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पहचान कपड़ों से नहीं संस्कारों से होती है

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पहचान कपड़ों से नहीं संस्कारों से होती है

गुड़गांव के पॉश इलाके में स्थित ‘स्काईलाइन कॉर्पोरेट्स’ की 25वीं मंजिल पर शीशे की दीवारों के पीछे से शहर चींटियों जैसा दिखाई दे रहा था। यह ऑफिस था आर्यन मल्होत्रा का, जो अपनी कंपनी का सबसे युवा मैनेजर था। एयर कंडीशनर की ठंडी हवा और महंगे रूम फ्रेशनर की खुशबू के बीच, आर्यन अपनी आगामी प्रेजेंटेशन की तैयारी में व्यस्त था। आज कंपनी के विदेशी डेलिगेट्स आने वाले थे, और यह डील आर्यन के करियर के लिए मील का पत्थर साबित होने वाली थी।

उसी वक्त, ऑफिस की इमारत के नीचे, 42 डिग्री की तपती धूप में एक बुजुर्ग व्यक्ति ऑटो से उतरा। बदन पर एक पुराना, थोड़ा मटमैला सा कुर्ता-पायजामा, पैरों में हवाई चप्पल जिसका अंगूठा घिस चुका था, और सिर पर एक गमछा लपेटा हुआ था। पसीने से तर-बतर चेहरे पर झुर्रियां थीं, लेकिन आंखों में एक अजीब सी चमक थी। यह थे रामदीन जी, आर्यन के पिता।

रामदीन जी ने गांव से सुबह की बस पकड़ी थी और छह घंटे का सफर तय करके यहां पहुंचे थे। उन्होंने आज तक अपने बेटे का ऑफिस नहीं देखा था। आर्यन ने कई बार वीडियो कॉल पर अपना केबिन दिखाया था, लेकिन रामदीन जी का मन था कि एक बार अपनी आंखों से बेटे को उस ‘बड़ी कुर्सी’ पर बैठा देखें।

वह सकुचाते हुए विशालकाय कांच के दरवाजों की तरफ बढ़े। ऑटोमेटिक दरवाजा अपने आप खुला तो वह एक पल के लिए ठिठक गए, फिर डरते-डरते अंदर कदम रखा। अंदर की चकाचौंध देखकर उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं। संगमरमर का फर्श इतना चमकदार था कि उन्हें अपना ही प्रतिबिंब दिखाई दे रहा था।

वह धीरे-धीरे रिसेप्शन की ओर बढ़े। वहां बैठी रिसेप्शनिस्ट, नताशा, फोन पर अंग्रेजी में किसी से बात कर रही थी। रामदीन जी को अपनी ओर आते देख उसने नाक सिकोड़ी। उनकी वेशभूषा इस फाइव-स्टार ऑफिस के ‘एम्बिएंस’ से बिल्कुल मेल नहीं खा रही थी।

रामदीन जी काउंटर के पास खड़े हो गए और नताशा के फोन रखने का इंतजार करने लगे। नताशा ने उन्हें अनदेखा करते हुए कंप्यूटर पर कुछ टाइप करना शुरू कर दिया।

“बिटिया…” रामदीन जी ने हिम्मत करके धीमी आवाज में कहा।

नताशा ने ऐसे सिर उठाया जैसे कोई मक्खी भिनभिना रही हो। “जी? डिलीवरी ब्वॉयज के लिए एंट्री पीछे वाले गेट से है। यहां अलाउड नहीं है।”

रामदीन जी ने अपना गमछा ठीक किया और विनम्रता से बोले, “ना बिटिया, हम डिलीवरी वाले ना हैं। हम तो आर्यन से मिलने आए हैं। आर्यन मल्होत्रा।”

नताशा ने एक व्यंग्यात्मक हंसी के साथ उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा। “मिस्टर आर्यन मल्होत्रा? वीपी सर? आप उनसे मिलने आए हैं? क्या काम है? क्या चंदा वगैरह चाहिए? देखिए बाबा, सर अभी बहुत बिजी हैं, मीटिंग में हैं। आप बाहर जाकर गार्ड को अपनी अर्जी दे दीजिए।”

“अर्जी ना है बिटिया, हम उनके पिताजी हैं। गांव से आए हैं,” रामदीन जी ने गर्व और संकोच के मिले-जुले भाव से कहा।

नताशा को यकीन नहीं हुआ। आर्यन सर, जो हमेशा ब्रांडेड सूट में रहते हैं, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं और जिनकी लाइफस्टाइल इतनी हाई-फाई है, उनके पिता ऐसे दिखते हैं? उसे लगा यह बूढ़ा झूठ बोल रहा है या कोई दूर का गरीब रिश्तेदार होगा जो पैसे मांगने आया है।

“देखिए, झूठ मत बोलिए। आर्यन सर के डैड ऐसे… मतलब, आप जैसे नहीं हो सकते। प्लीज आप यहां भीड़ मत लगाइए, हमारे इंटरनेशनल क्लाइंट्स आने वाले हैं। सिक्योरिटी!” नताशा ने सिक्योरिटी को आवाज दी।

दो हट्टे-कट्टे गार्ड वहां आ गए।

“क्या हुआ मैम?”

“इन्हें बाहर निकालो। कब से दिमाग खराब कर रहे हैं। कह रहे हैं आर्यन सर के फादर हैं। देखो इनकी हालत, फर्श गंदा कर दिया है इनके जूतों ने,” नताशा ने झल्लाते हुए कहा।

रामदीन जी का दिल बैठ गया। उन्होंने अपने पैरों की तरफ देखा। गांव की मिट्टी जूतों पर लगी थी और वाकई, चमकदार फर्श पर हल्के मिट्टी के निशान बन गए थे। उन्हें बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई। उन्होंने अपना पुराना झोला, जिसमें आर्यन के लिए उसके पसंदीदा बेसन के लड्डू और गांव के खेत के ताजे आम थे, सीने से लगा लिया।

“अरे भाई, धक्का मत दो। हम सच कह रहे हैं। एक बार आर्यन को खबर तो कर दो,” रामदीन जी गिड़गिड़ाए।

लेकिन गार्ड्स ने उनकी एक न सुनी। वे उन्हें बांह पकड़कर घसीटते हुए मुख्य दरवाजे की ओर ले जाने लगे। लॉबी में खड़े कुछ अन्य कर्मचारी भी हंस रहे थे और फुसफुसा रहे थे। “पता नहीं कहां-कहां से चले आते हैं लोग रिश्तेदारी निकालने।”

उसी वक्त, लिफ्ट का दरवाजा खुला। आर्यन अपने तीन विदेशी क्लाइंट्स और बॉस के साथ बाहर निकला। वह क्लाइंट्स को लॉबी का आर्किटेक्चर दिखा रहा था। अचानक उसकी नजर रिसेप्शन पर हो रहे हंगामे पर पड़ी।

उसने देखा कि दो गार्ड एक बुजुर्ग को धक्के देकर बाहर निकाल रहे हैं। वह बुजुर्ग बार-बार मुड़कर अंदर देखने की कोशिश कर रहा था। आर्यन का दिल एक पल के लिए रुक गया। वह गमछा, वह मटमैला कुर्ता… वह उन्हें हजारों की भीड़ में भी पहचान सकता था।

“पापा!” आर्यन के मुंह से जोर से निकला।

वह अपनी मीटिंग, क्लाइंट्स, बॉस, सब कुछ भूलकर पागलों की तरह दौड़ा। “रुको! छोड़ो उन्हें!” आर्यन की आवाज पूरी लॉबी में गूंज गई।

गार्ड्स एकदम से रुक गए। नताशा अपनी कुर्सी से खड़ी हो गई। आर्यन दौड़कर रामदीन जी के पास पहुंचा। रामदीन जी की आंखों में आंसू थे और वे कांप रहे थे। गार्ड की पकड़ से उनकी बांह पर लाल निशान पड़ गए थे।

आर्यन ने झटके से गार्ड का हाथ अपने पिता की बांह से हटाया। उसने देखा कि उसके पिता के पैरों से हवाई चप्पल निकल गई थी और वह नंगे पैर ठंडे फर्श पर खड़े थे।

बिना एक पल की देरी किए, आर्यन, जो अपनी कंपनी का सबसे महंगा सूट पहने था, वहीं सबके सामने अपने पिता के पैरों में झुक गया। उसने अपनी जेब से रुमाल निकाला और अपने पिता के नंगे, धूल-भरे पैरों को पोंछने लगा।

पूरा ऑफिस सन्न रह गया। विदेशी क्लाइंट्स, बॉस, नताशा और बाकी स्टाफ की सांसें थम गईं।

“आर्यन बेटा… रहने दे… गंदा हो जाएगा तेरा सूट,” रामदीन जी ने रुंधे गले से कहा और पीछे हटने लगे।

आर्यन ने सिर उठाया। उसकी आंखों में आंसू थे। “सूट गंदा नहीं होगा पापा, मेरी आत्मा साफ हो जाएगी।” उसने पिता के पैरों में अपना माथा टेक दिया। फिर उठकर उन्हें गले लगा लिया। इतना कसकर गले लगाया जैसे कोई छोटा बच्चा डरा हुआ हो।

“आप कब आए? मुझे फोन क्यों नहीं किया? और ये लोग… इन्होंने आपके साथ…” आर्यन का गला भर आया।

फिर आर्यन घूमा। उसकी आंखों में अब आंसू नहीं, अंगारे थे। वह नताशा और गार्ड्स की तरफ बढ़ा। नताशा का चेहरा डर के मारे सफेद पड़ चुका था।

“किसने ऑर्डर दिया इन्हें बाहर निकालने का?” आर्यन की दहाड़ से रिसेप्शन का कांच थर्रा गया।

“स… सर… मुझे लगा… इनकी हालत देखकर… मतलब, आपके स्टैंडर्ड…” नताशा हकलाने लगी। “यह कह रहे थे आपके पिता हैं, पर मुझे लगा कोई गंवार आदमी झूठ बोलकर…”

“गंवार?” आर्यन ने शब्द को चबाते हुए दोहराया।

वह अपने पिता के पास गया, उनका हाथ अपने हाथ में लिया और नताशा के सामने लाकर खड़ा कर दिया।

“मिस नताशा, और आप सब लोग, ध्यान से देखिए,” आर्यन ने ऊंची आवाज में कहा, जिससे पूरी लॉबी सुन सके।

“यह जो मटमैला कुर्ता आप देख रहे हैं न? यह इसलिए मटमैला है क्योंकि इन्होंने अपनी पूरी जवानी खेतों की मिट्टी में खपा दी, ताकि मैं ब्रांडेड सूट पहन सकूं। इनके पैरों की बिवाइयां (cracks) देख रही हैं आप? ये इसलिए फटी हैं क्योंकि जब मेरे स्कूल के जूतों के लिए पैसे कम पड़ते थे, तो ये नंगे पैर चलते थे ताकि मेरी फीस भरी जा सके।”

आर्यन की आवाज कांप रही थी, लेकिन उसमें गजब का आत्मविश्वास था।

“आप इन्हें गंवार कहती हैं क्योंकि इन्हें अंग्रेजी नहीं आती? असली गंवार तो हम हैं, जो एसी कमरों में बैठकर यह भूल गए हैं कि ‘संस्कार’ और ‘सम्मान’ की कोई भाषा नहीं होती। मैंने एमबीए किया है, लेकिन जीवन का असली मैनेजमेंट मैंने इनसे सीखा है। जब फसल खराब होती थी और घर में खाने को नहीं होता था, तब भी इन्होंने मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया। वो मैनेजमेंट किसी हार्वर्ड स्कूल में नहीं सिखाया जाता।”

रामदीन जी आर्यन का हाथ दबा रहे थे, उसे शांत करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन आर्यन आज रुकने वाला नहीं था।

उसने रामदीन जी के हाथ से वह पुराना झोला लिया।

“आपको यह झोला गंदा लग रहा है न?” आर्यन ने झोला खोला और उसमें से अखबार में लिपटे बेसन के लड्डू निकाले। “इसमें मेरे पिता का प्यार है। दुनिया का कोई भी महंगा पिज्जा या बर्गर इस स्वाद का मुकाबला नहीं कर सकता।”

फिर आर्यन अपने बॉस और विदेशी क्लाइंट्स की तरफ मुड़ा। “मिस्टर स्मिथ, सर… आई एम सॉरी फॉर द ड्रामा। ये मेरे पिता हैं। मैं आज जो कुछ भी हूं, इन्हीं की बदौलत हूं। अगर इस ऑफिस में मेरे पिता के लिए जगह नहीं है, अगर उनके कपड़ों की वजह से उन्हें बेइज्जत किया जाता है, तो मुझे नहीं लगता कि मैं ऐसी जगह काम करने के लायक हूं। क्योंकि जो अपने पिता का सम्मान नहीं करवा सकता, वो कंपनी का सम्मान क्या खाक बढ़ाएगा?”

मिस्टर स्मिथ, जो अब तक चुपचाप सब देख रहे थे, आगे बढ़े। उन्होंने भारतीय संस्कृति के बारे में सुना था, लेकिन आज देख रहे थे। वे रामदीन जी के पास आए और झुककर ‘नमस्ते’ किया।

“मिस्टर आर्यन,” स्मिथ ने मुस्कुराते हुए कहा, “योर फादर इज नॉट ए ‘गंवार’ (Uncultured), ही इज द रूट ऑफ योर सक्सेस। (ये आपकी सफलता की जड़ हैं)। हमें गर्व है कि हमारे साथ ऐसा व्यक्ति काम करता है जिसके संस्कार इतने गहरे हैं।”

आर्यन के बॉस ने भी आगे बढ़कर रामदीन जी का हाथ थाम लिया। “माफ करना रामदीन जी। हमारे स्टाफ से बहुत बड़ी गलती हुई। आप हमारे वीआईपी गेस्ट हैं।”

नताशा और गार्ड्स सिर झुकाए खड़े थे। उन्हें अपनी गलती का एहसास हो चुका था। कपड़े और भाषा से इंसान को तौलने की उनकी छोटी सोच आज तार-तार हो गई थी।

आर्यन अपने पिता को लेकर केबिन की तरफ बढ़ा। रामदीन जी की आंखों से खुशी के आंसू बह रहे थे। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उनका बेटा, इतने बड़े लोगों के बीच, उनकी फटी हुई धोती और पुराने कुर्ते को अपना अभिमान बना लेगा।

केबिन में पहुंचकर आर्यन ने पिता को अपनी ‘बड़ी कुर्सी’ पर बैठाया।

“बैठो पापा। यह कुर्सी आपकी तपस्या का फल है। असली हकदार आप हैं,” आर्यन ने कहा।

रामदीन जी ने कुर्सी को हाथ से सहलाया, फिर बेटे को खींचकर गले लगा लिया। “बेटा, मैं तो बस तुझे देखने आया था। डर रहा था कि कहीं मेरे कपड़ों की वजह से तेरी नाक न कट जाए। पर आज तूने मेरा सीना गर्व से इतना चौड़ा कर दिया कि ये कुर्ता भी छोटा पड़ रहा है।”

आर्यन ने वह बेसन का लड्डू निकाला, आधा पिता को खिलाया और आधा खुद खाया। “पापा, नाक कपड़ों से नहीं कटती, कर्मों से कटती है। और मेरा कर्म, मेरा धर्म, सब आप ही हैं।”

उस दिन ऑफिस में सिर्फ एक डील साइन नहीं हुई थी, बल्कि इंसानियत और रिश्तों की एक नई इबारत लिखी गई थी। नताशा और बाकी स्टाफ ने उस दिन सीखा कि कांच की इमारतों में रहने से कद ऊंचा नहीं होता, कद ऊंचा होता है उन जड़ों को याद रखने से, जिन्होंने आपको खड़ा किया है।

शाम को जब रामदीन जी वापस जाने लगे, तो इस बार गार्ड्स ने दरवाजा खोलकर उन्हें सैल्यूट किया। नताशा ने खड़े होकर सिर झुकाया। रामदीन जी ने मुस्कुराकर हाथ जोड़ लिए। वह वही साधारण बुजुर्ग थे, लेकिन अब वहां मौजूद हर शख्स की नजरों में उनका कद उस 25 मंजिला इमारत से भी ऊंचा हो चुका था।

आर्यन खुद उन्हें छोड़ने नीचे आया।

“बेटा, अब मैं चलता हूं। खेती का काम पड़ा है,” रामदीन जी ने कहा।

“जल्दी आना पापा। अगली बार मैं खुद लेने आऊंगा, और वो भी बड़ी गाड़ी में,” आर्यन ने हंसते हुए कहा।

रामदीन जी बस में बैठे। बस चल पड़ी। आर्यन तब तक हाथ हिलाता रहा जब तक बस ओझल नहीं हो गई। उसने महसूस किया कि आज की प्रेजेंटेशन उसकी जिंदगी की सबसे सफल प्रेजेंटेशन थी, क्योंकि आज उसने दुनिया को अपने असली ‘हीरो’ से मिलवाया था।

दोस्तों, आज की चकाचौंध भरी दुनिया में हम अक्सर बाहरी दिखावे को ही सब कुछ मान लेते हैं। हम भूल जाते हैं कि हमारे माता-पिता ने हमें इस काबिल बनाने के लिए न जाने कितनी बार अपने स्वाभिमान और अपनी इच्छाओं का गला घोंटा है।

कपड़े पुराने हो सकते हैं, लेकिन माता-पिता का प्यार हमेशा नया और अनमोल होता है। आर्यन की तरह हमें भी अपनी जड़ों पर गर्व होना चाहिए, शर्म नहीं।
धन्यवाद 🙏
पूजा मिश्रा ❤️

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