स्मारकपत्र

शिलचर, 7 मई : बराक घाटी में स्थायी हाईकोर्ट बेंच स्थापित करने की लंबे समय से चली आ रही मांग को लेकर गुरुवार को एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और कानूनी प्रगति सामने आई। हाई कोर्ट बेंच डिमांड इम्प्लीमेंटेशन कमिटी, कछार जिला इकाई की ओर से माननीय गौहाटी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष 112 पृष्ठों का विस्तृत अतिरिक्त स्मारकपत्र औपचारिक रूप से प्रस्तुत किया गया। इससे पहले 12 जनवरी 2026 को मूल स्मारकपत्र दायर किया गया था, जिसके क्रम में यह अतिरिक्त प्रस्तुति दी गई है।

स्मारकपत्र में बराक घाटी के लोगों को न्याय प्राप्त करने में आने वाली भौगोलिक, प्रशासनिक, आर्थिक और अवसंरचनात्मक समस्याओं का विस्तृत और तथ्याधारित विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। इसमें कहा गया है कि बराक घाटी के लोगों को न्यायिक कार्यों के लिए गौहाटी हाईकोर्ट तक पहुंचने हेतु लगभग 350 से 400 किलोमीटर की लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जो विशेष रूप से गरीब, ग्रामीण और वंचित वर्गों के लिए अत्यंत कठिन और खर्चीला साबित होता है।

स्मारकपत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि बराक घाटी क्षेत्र में बार-बार आने वाली बाढ़, भूस्खलन तथा पहाड़ी इलाकों की कमजोर परिवहन व्यवस्था के कारण न्यायार्थियों का नियमित रूप से अदालत में उपस्थित होना कई बार संभव नहीं हो पाता। इसके चलते मामलों के निपटारे में देरी होती है और न्याय प्राप्ति व्यावहारिक रूप से बाधित हो जाती है।

संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लेख करते हुए स्मारकपत्र में समानता के अधिकार तथा जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत प्रभावी न्याय प्राप्ति को मौलिक अधिकार बताया गया है। इसमें कहा गया कि यदि न्याय केवल संवैधानिक घोषणा बनकर रह जाए और आम लोगों के लिए व्यावहारिक रूप से सुलभ न हो, तो उसका वास्तविक महत्व समाप्त हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों और न्यायिक टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा गया कि न्याय व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो हर नागरिक के लिए व्यवहारिक रूप से सुलभ हो। न्याय व्यवस्था का अत्यधिक केंद्रीकरण असमानता को बढ़ाता है, जबकि विकेंद्रीकरण न्याय को अधिक प्रभावी और जनोन्मुख बनाता है।

स्मारकपत्र में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक स्थिति का भी उल्लेख किया गया है कि असम सरकार पहले ही इस विषय पर गौहाटी हाईकोर्ट से आधिकारिक राय मांग चुकी है। ऐसे में यह मामला वर्तमान में प्रशासनिक और न्यायिक—दोनों स्तरों पर सक्रिय विचाराधीन है। माना जा रहा है कि गुरुवार को प्रस्तुत 112 पृष्ठों का यह विस्तृत अतिरिक्त स्मारकपत्र निर्णय प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में प्रभाव डाल सकता है।

स्मारकपत्र में यह भी स्पष्ट किया गया कि बराक घाटी में स्थायी हाईकोर्ट बेंच की मांग कोई नई मांग नहीं है। यह मुद्दा पूर्व में कई बार संसद में उठ चुका है। विशेष रूप से 22 मई 2012 को लोकसभा में नियम 377 के अंतर्गत “Need to set up a Bench of Gauhati High Court at Silchar, Assam” विषय पर चर्चा के दौरान शिलचर में हाईकोर्ट बेंच स्थापित करने की मांग प्रमुखता से उठाई गई थी। उस समय न्यायार्थियों को गौहाटी तक लंबी दूरी तय करने की कठिनाइयों पर गंभीर चर्चा हुई थी।

इसके अलावा 3 जनवरी 1991 को राज्यसभा में एक अतारांकित प्रश्न के उत्तर में तत्कालीन केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा था कि बराक घाटी में हाईकोर्ट बेंच स्थापित करने के संबंध में कई प्रतिनिधित्व प्राप्त हुए थे, लेकिन असम सरकार की ओर से औपचारिक प्रस्ताव न मिलने के कारण केंद्र सरकार उस समय कोई कदम नहीं उठा सकी। इन संसदीय दस्तावेजों की प्रतियां भी स्मारकपत्र के साथ संलग्न की गई हैं।

जनसंख्या के आधार पर भी स्मारकपत्र में महत्वपूर्ण तथ्य प्रस्तुत किए गए हैं। इसमें कहा गया कि कछार, श्रीभूमि और हैलाकांदी जिलों की संयुक्त जनसंख्या लगभग 45 लाख है तथा दीमा हसाओ को शामिल करने पर यह संख्या लगभग 47.5 लाख तक पहुंच जाती है। इतने बड़े जनसमूह के लिए न्याय तक आसान पहुंच सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है।

भौगोलिक और प्राकृतिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि पहाड़ी क्षेत्र, बाढ़ प्रभावित इलाके और कमजोर संचार व्यवस्था के कारण बराक घाटी के लोगों के लिए गौहाटी की यात्रा कई बार अनिश्चित और अत्यंत कठिन हो जाती है। यह स्थिति न्याय प्राप्ति के मार्ग में वास्तविक बाधा उत्पन्न करती है।

तुलनात्मक विश्लेषण में जलपाईगुड़ी में कोलकाता हाईकोर्ट की बेंच स्थापना का उदाहरण भी प्रस्तुत किया गया। वहां दूरी, मामलों के दबाव और जनसुविधा को ध्यान में रखते हुए न्यायिक विकेंद्रीकरण किया गया था। स्मारकपत्र में दावा किया गया कि बराक घाटी के मामले में ऐसे तर्क और भी अधिक मजबूत रूप से लागू होते हैं।

स्मारकपत्र में कहा गया कि न्याय केवल अदालतों और कानूनी ढांचे तक सीमित अवधारणा नहीं है, बल्कि यह आम लोगों के जीवन से सीधे जुड़ा विषय है। न्याय व्यवस्था का अत्यधिक केंद्रीकरण जनता के विश्वास और सहभागिता को कमजोर करता है, जबकि विकेंद्रीकरण न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी और जनहितैषी बनाता है।

इसके साथ ही यह भी उल्लेख किया गया कि पूर्व में विभिन्न प्रशासनिक स्तरों पर इस विषय पर विचार हुआ था, लेकिन वर्तमान समय की बदली परिस्थितियों, अवसंरचनात्मक विकास, बेहतर संपर्क व्यवस्था और बढ़ते मामलों के दबाव को देखते हुए अब इस विषय का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक हो गया है।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2016 में “The Gauhati High Court (Establishment of a Permanent Bench at Silchar) Bill” नामक एक प्राइवेट मेंबर्स बिल भी संसद में प्रस्तुत किया गया था, जिसका मुख्य उद्देश्य बराक घाटी के लोगों को सुलभ और प्रभावी न्याय उपलब्ध कराना था। लंबे समय से यह विधेयक विचाराधीन रहने के कारण इस मुद्दे की प्रासंगिकता और बढ़ गई है।

112 पृष्ठों के इस विस्तृत स्मारकपत्र पर हाई कोर्ट बेंच डिमांड इम्प्लीमेंटेशन कमिटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता धर्मानंद देव ने हस्ताक्षर किए और इसे औपचारिक रूप से माननीय मुख्य न्यायाधीश को सौंपा गया।

संबंधित हलकों में माना जा रहा है कि असम सरकार द्वारा हाईकोर्ट से राय मांगे जाने और अब इस विस्तृत अतिरिक्त स्मारकपत्र के प्रस्तुत होने के बाद बराक घाटी में स्थायी हाईकोर्ट बेंच की मांग एक निर्णायक प्रशासनिक चरण में प्रवेश कर चुकी है।

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