डॉ गोविन्द शर्मा, एसोसाइट प्रोफेसर, संस्कृत विभाग, असम विश्वविद्यालय, शिलचर
प्रचार प्रमुख, संस्कृत भारती, दक्षिण-असम प्रान्त
भारत में प्रस्तावित जनगणना 2027 केवल जनसंख्या का सांख्यिकीय आकलन नहीं है; यह राष्ट्र की भाषाई, सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना का एक प्रामाणिक दर्पण भी है। इसी परिप्रेक्ष्य में संस्कृत भाषा का प्रश्न विशेष महत्व रखता है। यह प्रश्न मात्र एक भाषा के अस्तित्व का नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक निरंतरता और बौद्धिक विरासत के संरक्षण का भी है।
संस्कृत को प्रायः “देववाणी” कहा जाता है, परंतु इसके महत्व को केवल धार्मिक सीमाओं में बाँधकर नहीं देखा जा सकता। वेद, उपनिषद, पुराण, महाकाव्य, दर्शनशास्त्र, आयुर्वेद, ज्योतिष—भारतीय ज्ञान की लगभग हर धारा का मूल स्रोत संस्कृत ही रही है। आधुनिक भारतीय भाषाओं का व्याकरणिक और शब्दभंडार भी किसी न किसी रूप में संस्कृत से अनुप्राणित है। ऐसे में संस्कृत का ह्रास केवल एक भाषा का ह्रास नहीं, बल्कि हमारी बौद्धिक परंपरा के एक बड़े हिस्से का क्षरण है।
वर्तमान स्थिति चिंताजनक है। पिछली जनगणना में संस्कृत बोलने वालों की संख्या अत्यंत कम दर्ज की गई थी। यह आँकड़ा वास्तविकता का पूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं करता, क्योंकि देश के करोड़ों लोग प्रतिदिन पूजा-पाठ, मंत्रोच्चार, श्लोक-पाठ और सांस्कृतिक अनुष्ठानों में संस्कृत का प्रयोग करते हैं। फिर भी, जनगणना में इसकी उपेक्षा का परिणाम यह होता है कि नीतिगत स्तर पर इस भाषा को अपेक्षित महत्व नहीं मिल पाता।
यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य और ध्यान देने योग्य है। भारत में अनेक संस्कृत विश्वविद्यालय संचालित हैं, जहाँ प्रत्येक वर्ष हजारों विद्यार्थी संस्कृत का अध्ययन कर स्नातक एवं उच्च डिग्रियाँ प्राप्त कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त 250 से अधिक विश्वविद्यालयों तथा हजारों महाविद्यालयों में संस्कृत विभाग सक्रिय हैं, जिनमें हजारों अध्यापक कार्यरत हैं। विद्यालय स्तर पर भी बड़ी संख्या में संस्कृत अध्यापक नियुक्त हैं। इस प्रकार, यदि समग्र दृष्टि से देखा जाए तो प्रतिवर्ष लाखों लोग औपचारिक रूप से संस्कृत शिक्षा से जुड़े रहते हैं।
साथ ही, संस्कृत भारती एवं अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं के प्रयासों से संस्कृत का प्रचार-प्रसार करोड़ों लोगों तक पहुँचा है। इसके बावजूद, सरकारी आँकड़ों में संस्कृत की अत्यंत सीमित उपस्थिति एक गंभीर विसंगति को दर्शाती है। यह अंतर इस बात की ओर संकेत करता है कि हम अपनी भाषाई पहचान को सही रूप में अभिव्यक्त करने में कहीं न कहीं चूक कर रहे हैं।
सरकारी नीतियाँ और संसाधनों का आवंटन अक्सर आँकड़ों पर आधारित होता है। जिन भाषाओं के बोलने वालों की संख्या अधिक दर्ज होती है, उन्हें संरक्षण, प्रोत्साहन और आर्थिक सहायता अपेक्षाकृत अधिक मिलती है। इसके विपरीत, जिन भाषाओं के उपयोगकर्ता कम दर्ज किए जाते हैं, वे धीरे-धीरे “लुप्तप्राय” श्रेणी की ओर अग्रसर हो जाती हैं। यदि संस्कृत के संदर्भ में यही प्रवृत्ति जारी रही, तो इसके विकास, शोध और प्रसार के लिए उपलब्ध संसाधन सीमित हो सकते हैं।
इसलिए यह आवश्यक है कि आगामी जनगणना में भाषा से संबंधित जानकारी अत्यंत सावधानी और जिम्मेदारी के साथ दी जाए। जो लोग संस्कृत से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं, उन्हें अपनी प्रथम भाषा के रूप में संस्कृत का उल्लेख करना चाहिए। वहीं, जो लोग संस्कृत को समझते हैं, पढ़ते हैं या धार्मिक-सांस्कृतिक संदर्भों में इसका उपयोग करते हैं, उन्हें अपनी अन्य ज्ञात भाषाओं में संस्कृत को अवश्य शामिल करना चाहिए।
इसके साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण है कि दी गई जानकारी का सत्यापन किया जाए, अर्थात यह सुनिश्चित किया जाए कि अभिलेखों में वही दर्ज हुआ है जो आपने बताया है, और उसमें किसी प्रकार का परिवर्तन या त्रुटि नहीं हुई है।
डिजिटल युग में स्व-गणना (Self-Enumeration) की सुविधा नागरिकों को यह अवसर देती है कि वे स्वयं अपने विवरणों को सावधानीपूर्वक दर्ज करें। यह सुविधा केवल तकनीकी प्रगति का प्रतीक नहीं, बल्कि नागरिक उत्तरदायित्व को सुदृढ़ करने का माध्यम भी है। ऐसे में भाषाओं के चयन के समय सजगता अत्यंत आवश्यक है।
संस्कृत के संरक्षण का प्रश्न केवल सरकार या शैक्षणिक संस्थानों तक सीमित नहीं है। यह समाज के प्रत्येक वर्ग की भागीदारी से ही संभव है। परिवार, विद्यालय और सामाजिक संस्थाएँ यदि संस्कृत के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करें, तो यह भाषा पुनः जीवंत और प्रासंगिक बन सकती है।
अंततः, जनगणना 2027 हमारे सामने एक अवसर प्रस्तुत करती है, अपने सांस्कृतिक दायित्व को पहचानने और उसे निभाने का अवसर। संस्कृत को जनगणना में उचित स्थान देना एक छोटा-सा कदम अवश्य है, पर इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। यह कदम हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए उस ज्ञान-परंपरा को सुरक्षित रखने में सहायक होगा, जिसने भारत की आत्मा को आकार दिया है।
संस्कृत का संरक्षण केवल अतीत के गौरव की रक्षा नहीं, बल्कि भविष्य की बौद्धिक समृद्धि का निवेश भी है। अतः समय की मांग है कि हम इस दिशा में सजग, तार्किक और उत्तरदायी भूमिका निभाएँ।




















