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सुरक्षित जीवन की दिशा में: मलेरिया मुक्त भविष्य का संकल्प।(25 अप्रैल विश्व मलेरिया दिवस पर विशेष आलेख) -सुनील कुमार महला

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सुरक्षित जीवन की दिशा में: मलेरिया मुक्त भविष्य का संकल्प।(25 अप्रैल विश्व मलेरिया दिवस पर विशेष आलेख)

-सुनील कुमार महला

प्रतिवर्ष 25 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा विश्व मलेरिया दिवस मनाया जाता है। वास्तव में इस दिवस को मनाने के पीछे का मुख्य उद्देश्य मलेरिया जैसी जानलेवा, घातक और व्यापक संक्रामक बीमारी के प्रति आमजन में जागरूकता बढ़ाना, इसके रोकथाम के उपायों को प्रोत्साहित करना, समय पर जाँच एवं उपचार की व्यवस्था पर बल देना तथा वैश्विक स्तर पर इसके उन्मूलन के प्रयासों को गति देना है।

मलेरिया को आज भी एक सामान्य रोग समझ लिया जाता है, किंतु यह आज भी विश्व की सबसे गंभीर जनस्वास्थ्य समस्याओं में से एक है और हर वर्ष लाखों लोगों की मृत्यु का कारण बनता है। बहुत कम लोग जानते हैं कि यह वायरस से नहीं बल्कि प्लाज्मोडियम नामक परजीवी से फैलता है, जो संक्रमित मादा एनोफिलीज़ मच्छर के काटने से मनुष्य के शरीर में पहुँचता है।पाठक जानते होंगे कि हर मच्छर मलेरिया नहीं फैलाता।’मलेरिया’ शब्द की यदि हम यहां पर बात करें तो यह शब्द इतालवी(इटली) भाषा के ‘माला एरिया’ से बना है, जिसका अर्थ ‘खराब हवा’ होता है, क्योंकि प्राचीन काल में लोग मानते थे कि यह बीमारी गंदी या दूषित हवा से फैलती है, जबकि बाद में विज्ञान ने सिद्ध किया कि इसका वास्तविक कारण मच्छर हैं।

पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि मलेरिया कोई नया नहीं बल्कि, यह एक अत्यंत प्राचीन रोग है, जिसका उल्लेख प्राचीन मिस्र, भारत तथा चीन के प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है। संक्रमित मच्छर के काटने पर प्लाज्मोडियम परजीवी रक्त में प्रवेश कर लाल रक्त कोशिकाओं में बहुगुणित होने लगता है, जिससे रक्तहीनता (एनीमिया), कमजोरी और अन्य जटिलताएँ उत्पन्न होती हैं। बहरहाल, इसके प्रमुख लक्षणों की यदि हम यहां पर बात करें तो इसके प्रमुख लक्षणों में क्रमशः तेज बुखार, ठंड लगना, कंपकंपी, सिरदर्द, मतली, उल्टी, अत्यधिक पसीना आना, चक्कर आना, साँस फूलना, तेज नाड़ी, थकान, कमजोरी तथा जुकाम जैसी अनुभूति शामिल हैं। गंभीर अवस्था में रोगी मूर्च्छा तक में जा सकता है और व्यक्ति की मृत्यु तक भी हो सकती है। कुछ लोगों में इसके लक्षण देर से प्रकट होते हैं, किंतु छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और कमजोर प्रतिरक्षा वाले व्यक्तियों में यह शीघ्र और अधिक घातक रूप ले सकता है। रोगी के ठीक होने के बाद भी यह रोग पुनः हो सकता है। वर्षा ऋतु में या वर्षा के बाद जब घरों, गलियों और आसपास के क्षेत्रों में पानी जमा हो जाता है, तब मच्छरों का प्रजनन तेजी से होता है और संक्रमण का प्रसार बढ़ जाता है। यही कारण है कि स्वच्छता और जलभराव रोकना मलेरिया नियंत्रण का अत्यंत महत्त्वपूर्ण उपाय माना जाता है। यह रोग मुख्य रूप से अफ्रीका, एशिया, अमेरिका तथा अन्य उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है, क्योंकि वहाँ की जलवायु मच्छरों के पनपने के लिए अनुकूल होती है। मलेरिया गरीब क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है, क्योंकि वहाँ स्वच्छता, स्वास्थ्य सेवाओं, दवाओं, सुरक्षित आवास और रोकथाम के संसाधनों की कमी होती है।

बहरहाल, यहां पाठकों को जानकारी देता चलूं कि वर्ष 2007 में विश्व स्वास्थ्य सभा के 60वें सत्र में इसे मनाने का निर्णय लिया गया था और पहला आधिकारिक विश्व मलेरिया दिवस 25 अप्रैल 2008 को मनाया गया था।हर साल इस दिवस की एक थीम रखी जाती है और वर्ष 2025 की थीम-‘मलेरिया का अंत हमसे होगा: पुनर्निवेश करें, नए तरीके सोचें और प्रयासों को फिर से प्रज्वलित करें।’ रखी गई थी ,जिसका मतलब है कि मलेरिया का अंत हमारे अपने प्रयासों से ही संभव है। सरल शब्दों में कहें तो मलेरिया नियंत्रण और अनुसंधान में फिर से अधिक संसाधन, धन और ध्यान लगाना होगा,इस पर नियंत्रण के लिए हमें नए सिरे से सोचना होगा। हमें पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ नए, प्रभावी और आधुनिक उपाय अपनाने होंगे तथा मलेरिया उन्मूलन के वैश्विक प्रयासों में नई ऊर्जा और उत्साह पैदा करना होगा। वहीं इस वर्ष यानी कि वर्ष 2026 में इसकी थीम-‘मलेरिया समाप्त करने के लिए प्रेरित: अब हम कर सकते हैं, अब हमें करना ही होगा।’ रखी गई है। वास्तव में इसका सीधा सा संदेश यह है कि अवसर और साधन मौजूद हैं, इसलिए अब देरी नहीं, बल्कि निर्णायक कार्रवाई का समय है।

हाल फिलहाल, यदि हम यहां पर आंकड़ों की बात करें तो वैश्विक स्तर पर मलेरिया के मामले लगभग 28.2 करोड़ तक पहुँच चुके हैं और लगभग 6.10 लाख लोगों की मृत्यु हुई है, जिनमें अधिकांश पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चे हैं। पूर्व की विश्व मलेरिया रिपोर्टों में यह तथ्य भी सामने आया कि कुछ वर्षों में हर 50 सेकंड में एक व्यक्ति की मृत्यु मलेरिया के कारण हो रही थी। वर्ष 2020 में विश्व स्तर पर 6,27,000 लोगों की मृत्यु मलेरिया के कारण दर्ज की गई थी, जो पिछले वर्ष की तुलना में अधिक थी।इन सभी के बीच राहत की बात यह है कि दुनिया के 47 देश मलेरिया मुक्त घोषित किए जा चुके हैं और चीन को भी मलेरिया मुक्त देश का दर्जा प्राप्त हुआ है। वहीं पर, भारत की स्थिति पिछले वर्षों में उत्साहजनक रही है। देश ने एक दशक में मलेरिया मामलों में लगभग 80 प्रतिशत कमी दर्ज की है,यह काबिले-तारीफ है। यहां पाठकों को बताता चलूं कि भारत सरकार ने 2027 तक मलेरिया मुक्त भारत और 2030 तक पूर्ण उन्मूलन का लक्ष्य रखा है। अतीत में ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ पशि्चम बंगाल और पंजाब जैसे राज्य मलेरिया से अधिक प्रभावित रहे, विशेषकर दूरस्थ ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में भारत की लगभग एक चौथाई आबादी मलेरिया से प्रभावित बताई जाती है। 1935 के एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत को मलेरिया के कारण प्रतिवर्ष भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता था। भारत सरकार ने 1953 में राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम आरंभ किया, जो अत्यंत सफल रहा, और 1958 में राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। निरंतर सरकारी प्रयासों, चिकित्सा सेवाओं, दवाओं और जागरूकता अभियानों से रोगियों की संख्या में भारी कमी आई, किंतु अभी भी पूर्ण सफलता शेष है। मलेरिया से बचाव के लिए मच्छरदानी का उपयोग, घर के आसपास पानी जमा न होने देना, जल टंकियों को ढककर रखना, खड़े पानी को सुखाना या बहाना, पानी की सतह पर तेल डालना जिससे लार्वा साँस न ले सके, नियमित साफ-सफाई, पूरी बाँह के कपड़े पहनना, समय पर जाँच, डॉक्टर की सलाह से दवा लेना तथा कीटनाशकों का छिड़काव करना अत्यंत आवश्यक है।

बहुत कम लोग ही यह बात जानते होंगे कि सेनाओं और सुरक्षा बलों में मलेरिया रोकथाम पर विशेष ध्यान दिया जाता है, क्योंकि उनकी तैनाती प्रायः जंगलों, सीमावर्ती क्षेत्रों और मच्छर-बहुल स्थानों पर होती है, इसलिए मच्छरदानी का उपयोग वहाँ अनिवार्य माना जाता है। मलेरिया का उपचार कुनैन तथा आर्टिमीसिनिन जैसी दवाओं से किया जाता है। कुनैन सिनकोना नामक वृक्ष से प्राप्त होती है। आरटीएस ,एसऔर आर-21 ऐसे टीके हैं जिन्हें विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मंजूरी दी है और जिनसे विशेषकर बच्चों की सुरक्षा में सहायता मिली है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि मच्छर नियंत्रण के लिए डीडीटी (डाइक्लोरो-डाइफेनाइल-ट्राइक्लोरोइथेन) कभी अत्यंत प्रभावी हथियार सिद्ध हुआ था। यह पहला आधुनिक कीटनाशक माना जाता है। इसका संश्लेषण 1874 में ऑस्ट्रिया के रसायनज्ञ ओथमार ज़ीडलर ने किया था तथा इसके कीटनाशी गुणों की खोज 1939 में पॉल हरमन मुलर ने की थी, जिन्हें 1948 में नोबेल पुरस्कार मिला। गौरतलब है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सैनिकों और आम जनता को मलेरिया तथा टाइफस से बचाने के लिए इसका व्यापक उपयोग हुआ। बाद में पर्यावरणीय प्रभावों के कारण इसके उपयोग पर नियंत्रण लगाया गया, किंतु कुछ परिस्थितियों में मलेरिया नियंत्रण हेतु सीमित उपयोग को स्वीकृति दी गई। वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, बढ़ती गर्मी, मच्छरों में कीटनाशक प्रतिरोधक क्षमता, परजीवियों में दवा प्रतिरोध, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, गरीबी, पर्याप्त कोष का अभाव, सामुदायिक भागीदारी की कमी, समय पर छिड़काव न होना, रोग की पहचान में देरी तथा दूरस्थ क्षेत्रों तक चिकित्सा सुविधा न पहुँच पाना मलेरिया उन्मूलन की बड़ी बाधाएँ हैं। इसलिए आवश्यक है कि जागरूकता अभियान चलाए जाएँ, रेडियो, फिल्म, विद्यालयों और सामाजिक माध्यमों से जानकारी पहुँचाई जाए, गरीबों को स्वास्थ्य संसाधन उपलब्ध कराए जाएँ, स्वच्छता पर बल दिया जाए और वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाए।

अंत में यही कहूंगा कि विश्व मलेरिया दिवस हमें यह संदेश देता है कि यदि सरकार, समाज, चिकित्सा संस्थान और प्रत्येक नागरिक सामूहिक संकल्प के साथ आगे आएँ, तो मलेरिया जैसी बीमारी को हराकर मलेरिया मुक्त भारत और मलेरिया मुक्त विश्व का सपना अवश्य साकार किया जा सकता है।

सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।मोबाइल 9828108858

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