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-पुस्तक समीक्षा-

‎बराक घाटी की बांग्ला कविताएँ (हिन्दी में अनुदित) द्वारा अशोक वर्मा

समीक्षक- डा. ‎रीता सिंह

‎आज मैं बालार्क प्रकाशन के कर्णधार अशोक वर्मा जी की हिन्दी में अनुदित पुस्तक बरांक घाटी की बांग्ला कविताएं के बारे में अपनी अति सीमित बुद्धि-अनुभव और क्षमता के आधार पर कुछ लिखने की कोशिश कर रही हूं। वर्मा जी बराक घाटी के भाषाप्रेमी, साहित्यकार, कवि, आलोचक और अनुवादक के रूप में विख्यात हैं। भाषा के प्रति श्रद्वाशील व्यक्तियों में उनका नाम उल्लेखनीय है। वर्मा जी बराक घाटी में हिन्दी भाषियों के बीच बिहार के दशरथ मांझी की तरह वर्षों से अकेले ही चूपचाप निःस्वार्थ भाव से साहित्य सेवा में निरन्तर अपना योगदान करते जा रहे है। उनका यह – कार्य हमारे समाज की आने वाली पीढ़ियों का मार्ग प्रशस्त करता रहेगा और हम उपकृत होते रहेंगे।

बराक घाटी की बांग्ला कविताएं एक संकलन है बांग्ला कवियों का। इसमें लगभग 156 कवियों की कविताएं है, जिसका अनुवाद बांग्ला से हिन्दी में किया गया है। पुस्तक में कवियों और कविताओं की संख्या अधिक है। इसमें करीमगंज, हाइलाकांदी और शिलचर के अनेक प्रवीण कवि, विशिष्ट कवि, नये कवि तथा अनेक कवयित्रियों की कविताएं है। एक संकलन में इतने अधिक कवियों की रचनाओं का अनुवाद कर वर्मा जी ने मूल भाव, को भरने का काम किया है। कविताओं में विविधता है। इतनी बड़ी  संख्या में कवियों की कविताएं संकलित करना, उनका अनुवाद करना यह साधारण कार्य नहीं है लेकिन उस कार्य को बड़ी कुशलता से वर्मा जी ने पूर्ण किया है। अनुवाद करना भी एक दक्षता है, इसमें दो भाषाओं के बीच विचारों, भावनाओं, सूचनाओं और उस भाषा के सांस्कृतिक ज्ञान का भी आदान-प्रदान होता है। यह एक चुनौती पूर्ण कार्य होता है और इस कार्य में आप पूर्ण रूप से सफल दिखाई देते हैं। इतनी बड़ी संख्या में सभी कवियों के बारे में तो नहीं कह सकती हूँ किन्तु कुछ कविताओं को पढ़ने बाद संतुष्टि अवश्य प्राप्त होती है। करीमगंज के प्रवीण कवि मृणाल कांति दास की कविता ‘मुक्ति स्नान” का अनुवाद भाव प्राकट्य  से उचित है। कविता की भाषा हमें आध्यात्मिक भाव की ओर ले जाती है। रसदास की कविता “शिशिर” सही में शिशिर भाव जगा देता है। उनकी यह पंक्ति

‎         लगता है पावन प्यार अहा अति सुमधुर।

‎ भाव विह्वल कर देता है। इसी प्रकार उनकी ही एक कविता एक नदी में हमें प्राकृतिक भ्रमण कराने में पूर्णतया सफल है।

‎इसी प्रकार जन्मजीत राय – ‘भारतवर्ष’ में मातृ‌भूमि की महानता दर्शाने में पूर्ण सफल है। कविता मन में देशभाव जगा देती है। महिला कवि फरिदा परबीन की कविता भूख की ओट में है जो मुखौटे, कविता का शीर्षक भले ही लम्बा है किंतु  कविता पढ़ने पर हमारे समाज की कूटनीति भाव पर व्यंग बड़ा ही सुंदर हैं। हाइलाकांदी के विशिष्ट कवि कल्लोल चौधरी की कविता – मि‌ट्टी के साथ, सुशान्त मोहन चट्टोपाध्याय जी की कविता-खत, उमा भट्टाचार्य जी की कविता-कुछ सोची ही नही थी आदि असंख्य कविताएं है, जिनकी भाषा और भाव अनुकूल है। पढ़कर लगा ही नही कि यह अनुदित कविता है। संकलन में शिलचर के भी अनेक प्रवीण कवियों की कविता है, जिनके बारे में कुछ कहने की मेरी क्षमता ही नही है फिर भी दो चार शब्द कहने की कोशिश कर रही हूं। भक्ति माधव चट्‌टोपाध्याय की कविता-आधी उम्र के गीत की यह पंक्ति –

‎आधी उम्र में पहुंच, पीछे ताक कर देखा बन्द है दुआर।

बड़ी ही सरसता सहज है। शिलचर के ही प्रवीण कवि नगेन्द्र चन्द्रश्याम की कविता- भूख, हमारे चाय बागानों की वेदना, पीड़ा को पूरी तरह प्रकट करने में समर्थ हुए है। वर्तमान में बागानों की दुर्दशा का वास्तविक चित्र पस्तुत हो जाता है। कविता की यह पंक्ति उनके पीड़ा को पूरी तरह व्यक्त कर देती है-

‎चाय बागान के पेड़ों में उपज है नही

काम बंद है

‎भूख केवल भूख और भूख।

‎स्व. देवेन्द्र पाल चौधरी की कविता-साध में कवि अपनी इच्छा को प्रकट करने में पूरी तरह सफल हुआ है। प्रभु दर्शन की मार्मिक चाह को कवि ने बड़ी सुन्दरता से प्रकट किया है। वृद्धावस्था की दीनता को इस प्रकार प्रकट किया है – मेरे अवगुण को बिसरो

‎पल-फूल ढल रही उम्र,

‎ अब मुझे तुम संभालो।

‎ईश्वर के प्रति समर्पण भाव बडी सरलता के साथ प्रकट है। प्रवीण कवि तपोधीर भट्टाचार्य की कविता विजय का लघु संगीत, जल, आवागमन कविताओं के अनुवाद में शब्दविन्यास बहुत ही सटीक किया गया है।

‎चलो चले आकाश के गीत से पंछी के पंख में,

‎ चलो – चलना बहुत अच्छा लगता है।

‎महिला कवियों में कस्तुरी होम चौधुरी की कविता दीपावली हमें अन्तर के दीप से संसार को उजागर करने की प्रेरणा देती है। विशिष्ट कवयित्री झूमूर पाण्डेय की कविता – आज तुम कोई झुठा वादा न करो में बड़ी ही सहजता सरलता सरलता दिखाई देती है। इसी प्रकार अनुरुपा विश्वास की कविता- “एक पेड़ एक आदमी” में शब्द चित्र बड़ा मोहक है। उसका अनुवाद बड़ा ही सरल और स्पष्ट है। इसी क्रम में अनेक कविताएं है, जिनका भाव समझने में पाठक को कोई दुविधा नही होती हैं।

‎निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि यह संकलन अपने आप में गागर में सागर भरने की कोशिश की गयी है। भाषा की दृष्टि से कोई-कोई कविता अटपटी और अस्पष्ट लगती है। नही तो बाकी सभी रचनाओं का अनुवाद भाव मुल्य अनुरूप है। भाषा, शब्द, सरल, सहज और मनोग्राही है। यह पुस्तक हमारे बीच जो बांग्ला भाषा में सक्षम नहीं है, उनके लिए उपयोगी सिद्ध होगी। साथ ही अपनी भाषा में उन कवियों की कविताओं का आनंद उठा पायेंगे, उनकी कविता प्रवृतियों को समझ पायेंगे, इससे भाषा- प्रेमियों की साहित्य रुचि बढ़ेगी। यह संकलन हमारे समाज के लिए मुल्यवान है। हम लेखक के प्रति  आभार प्रकट करते हैं।

‎डा. रीता सिंह मालूग्राम, शिलचर(असम)

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