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राजनीति में गिरती भाषा और बढ़ते आरोप: असम का ताज़ा विवाद
असम की चुनावी फिज़ा में इन दिनों जिस प्रकार की बयानबाज़ी और आरोप-प्रत्यारोप देखने को मिल रहे हैं, वह न केवल चिंताजनक है बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए भी एक गंभीर संकेत है। पवन खेड़ा द्वारा मुख्यमंत्री हिमंत विश्वशर्मा की पत्नी पर विदेशी पासपोर्ट और विदेशों में संपत्ति होने के आरोप, और उसके बाद मुख्यमंत्री की तीखी व व्यक्तिगत प्रतिक्रिया—यह पूरा घटनाक्रम राजनीतिक संवाद के स्तर पर सवाल खड़े करता है।
चुनाव से ठीक पहले इस तरह के आरोपों का सामने आना नई बात नहीं है। भारतीय राजनीति में यह एक स्थापित प्रवृत्ति बन चुकी है कि मतदान के ऐन पहले विपक्ष सत्तारूढ़ पक्ष को घेरने के लिए व्यक्तिगत और संवेदनशील मुद्दे उठाता है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या बिना ठोस प्रमाण के इस प्रकार के आरोप सार्वजनिक मंचों पर लगाए जाने चाहिए? लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि किसी की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को बिना आधार के आघात पहुँचाया जाए।
दूसरी ओर, इन आरोपों पर मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया भी उतनी ही चिंताजनक है। “पवन खेड़ा को पवन पेड़ा बना दूंगा” या “पाताल से खोज निकालूंगा” जैसी भाषा न केवल असंयमित है, बल्कि यह उस संवैधानिक पद की गरिमा के भी प्रतिकूल है, जिस पर वे आसीन हैं। एक जनप्रतिनिधि, विशेषकर मुख्यमंत्री से अपेक्षा की जाती है कि वह आलोचना का उत्तर तथ्यों और तर्कों से दे, न कि व्यक्तिगत आक्रामकता से।
यह पूरा प्रकरण भारतीय राजनीति में संवाद के गिरते स्तर की ओर संकेत करता है। जहां एक ओर विपक्ष आरोपों के माध्यम से राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करता है, वहीं सत्ता पक्ष भी संयम और शालीनता की सीमा लांघने से नहीं हिचकता। इस प्रतिस्पर्धा में सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र की उस मूल भावना को होता है, जिसमें स्वस्थ बहस, पारदर्शिता और जवाबदेही सर्वोपरि होती है।
मतदाता आज पहले से कहीं अधिक जागरूक हैं। वे केवल आरोपों और तीखी भाषा से प्रभावित नहीं होते, बल्कि तथ्यों, कार्यों और नीतियों के आधार पर अपना निर्णय लेते हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों और नेताओं को यह समझना होगा कि अल्पकालिक लाभ के लिए अपनाई गई आक्रामक रणनीतियाँ दीर्घकाल में उनकी विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचा सकती हैं।
अंततः, यह आवश्यक है कि सभी पक्ष आत्ममंथन करें। राजनीति यदि जनसेवा का माध्यम है, तो उसकी भाषा और व्यवहार भी उसी के अनुरूप होना चाहिए। आरोपों की गंभीरता और प्रतिक्रिया की मर्यादा—दोनों ही लोकतंत्र के स्वस्थ भविष्य के लिए अनिवार्य हैं।




















