डिजिटाइजेशन : जीवन आसान बना रहा है या चुनौतियाँ बढ़ा रहा है-एक यक्ष प्रश्न ?
-सुनील कुमार महला
आज भारत तेजी से डिजिटाइजेशन की ओर अग्रसर है। शायद यही कारण भी है कि आज हर क्षेत्र में जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग और वित्त, सरकारी सेवाओं, व्यापार और बाजार, परिवहन तथा संचार में डिजीटलीकरण को लगातार बढ़ावा मिल रहा है।इन सभी क्षेत्रों में डिजिटाइजेशन को बढ़ावा इसलिए मिल रहा है क्यों कि डिजिटाइजेशन के अनेक फायदे हैं। दरअसल, डिजिटाइजेशन के कारण कोई भी काम तेजी से होता है,कागज़, प्रिंटिंग और मैनुअल काम कम होने से लागत में अभूतपूर्व कमी आती है, कोई भी जानकारी डिजिटल रूप में सुरक्षित और आसानी से खोजने योग्य होती है। डिजिटाइजेशन से हमारा कोई भी डेटा सुरक्षित और व्यवस्थित रहता है,मोबाइल या इंटरनेट से कहीं भी काम संभव हो सकता है,गलतियों और भ्रष्टाचार की संभावना कम होने से पारदर्शिता बनी रहती है तथा डेटा आधारित निर्णय लेना आसान हो जाता है। निष्कर्ष यह है कि डिजिटाइजेशन हर काम को तेज, आसान, पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाता है।बहरहाल,यहां पाठकों को बताता चलूं कि डिजिटाइजेशन का अर्थ है-कागज़ी, भौतिक या पारंपरिक जानकारी को डिजिटल (कंप्यूटर/ऑनलाइन) रूप में बदलना और प्रक्रियाओं को तकनीक आधारित बनाना। यहां पाठकों को बताता चलूं कि अब शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटाइजेशन का भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है।इस बार तो सीबीएसई(सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन) ने 2026 से 12वीं बोर्ड परीक्षाओं के लिए ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) सिस्टम लागू कर दिया है। इसमें कॉपियां स्कैन होकर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आती हैं और शिक्षक कंप्यूटर स्क्रीन पर जांचते हैं। इससे मूल्यांकन तेज़, पारदर्शी और त्रुटिहीन (बिना टोटलिंग गलती के) होगा।सरल शब्दों में कहें तो ऑन-स्क्रीन मार्किंग एक आधुनिक मूल्यांकन प्रणाली है, जिसमें उत्तर पुस्तिकाओं की जाँच कंप्यूटर/स्क्रीन पर की जाती है, न कि कागज पर हाथ से।इस प्रणाली के अंतर्गत परीक्षा के बाद उत्तर पुस्तिकाएँ स्कैन कर ली जाती हैं तथा बाद में हर उत्तर पुस्तिका की डिजिटल कॉपी शिक्षकों की कंप्यूटर स्क्रीन पर आती है या यूं कहें कि भेज दी जाती है। इसके बाद परीक्षक स्क्रीन पर ही उत्तर देखते हैं और अंक देते हैं तथा विद्यार्थियों के अंक सीधे सॉफ्टवेयर में दर्ज हो जाते हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि ऑन-स्क्रीन मार्किंग से रिजल्ट तेज़ी से तैयार होता है, क्योंकि इसके कारण से उत्तर पुस्तिकाएँ इधर-उधर भेजने की जरूरत नहीं होती तथा पुस्तिकाओं को इधर-उधर भेजने का खर्च तथा श्रम व समय की बचत भी होती है।इस प्रणाली के कारण एक ही समय में कई परीक्षक अलग-अलग कॉपियाँ जाँच सकते हैं तथा अंक सीधे डिजिटल सिस्टम में दर्ज हो जाते हैं तथा अंकों की टोटलिंग और रिजल्ट तैयार करने में कम समय लगता है।बाद में वही अंक रिजल्ट डेटाबेस में ऑटोमैटिक जोड़ दिए जाते हैं। डिजिटाइजेशन का या यूं कहें कि ऑन-स्क्रीन मार्किंग का एक बड़ा फायदा यह है कि अंकों की अलग से मैन्युअल एंट्री की जरूरत बहुत कम या नहीं के बराबर होती है।
बहरहाल, यहां यह कहना भी ग़लत नहीं होगा कि डिजिटाइजेशन चाहे किसी भी क्षेत्र में हो,इसका लाभ पर्यावरण को भी होता है।सच तो यह है कि डिजिटाइजेशन ने आज जीवन के लगभग हर क्षेत्र को प्रभावित किया है और इसका पर्यावरण पर भी कई सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इससे हमारी धरती के विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण संभव हुआ है और प्रदूषण में अभूतपूर्व कमी आई है। डिजिटाइजेशन के कारण आज काग़ज़ की खपत में कमी आई है। धीरे-धीरे सबकुछ आनलाइन होने से कागज़ की जरूरत कम पड़ती है या नहीं के बराबर पड़ती है, जिससे पेड़ों की कटाई घटती है, क्यों कि कागज़ पेड़ों के इस्तेमाल से ही बनता है।सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि डिजिटाइजेशन से वनों के संरक्षण को मजबूती मिलती है। आज के समय में ऑनलाइन मीटिंग, वर्क फ्रॉम होम और विभिन्न डिजिटल सेवाओं से आवागमन घटा है, जिससे ईंधन की खपत और वायु प्रदूषण कम हुआ है।
डिजिटल बिलिंग, ई-टिकटिंग और ऑनलाइन रसीदों से कागज आधारित कचरा कम होता है। इतना ही नहीं, डिजिटाइजेशन का एक बड़ा फायदा यह भी है कि इससे किसी भी देश की ऊर्जा दक्षता में भी सुधार संभव हो पाता है। लेकिन डिजिटाइजेशन का प्रयोग जिम्मेदारी से किया जाना आवश्यक है। यदि हम जिम्मेदारी से डिजिटाइजेशन का प्रयोग करते हैं तो यह निश्चित ही सतत विकास(सस्टेनेबल डेवलपमेंट) और स्वच्छ पर्यावरण(क्लीन एनवायरमेंट)की दिशा में एक मजबूत कदम साबित हो सकता है।
हालांकि, यह बात भी दीगर(अलग/भिन्न) है कि डिजिटाइजेशन की अपनी हानियां भी हैं। मसलन, डिजिटाइजेशन से इलेक्ट्रॉनिक कचरे (ई-वेस्ट) में वृद्धि होती है। विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने के लिए दुर्लभ धातुओं और खनिजों का अत्यधिक उपयोग होने के कारण धरती के संसाधनों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है, जैसा कि प्राकृतिक संसाधनों का असीमित दोहन को इससे कहीं न कहीं बल मिलता है। इतना ही नहीं, विभिन्न डेटा सेंटरों, सर्वरों और डिजिटल उपकरणों आदि द्वारा लगातार बिजली की बड़ी मात्रा का उपयोग करने से देश की ऊर्जा दक्षता गड़बड़ा सकती है। डिजिटाइजेशन से विभिन्न साइबर अपराधों का खतरा जैसे कि हैकिंग, डेटा चोरी और ऑनलाइन धोखाधड़ी जैसी समस्याएं पैदा होतीं हैं। मानव स्वयं कुछ करने की बजाय तकनीक और मशीनों पर ज्यादा निर्भर हो जाता है, जिससे बेरोजगारी जन्म ले सकती है तथा साथ ही साथ इससे (डिजिटाइजेशन से) आत्मनिर्भरता और व्यावहारिक कौशल कम होते हैं। डिजिटल दुनिया में अधिक समय बिताने से वास्तविक सामाजिक संबंध कमजोर(सामाजिक अलगाव की समस्या)हो सकते हैं। इतना ही नहीं, डिजिटाइजेशन से मानव स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है। जैसे कि अधिक स्क्रीन टाइम से आंखों की समस्या, तनाव और नींद की कमी जैसी समस्याओं को बल मिलता है। यह बात बिलकुल सही है कि आज के समय में निश्चित ही डिजिटाइजेशन ने जीवन को सरल और तेज बनाया है, लेकिन इसका पानी की समस्या पर भी अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा है, जैसा कि बड़े-बड़े डेटा सेंटरों में सर्वरों को ठंडा रखने के लिए अधिक पानी की आवश्यकता होती है, जिससे कई क्षेत्रों में जल संसाधनों पर दबाव बढ़ता है। साथ ही, इलेक्ट्रॉनिक कचरे के गलत निपटान से जल स्रोत प्रदूषित हो सकते हैं। शहरीकरण और डिजिटल उद्योगों के विस्तार के कारण भूजल स्तर में भी गिरावट देखी जा रही है। इस प्रकार, डिजिटाइजेशन विकास का महत्वपूर्ण साधन होते हुए भी जल संरक्षण के प्रति संतुलित और जिम्मेदार दृष्टिकोण की आवश्यकता को बढ़ाता है।
अंत में यही कहूंगा कि डिजिटाइजेशन आधुनिक युग की बड़ी उपलब्धि है, जिसने कार्यों को सरल, तेज और पारदर्शी बनाया है। आधुनिक दौर में शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग और प्रशासन जैसे क्षेत्रों में इसके अनेक लाभ दिखाई देते हैं। किंतु इसका अंधाधुंध उपयोग कई समस्याएँ भी पैदा कर सकता है, जैसे समय की बर्बादी, साइबर अपराध, स्वास्थ्य संबंधी दुष्प्रभाव और पर्यावरण पर दबाव। इसलिए डिजिटाइजेशन का विवेकपूर्ण, संतुलित और जिम्मेदार उपयोग आवश्यक है। तकनीक को साधन मानकर विवेकपूर्ण व संतुलित तरीके से इसका उपयोग किया जाए, न कि उस पर पूरी तरह निर्भर हुआ जाए। यही दृष्टिकोण समाज और व्यक्ति दोनों के हित में है।




















