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बराक घाटी में पाइप्ड गैस परियोजना में देरी बना जन-आंदोलन का मुद्दा

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प्राकृतिक संसाधनों के समुचित उपयोग से बदल सकती है क्षेत्र की तस्वीर

शिव कुमार, शिलचर, 12 अप्रैल:
दक्षिण असम की बराक घाटी, जो प्राकृतिक संसाधनों विशेषकर हाइड्रोकार्बन (प्राकृतिक गैस) की दृष्टि से समृद्ध मानी जाती है, आज भी पाइप्ड प्राकृतिक गैस (पीएनजी) और संपीड़ित प्राकृतिक गैस (सीएनजी) जैसी बुनियादी सुविधाओं से व्यापक रूप से वंचित है। यह मुद्दा अब केवल विकास की धीमी रफ्तार तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि आम नागरिकों की दैनिक जरूरतों, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय असमानता का प्रतीक बनता जा रहा है।

इस गंभीर विषय को लेकर ट्रेड यूनियन ऑफ ओएनजीसी वर्कर्स के महासचिव हीरेश चक्रवर्ती ने प्रेस को जारी एक विस्तृत बयान में केंद्र और असम सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि बराक घाटी में उपलब्ध प्राकृतिक गैस का समुचित उपयोग नहीं होना न केवल स्थानीय जनता के साथ अन्याय है, बल्कि राष्ट्रीय संसाधनों की भी बर्बादी है।


उत्पादन है, लेकिन वितरण नहीं: जमीनी हकीकत

जानकारी के अनुसार ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) इस क्षेत्र में वर्षों से प्राकृतिक गैस और कंडेनसेट का उत्पादन कर रही है। इसी आधार पर वर्ष 2019 में असम गैस कंपनी लिमिटेड ने ओएनजीसी के साथ प्रतिदिन 1,20,000 मानक घन मीटर गैस खरीदने का समझौता किया था।

इसके बाद ऑयल इंडिया लिमिटेड और गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड के सहयोग से पूर्वा भारती गैस प्राइवेट लिमिटेड का गठन किया गया, जिसे बराक घाटी में पाइपलाइन नेटवर्क बिछाने, घरों तक गैस पहुंचाने, उद्योगों को ईंधन उपलब्ध कराने और सीएनजी स्टेशन स्थापित करने की जिम्मेदारी दी गई।

हालांकि, वास्तविक स्थिति चिंताजनक है। वर्तमान में यह संयुक्त कंपनी ओएनजीसी से मात्र 1,500–1,700 मानक घन मीटर प्रतिदिन गैस ही खरीद रही है—जो कि तय समझौते का एक छोटा अंश है। मुख्य कारण है—क्षेत्र में पाइपलाइन नेटवर्क का बेहद सीमित विस्तार।


सीमित आपूर्ति, व्यापक निर्भरता

वर्तमान में शिलचर और सोनाई के कुछ चुनिंदा इलाकों में ही पाइप्ड गैस की आंशिक आपूर्ति हो रही है। इसके विपरीत, अधिकांश आबादी आज भी एलपीजी सिलेंडर पर निर्भर है, जहां सप्लाई में अनियमितता, कीमतों में उतार-चढ़ाव और सुरक्षा जोखिम जैसी समस्याएं बनी रहती हैं।


ऊपरी असम से तुलना: क्षेत्रीय असंतुलन का आरोप

विशेषज्ञों और स्थानीय संगठनों का कहना है कि जब ऊपरी असम के तिनसुकिया, डिब्रूगढ़, जोरहाट, सिबसागर, गोलाघाट और मोरन जैसे क्षेत्रों में पीएनजी और सीएनजी सेवाएं सफलतापूर्वक लागू हो चुकी हैं, तो बराक घाटी को इससे वंचित रखना स्पष्ट रूप से क्षेत्रीय असंतुलन को दर्शाता है।

इन क्षेत्रों में घर-घर पाइप्ड गैस पहुंच चुकी है और सीएनजी स्टेशन भी संचालित हैं, जिससे घरेलू उपभोक्ताओं, परिवहन क्षेत्र और उद्योगों को सीधा लाभ मिल रहा है।


ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित का सवाल

वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में ऊर्जा सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुकी है। भारत अपनी रसोई गैस (एलपीजी) की लगभग 90% आवश्यकता आयात के माध्यम से पूरी करता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपूर्ति बाधित होने या कीमतों में वृद्धि का सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ता है।

ऐसे में यदि बराक घाटी में उपलब्ध घरेलू प्राकृतिक गैस का प्रभावी उपयोग किया जाए, तो आयात निर्भरता कम होने के साथ-साथ देश की ऊर्जा आत्मनिर्भरता भी मजबूत होगी।


संभावित लाभ: बहुआयामी विकास का आधार

विशेषज्ञों के अनुसार, पाइप्ड और संपीड़ित प्राकृतिक गैस का व्यापक उपयोग बराक घाटी के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है:

  • घरेलू सुविधा: घरों तक सीधी गैस आपूर्ति से सिलेंडर बुकिंग, डिलीवरी और स्टोरेज की समस्या खत्म होगी।
  • आर्थिक लाभ: पीएनजी, एलपीजी की तुलना में सस्ती होती है, जिससे मध्यम और निम्न आय वर्ग को राहत मिलेगी।
  • रोजगार सृजन: पाइपलाइन निर्माण, रखरखाव और वितरण से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
  • औद्योगिक विकास: सस्ती और स्थिर गैस आपूर्ति से उद्योगों के लिए अनुकूल वातावरण बनेगा, जिससे निवेश आकर्षित होगा।
  • पर्यावरणीय लाभ: सीएनजी और पीएनजी स्वच्छ ईंधन हैं, जिससे वायु प्रदूषण में कमी आएगी और स्वास्थ्य बेहतर होगा।
  • परिवहन में सुधार: सीएनजी आधारित वाहनों से ईंधन लागत कम होगी और सार्वजनिक परिवहन अधिक किफायती बनेगा।
  • राजस्व वृद्धि: गैस की खपत बढ़ने से सार्वजनिक कंपनियों और सरकार की आय में वृद्धि होगी।

पत्रकार वार्ता में ये रहे उपस्थित

इस विषय पर आयोजित पत्रकार वार्ता में संगठन के अध्यक्ष सुप्रिया भट्टाचार्जी, संगठन सचिव राजन कुंवर, तथा रेमन बोरा सहित अन्य पदाधिकारी एवं सदस्य उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में बराक घाटी में गैस परियोजना को शीघ्र गति देने की मांग उठाई।


सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी बेहतर विकल्प

विशेषज्ञों का मानना है कि पाइप्ड प्राकृतिक गैस, एलपीजी की तुलना में अधिक सुरक्षित होती है। पीएनजी हवा से हल्की होने के कारण रिसाव की स्थिति में ऊपर की ओर उड़ जाती है, जबकि एलपीजी जमीन पर फैलकर दुर्घटना का जोखिम बढ़ाती है।


प्रमुख मांगें

ट्रेड यूनियन और स्थानीय संगठनों ने केंद्र और राज्य सरकार के समक्ष निम्नलिखित मांगें रखी हैं:

  • बराक घाटी में पाइपलाइन नेटवर्क का शीघ्र विस्तार
  • पीएनजी और सीएनजी सेवाओं को प्राथमिकता के आधार पर लागू करना
  • गैस उत्पादन और आपूर्ति बढ़ाने के लिए ठोस नीति बनाना
  • संबंधित कंपनियों की कार्यप्रणाली की समीक्षा और जवाबदेही तय करना

निष्कर्ष

बराक घाटी में उपलब्ध प्राकृतिक गैस केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि समग्र विकास का आधार बन सकती है। आवश्यकता है—सुनियोजित रणनीति, मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और समयबद्ध क्रियान्वयन की।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या सरकार और संबंधित एजेंसियां इस दिशा में ठोस कदम उठाएंगी, या फिर बराक घाटी के लोग इस बुनियादी सुविधा के लिए यूं ही इंतजार करते रहेंगे?

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