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‘गवर्नेंस’ बनाम ‘लोकप्रियता’ 

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‘गवर्नेंस’ बनाम ‘लोकप्रियता’

राजेश कुमार सिंह, नई दिल्ली

पश्चिम बंगाल की राजनीति वर्तमान में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और जटिल मोड़ पर खड़ी है। 2026 के विधानसभा चुनाव (23 और 29 अप्रैल) के करीब आते ही राज्य में राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। बंगाल का यह चुनाव न केवल राज्य की सत्ता का भविष्य तय करेगा, बल्कि भारतीय राजनीति के क्षेत्रीय बनाम राष्ट्रीय विमर्श को भी एक नई दिशा देगा।सही मायने में बंगाल की राजनीति अब स्पष्ट रूप से द्विध्रुवीय (Bipolar) हो चुकी है। एक ओर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) है, जो अपने ‘बंगाली अस्मिता’ और कल्याणकारी योजनाओं (जैसे लक्ष्मी भंडार) के भरोसे सत्ता की हैट्रिक के बाद चौथी बार जीत की उम्मीद कर रही है। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी (BJP) है, जिसने पिछले कुछ वर्षों में मुख्य विपक्षी दल के रूप में अपनी स्थिति मजबूत की

कल्याणकारी योजनाएं बनाम भ्रष्टाचार के आरोप: ममता सरकार की ‘लक्ष्मी भंडार’, ‘कन्याश्री’ और ‘स्वास्थ्य साथी’ जैसी योजनाओं ने ग्रामीण महिलाओं और गरीब वर्ग में एक मजबूत वोट बैंक तैयार किया है। लेकिन इसके समानांतर, शिक्षक भर्ती घोटाला और संदेशखली जैसी घटनाओं ने सरकार की छवि पर भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था के सवाल खड़े किए हैं।

अस्मिता की राजनीति: TMC लगातार खुद को ‘बंगाल की बेटी’ और BJP को ‘बाहरी’ बताकर बंगाली संस्कृति और भाषा के कार्ड को मजबूती से खेलती रही है। यह रणनीति 2021 में काफी सफल रही थी।

ध्रुवीकरण और जनसांख्यिकी: बंगाल के चुनावों में धार्मिक ध्रुवीकरण एक बड़ा कारक रहा है। मुस्लिम मतदाताओं का (लगभग 30%) झुकाव TMC की जीत सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। वहीं, BJP मतुआ समुदाय और उत्तर बंगाल के राजबंशी वोटों के सहारे हिंदू मतों के समेकन की कोशिश कर रही है।

संगठनात्मक चुनौती: BJP के लिए सबसे बड़ी चुनौती एक सशक्त स्थानीय चेहरे और बूथ स्तर पर TMC जैसे मजबूत कैडर की कमी है। हालांकि शुभेंदु अधिकारी जैसे नेता आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं, लेकिन पार्टी के भीतर अंतर्कलह अक्सर सतह पर आ जाती है।

“आज जो बंगाल सोचता है, भारत कल सोचता है” – गोपाल कृष्ण गोखले का यह कथन कभी बंगाल की बौद्धिक और औद्योगिक श्रेष्ठता का प्रमाण था। लेकिन आज की परिस्थिति इस कथन को एक कड़वे मजाक की तरह प्रस्तुत करती है। जिस बंगाल ने भारत को उसका पहला औद्योगिक ढांचा दिया, जहाँ जूट मिलों की चिमनियों से निकलता धुआं समृद्धि का प्रतीक था, आज वही बंगाल अपने युवाओं को श्रमिक के रूप में दूसरे राज्यों में भेजने के लिए विवश है। बंगाल का औद्योगिक सूर्यास्त केवल एक राज्य की कहानी नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबक है कि कैसे राजनीतिक हठधर्मिता और गलत प्राथमिकताएं एक समृद्ध सभ्यता को पतन की ओर ले जा सकती हैं।

औद्योगिक पलायन की लंबी फेहरिस्त

बंगाल के पतन की कहानी रातों-रात नहीं लिखी गई। यह दशकों की उपेक्षा और शत्रुतापूर्ण व्यावसायिक वातावरण का परिणाम है।

साइकिल और केमिकल इंडस्ट्री: कभी कोलकाता के आसपास साइकिल निर्माण की विशाल इकाइयां थीं। नीतियों की जटिलता और श्रमिक अशांति के कारण यह पूरा उद्योग पंजाब के लुधियाना में स्थानांतरित हो गया। आज लुधियाना विश्व का साइकिल हब है, जबकि बंगाल में केवल खंडहर बचे हैं। यही हाल केमिकल सेक्टर का रहा; रायपुर और गुजरात ने लाल कालीन बिछाकर उन निवेशकों का स्वागत किया जिन्हें बंगाल में ‘पूंजीवादी शत्रु’ माना गया।

बैटरी और ऑटोमोबाइल: एक्साइड जैसी दिग्गज कंपनियों का आधार बंगाल था। मालदा और आसपास के क्षेत्रों में बैटरी निर्माण की अपार संभावनाएं थीं, जो अब महाराष्ट्र और गुजरात की नीतियों के कारण वहां शिफ्ट हो गई हैं।

हिंदुस्तान मोटर्स का अंत: ‘एम्बेसडर’ कार भारत की पहचान थी, जिसका दिल उत्तरपारा (बंगाल) में धड़कता था। लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप और आधुनिकीकरण के प्रति उदासीनता ने इस दिग्गज कंपनी को इतिहास के पन्नों में दफन कर दिया।

ऐतिहासिक भूल: बिरला से टाटा तक का सफर

बंगाल के औद्योगिक इतिहास में दो घटनाएं ऐसी हैं जिन्होंने निवेशकों के आत्मविश्वास को पूरी तरह तोड़ दिया।

बिरला प्रकरण: कम्युनिस्ट शासन के दौरान जब उद्योगपति बी.के. बिरला को उनकी कार से खींचकर अपमानित करने का प्रयास किया गया, तो वह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं था, बल्कि वह बंगाल की ‘बिज़नेस एथिक्स’ पर हमला था। इसके बाद बिरला समूह सहित कई बड़े मारवाड़ी परिवारों (जैसे खेतान, गोयनका, बजाज) ने बंगाल से अपना मोहभंग कर लिया और महाराष्ट्र, गुजरात व राजस्थान को अपनी कर्मभूमि बनाया।

सिंगूर और टाटा नैनो का संघर्ष: २१वीं सदी में बंगाल के पास वापसी का एक सुनहरा मौका था—’टाटा नैनो’। रतन टाटा बंगाल में निवेश करना चाहते थे, लेकिन ममता बनर्जी के नेतृत्व में हुए हिंसक आंदोलन ने इसे राजनीति की भेंट चढ़ा दिया। नैनो को “माचिस की डिब्बी” कहना उस तकनीकी और औद्योगिक क्रांति का अपमान था, जो बंगाल की तस्वीर बदल सकती थी

बंगाल की सबसे बड़ी पूंजी उसका ‘मानव संसाधन’ था। एक समय था जब बंगाल से नोबेल विजेता, अर्थशास्त्री और फिल्मकार निकलते थे। आज भी निकलते हैं, लेकिन वे बंगाल में नहीं टिकतेl बंगाल की अर्थव्यवस्था में मारवाड़ी समाज की भूमिका रीढ़ की हड्डी के समान थी। लेकिन राजनीतिक लाभ के लिए ‘बंगाली बनाम बाहरी’ का जो नैरेटिव बुना गया, उसने मारवाड़ी व्यापारियों को असुरक्षित महसूस कराया। झुनझुनवाला, नेवटिया और लोढ़ा जैसे समूहों ने जब निवेश के लिए मुंबई और अहमदाबाद को चुना, तो बंगाल ने केवल पैसा नहीं, बल्कि ‘बिज़नेस एक्यूमेन’ (व्यापारिक सूझबूझ) भी खो दी।बंगाल आज एक चौराहे पर खड़ा है। एक तरफ उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है, तो दूसरी तरफ एक ढहता हुआ औद्योगिक ढांचा। हालाँकि 2024 के लोकसभा चुनावों के नतीजों ने दिखाया कि TMC का आधार अब भी मजबूत है, लेकिन BJP ने अपने वोट शेयर को बनाए रखने में सफलता पाई है। 2026 की लड़ाई ‘गवर्नेंस’ बनाम ‘लोकप्रियता’ की होगी। ऐसे में बंगाल का चुनाव केवल वोट की गिनती नहीं, बल्कि विचारधाराओं का टकराव है।

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