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गंगा दशहरा पर विशेष

पतित-पावनी माँ गंगा के अवतरण की पौराणिक, ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक महागाथा का प्रतीक है ‘गंगा दशहरा’ का महापर्व
भारतीय जनमानस के जीवन में पर्व, उत्सव, संस्कार, संस्कृति, सभ्यता एवं परम्पराओं का विशिष्ट महत्त्व रहा है। सनातन संस्कृति में प्रत्येक पर्व केवल उत्सव मात्र नहीं, अपितु लोकजीवन के आध्यात्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना का संवाहक होता है। इन्हीं दिव्य पर्वों में गंगा दशहरा का स्थान अत्यंत पवित्र एवं महनीय है। यह पर्व केवल माँ गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की स्मृति नहीं, बल्कि धर्म, अध्यात्म, लोकमंगल, तप, त्याग एवं प्रकृति-संरक्षण के विराट संदेश का उद्घोष भी है।
यदि माँ गंगा के अवतरण का सूक्ष्म एवं गम्भीर दृष्टि से चिन्तन किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि गंगा केवल एक नदी नहीं, अपितु भारतीय संस्कृति की सनातन चेतना, शाश्वत करुणा और जीवनदायिनी ऊर्जा की प्रतीक हैं। वे प्राचीन काल से लेकर वर्तमान युग तक मानव सभ्यता के समस्त उतार-चढ़ावों की साक्षी बनकर प्रवाहित होती रही हैं। ‘धरती’ अर्थात् ‘धरित्री’—जो समस्त सृष्टि को धारण करती है, उसी प्रकार माँ गंगा भी समस्त लोक के पाप, संताप, विषमताएँ और क्लेश अपने भीतर समाहित कर लोककल्याण के लिए निरंतर प्रवाहित होती रहती हैं। उनका जीवन सहज नहीं रहा, किन्तु विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने निर्मलता, शीतलता और करुणा का प्रवाह कभी नहीं रोका। शास्त्रों में उन्हें स्वयं भगवान शंकर की जटाओं से अवतरित दिव्य शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है।
गंगा अवतरण की कथा का मूल प्रसंग उस समय से जुड़ा है जब महाराज सगर के साठ हजार पुत्र श्रापवश भस्म हो गए थे और उनकी आत्माओं की मुक्ति के लिए दिव्य गंगाजल का अवलम्बन आवश्यक था। उसी कुल में उत्पन्न हुए राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार हेतु कठोर तपस्या का मार्ग अपनाया। वस्तुतः भगीरथ केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि लोकमंगल हेतु संघर्षरत उस चेतना के प्रतीक हैं जो समस्त समाज के कल्याण के लिए स्वयं को समर्पित कर देती है। साठ हजार पूर्वजों के उद्धार के लिए की गई तपस्या इस तथ्य का द्योतक है कि किसी भी समाज की विषमताओं को समता में परिवर्तित करने के लिए त्याग, धैर्य और तप की आवश्यकता होती है।
पुराणों में वर्णित है कि असुरराज बलि के अहंकार के दमन हेतु भगवान विष्णु ने वामनावतार धारण किया और विराट रूप में तीन पगों में समस्त लोकों को नाप लिया। जब उनका चरण ब्रह्मलोक की ओर अग्रसर हुआ, तब आकाशीय विकृतियों एवं विषाणुओं के कारण वह आहत हुआ। देवमण्डल द्वारा उस चरण का प्रक्षालन किया गया और वही दिव्य जल आगे चलकर गंगा के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। ब्रह्मा जी ने उस पवित्र जल को अपने कमण्डल में धारण किया। यह कथा प्रतीकात्मक रूप से इस तथ्य को भी प्रतिपादित करती है कि दिव्यता सदैव विषमताओं का शोधन करती है और जीवन को पुनः पवित्रता प्रदान करती है।
किन्तु माँ गंगा का अवतरण भी सरल नहीं था। जब भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें पृथ्वी पर आने का आदेश मिला, तब उन्होंने आशंका व्यक्त की कि पृथ्वी पर मनुष्यों के पाप, प्रदूषण और विकृतियों का भार उन्हें सहना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि यदि वे पूर्ण वेग से पृथ्वी पर उतरेंगी, तो प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। तब भगवान शंकर ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण कर उनके वेग को नियंत्रित किया। शिवताण्डव स्तोत्र में वर्णित है कि गंगा की धारा शिव-जटाओं में अग्निज्वाला की भाँति धक-धक करती हुई प्रवाहित हो रही थी। अंततः महादेव ने उन्हें पृथ्वी पर अवतरित होने की अनुमति प्रदान की।
ज्येष्ठ मास की प्रखर तपन, शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि और समस्त पृथ्वी पर जल के लिए व्याकुल जनजीवन—ऐसे कठिन समय में माँ गंगा ने गंगोत्री से गंगासागर तक अपनी लगभग ढाई हजार किलोमीटर की यात्रा का संकल्प स्वीकार किया। यह केवल नदी का प्रवाह नहीं था, बल्कि समस्त पृथ्वी के मंगल का उद्घोष था। गंगा ने जब शिव-जटाओं से मुक्त होने से पूर्व सहस्त्रों ऋषियों के मध्य भगीरथ को देखा, तब उन्हें यह विश्वास हुआ कि यदि नेतृत्व पवित्र और लोकहितकारी हो, तो कोई भी विषमता मानवता की अविरल धारा को रोक नहीं सकती।
देवीपुराण में एक अन्य कथा का उल्लेख प्राप्त होता है। भगवान शंकर के विवाह के अवसर पर अनेक प्रकार की विसंगतियाँ उपस्थित हुईं। जब शिवजी भगवान विष्णु के पास पहुँचे, तब विष्णुजी ने वातावरण को आनंदमय बनाने हेतु गीत-संगीत का अनुरोध किया। शिवजी के गायन से विष्णुजी इतने भावविभोर हुए कि वैकुण्ठ में जलप्लावन होने लगा, जिसे ब्रह्माजी ने अपने कमण्डल में एकत्र किया। यह कथा स्पष्ट करती है कि संगीत एवं माधुर्य मानव जीवन के तनावों को शमन करने की अद्भुत क्षमता रखते हैं। प्रसन्न मन ही विषमताओं का सामना करने की शक्ति प्रदान करता है।
यदि युगों का अवलोकन करें तो ज्ञात होता है कि प्रत्येक काल संघर्ष और द्वंद्व से परिपूर्ण रहा है। सत्ययुग में भगवान विष्णु नारद के श्राप से ग्रसित हुए, त्रेता में श्रीराम को वनवास और पारिवारिक वेदना सहनी पड़ी तथा द्वापर में श्रीकृष्ण को बाल्यकाल से ही अत्याचार और महाभारत जैसी विभीषिका का सामना करना पड़ा। अतः यह सत्य है कि जीवन सदैव संघर्षमय रहा है। मधुवन की सुगंध के साथ पतझड़ का विरानापन भी प्रकृति का सत्य है।
वर्तमान युग भी किसी प्रकार से भगीरथ के श्रापित पूर्वजों के युग से भिन्न प्रतीत नहीं होता। आज भी मानवता दिशाहीनता, प्रदूषण, मानसिक तनाव, सामाजिक विघटन एवं आध्यात्मिक रिक्तता से जूझ रही है। जनसमूहों में भटकती मानवता आज पुनः किसी भगीरथ की प्रतीक्षा करती प्रतीत होती है, जो लोकमंगल के लिए तप कर सके। ऋषियों का चिंतन सदैव यह रहा कि जनसमूह में ही जनार्दन का निवास होता है।
अन्ततः भगीरथ की तपस्या सफल हुई और माँ गंगा ने पृथ्वी पर अवतरित होकर उनके पूर्वजों का उद्धार किया तथा सागर में प्रवाहित होकर अगस्त्य मुनि द्वारा शोषित समुद्र को पुनः जलमय बना दिया। विडम्बना यह है कि जो गंगा सदियों तक अपनी स्व-शुद्धिकरण क्षमता के लिए प्रसिद्ध रही, आज अनेक स्थानों पर स्वयं प्रदूषण और उपेक्षा का शिकार बन चुकी है।
गंगा दशहरा के इस पावन अवसर पर हमें यह आत्ममंथन करना होगा कि नदियों के प्रति हमारा दायित्व केवल आरती और पूजन तक सीमित नहीं रह सकता। यदि गंगा हमें जीवन प्रदान करती हैं, तो उन्हें पुनर्जीवित करना हमारा परम नागरिक और सांस्कृतिक कर्तव्य है। नदी-संरक्षण केवल शासन की योजनाओं पर निर्भर नहीं रह सकता; इसमें जनभागीदारी अत्यंत आवश्यक है। हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम नदियों में प्लास्टिक, कचरा एवं रासायनिक अपशिष्ट का विसर्जन नहीं करेंगे तथा जलस्रोतों की शुद्धता बनाए रखने हेतु समाज में जागरूकता का प्रसार करेंगे।
भारत के विविध राज्यों में गंगा दशहरा का पर्व अत्यंत श्रद्धा एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है। विशेष रूप से उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार एवं पश्चिम बंगाल में इस दिवस का आध्यात्मिक वैभव अद्भुत होता है। हरिद्वार की हर की पौड़ी, ऋषिकेश, प्रयागराज का संगम एवं वाराणसी का दशाश्वमेध घाट श्रद्धालुओं की आस्था से आलोकित हो उठते हैं। संध्या के समय जब असंख्य दीपक गंगा की लहरों पर प्रवाहित होते हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो आकाश के समस्त नक्षत्र स्वयं पृथ्वी पर उतरकर माँ गंगा की आरती कर रहे हों। डमरुओं की अनुगूँज, शंखनाद एवं वेदमंत्रों का सस्वर उच्चारण सम्पूर्ण वातावरण को दिव्यता एवं आध्यात्मिक ऊर्जा से आप्लावित कर देता है।
ग्रामीण अंचलों में, जहाँ प्रत्यक्ष गंगा उपलब्ध नहीं हैं, वहाँ भी श्रद्धालु स्थानीय जलाशयों अथवा गृहस्थ जल में गंगाजल मिलाकर स्नान एवं पूजन करते हैं। इस दिन सत्तू, मटका, पंखा, तरबूज एवं शीतल पेयों के दान की परम्परा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि सामाजिक सेवा और लोककल्याण की भारतीय परम्परा का प्रतीक है।
संक्षेप में कहा जाए तो स्कन्दपुराण से आरम्भ होने वाली यह पावन परम्परा केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की अदम्य जिजीविषा, उदारता, करुणा एवं प्रकृति-केंद्रित जीवनदृष्टि का अनुपम उत्सव है। भगीरथ की तपस्या, महादेव का संरक्षण और माँ गंगा का अवतरण—यह त्रिवेणी मानवता को यह शिक्षा देती है कि जब पुरुषार्थ, करुणा और दिव्यता का संगम होता है, तब लोककल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
आज के इस भौतिकतावादी युग में गंगा दशहरा की वास्तविक सार्थकता तभी सिद्ध होगी, जब हम गंगा के आध्यात्मिक, पर्यावरणीय एवं व्यावहारिक संदेशों को अपने जीवन में आत्मसात करें। हमें अपने विचारों को गंगा की भाँति निर्मल, अपने कर्मों को भगीरथ की भाँति लोकहितकारी तथा अपने जीवन को प्रकृति-सम्मत बनाना होगा। जल का मूल्य समझते हुए इस जीवनदायिनी धारा के संरक्षण हेतु सजग नागरिक की भूमिका निभाना ही इस पर्व का सच्चा संदेश है।
आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी संकल्प लें कि हमारी संस्कृति, हमारे संस्कार और माँ गंगा की यह दिव्य धारा युगों-युगों तक इसी प्रकार अविरल, निर्मल एवं निर्बाध प्रवाहित होती रहे।
॥ हर हर गंगे । जय माँ गंगे ॥
लेखक :
डॉ. अभिषेक कुमार उपाध्याय
गुरुकुल एवं मन्दिर सेवा योजना प्रमुख, जम्मू-कश्मीर प्रान्त
मुख्य न्यासी, श्री श्री 1008 श्री मौनी बाबा चैरिटेबल ट्रस्ट न्यास



















