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‘अपराजेय’ कोई नहीं, इसलिए जन-हित न भूलिए

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‘अपराजेय’ कोई नहीं, इसलिए जन-हित न भूलिए
◾अजय जैन ‘विकल्प’, इंदौर (मप्र)
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   जैसे खेल में बहुत कुछ तय होने पर भी अनेक बार नया इतिहास रचा जाता है, ऐसे ही राजनीति में भी सबका समय आता है और जनादेश किसी को सत्ता देता है, तो किसी के किलों की दीवारें दरक जाती है। अर्थात साफ है कि राजनीति में कोई ‘अपराजेय’ नहीं होता। बंगाल, असम से लेकर तमिलनाडु तक के विधानसभा चुनाव के नतीजे साफ बोल रहे हैं कि जनता अब केवल चेहरों पर नहीं, बल्कि ज़मीनी सच्चाई और आचरण पर अपना फैसला सुनाती है।
    दुनिया के कईं देशों में लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती ही यह है कि यहाँ ‘अंतिम ठप्पा’ हमेशा मौन मतदाता का ही होता है। राजनीति के बड़े-बड़े धुरंधर बनाम सूरमा जब अपने ही सुरक्षित किलों में बुरी तरह परास्त होते हैं, तो वह बात गहरे राजनीतिक बदलाव का संकेत होती है, जिससे सबको अनुभव लेकर चेतना चाहिए और जनता का हित प्राथमिकता से समझना चाहिए।
   बंगाल में बरसों की सत्ता का सूर्यास्त, ‘अजेय’ किलों में दरार आना एवं भाजपाई ध्रुवीकरण के आगे टीएमसी का ऐसे धराशायी होना बता रहा है कि जनता से दूरी, कुर्सी का दुरूपयोग और राजनीति में ‘अपराजेय’ होने का मुगालता ही अक्सर सबसे बड़े पतन का कारण बनता है। बंगाल से तमिलनाडु तक के हालिया परिणाम सिर्फ सीटों का फेरबदल नहीं, बल्कि भारतीय मतदाता के उस ‘मौन प्रहार’ या मौन बदले की गूँज हैं, जो अब चेहरों की चमक से ज़्यादा कर्म की कठोरता को तौलता है।
   भारतीय लोकतंत्र का इतिहास देखें तो अनेक जगह गवाही मिलेगी कि यहाँ की जनता ने कभी भी किसी को ‘स्थायी पट्टा’ नहीं दिया। चुनाव परिणामों की जो हालिया तस्वीर बंगाल, असम और तमिलनाडु से उभरी है, उसने न केवल राजनीतिक पंडितों को चौंकाया है, बल्कि स्थापित सत्ताओं के उस अहंकार को भी झकझोरा है, जो खुद को अभेद्य दुर्ग माने हुए थे।
    हालिया चुनाव परिणामों ने इस सत्य को एक बार फिर दोहराया है, कि जनता का विश्वास अर्जित करना जितना कठिन है, उसे बनाए रखना उससे कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण है।
      सबसे पहले बात पश्चिम बंगाल की, जहाँ राजनीति हमेशा से भावनाओं और विचारधाराओं का अनूठा मिश्रण रही है, लेकिन इस बार भवानीपुर जैसी पारंपरिक सीट पर ममता बनर्जी की हार और नंदीग्राम में सुवेंदु अधिकारी की दोहरी जीत ने कई मिथकों को तोड़ दिया है। भवानीपुर सीट मतलब ममता बनर्जी ‘दीदी’ के गढ़ में ‘सुवेंदु की लहर’ का चलना या नंदीग्राम और भवानीपुर—दोनों मोर्चों पर सुवेंदु अधिकारी की जीत साबित करती है, कि राजनीति में ‘अपनों’ का मोह और अपनों से ही मिला धोखा, दोनों ही निर्णायक ‘खेला’ होते हैं। इस जीत के पीछे वह ‘एस.आई.आर.’ फैक्टर (स्ट्रेटेजिक इंटेलीजेंस एन्ड रिस्पांस) है, जिसने गुप्त रूप से जमीनी स्तर पर काम किया।
राजनीतिक नजरिए से इसे केवल 1 ‘सीट का नुकसान’ कहना गलत होगा; यह तो उस ‘बारीक और विराट प्रबंधन’ की जीत है, जिसे भाजपा के रणनीतिकारों ने वर्षों की मेहनत से तैयार किया था। यह भाजपा के महासचिव रहे कैलाश विजयवर्गीय जैसे नेताओं के बंगाल में 5 साल पहले शुरू किए गए परिश्रम का रंग है। यह परिणाम स्पष्ट करते हैं कि कैलाश विजयवर्गीय ने 5 साल पहले नई फ़सल की उम्मीद में मेहनत से जो बीज बोए थे, उनकी जड़ें अब पत्थर फाड़कर बाहर निकल आई हैं। मतलब यह ‘मेहनत और मौन’ की जीत है।
   निश्चित रूप से जब अराजकता बढ़ती है और राजनीति में ‘हट्टोल’ (हंगामे) की संस्कृति पर जब मेहनत और सटीक रणनीति हावी होती है, तो परिणाम ऐसे ही चौंकाने वाले होते हैं। बंगाल के चुनाव ने स्पष्ट कर दिया कि ‘बांग्ला अस्मिता’ का कार्ड हर बार काम नहीं आ सकता है। आपको राज्य की जनता की चिंता करनी ही पड़ेगी। जब किसी राज्य में बेरोजगारी, उद्योगों का अभाव और युवाओं का असंतोष चरम पर हो, तो भावनाएं पेट की आग के सामने फीकी पड़ जाती हैं। यहाँ भी तो यही हुआ, आखिर भावनाओं से पेट कब तक भरेगा।
   ‘टोलाबाजी’ और परिवारवाद का बोझ भी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को ले डूबा है। दल के भीतर की कलह और परिवारवाद को जनता ने सिरे से नकारा है। राज्य में आला दर्जे की ‘टोलाबाजी’ यानी अवैध वसूली जैसे मुद्दों ने शासन की छवि को जो नुकसान पहुँचाया, उसकी भरपाई ‘कल्याणकारी योजनाएं’ भी नहीं कर सकीं। आम आदमी की इज्जत और उसकी गाढ़ी कमाई जब सत्ताई संरक्षित गुंडों के हाथों लुटती है, तो जनता इसका बदला मौन रहकर ‘जनादेश’ में लेती है। सत्ता पक्ष को लगा, कि ‘माछेर झोल’ और ‘मां-माटी-मानुष’ के नारे भ्रष्टाचार के दाग धो देंगे, लेकिन बंगाली मानुष ने बता दिया कि उसे अब ‘झालमुड़ी’ वाले साधारण आदमी का संघर्ष और सुरक्षा ही चाहिए; ‘माछेर झोल’ की लज्जत नहीं।
  हर सरकार के लिए यह परिणाम एक बड़ा सबक है, कि योजनाएँ  ‘मत’ दिला सकती हैं, लेकिन भ्रष्टाचार का दीमक उन मतों की बुनियाद को खोखला कर देता है। इसलिए, बंगाल के इस चुनावी दंगल में टीएमसी की ‘माछेर झोल’ की सांस्कृतिक अपील के मुकाबले भाजपा द्वारा ‘झालमुड़ी’ (साधारण जनता का भोजन और संघर्ष) का मुद्दा कहीं अधिक प्रभावी रहा।
      अब चलते हैं असम और तमिलनाडु में, तो यहाँ भी जनता ने बड़ा सबक दिया है। परिवर्तन की यह बयार केवल बंगाल तक सीमित नहीं रही। विरासत के ढहते स्तंभ की यही कहानी असम के जोरहाट में भी दोहराई गई। जोरहाट सीट पर कांग्रेस के बड़े चेहरे गौरव गोगोई की करारी हार साफ इशारा है कि विरासत और कद हमेशा जीत की गारंटी नहीं होते। यहाँ हितेंद्र नाथ गोस्वामी की जीत सिद्ध करती है कि संगठन की मजबूती और स्थानीय जुड़ाव किसी भी ‘मुख्यमंत्री पद के चेहरे’ को चुनौती दे सकता है। हितेंद्र नाथ गोस्वामी की जीत यह रेखांकित करती है कि पूर्वोत्तर की राजनीति अब दिल्ली के ड्राइंग रूम से नहीं, बल्कि ब्रह्मपुत्र की लहरों और वहाँ के स्थानीय मुद्दों से तय हो रही है। गौरव गोगोई की हार कांग्रेस के लिए आत्मचिंतन का सबसे बड़ा विषय होना चाहिए, कि आखिर क्यों उनकी विरासत जनता से कटती जा रही है।
      ऐसा ही दृश्य सुदूर दक्षिण में तमिलनाडु में भी देखने को मिला है। स्वयं को धुरंधर मुख्यमंत्री मानने वाले एम.के. स्टालिन का अपनी मजबूत सीट कोलाथुर से हारना, भारतीय राजनीति के सबसे बड़े झटकों में से एक है, जबकि यहाँ से वे लगातार ३ बार जीत चुके थे। एम.के. स्टालिन का अपनी अभेद्य सीट से हारना अविश्वसनीय है। यहाँ वी.एस. बाबू ने वह कर दिखाया, जिसे नामुमकिन माना जा रहा था। मुख्यमंत्री की हार यह बताती है कि जनता अब यथास्थिति से ऊब चुकी है। यहाँ पर टी.वी.के. के वी.एस. बाबू की जीत यह संकेत है कि मतदाता अब ‘विकल्प’ की तलाश में है और वह पुराने एवं स्थापित नेतृत्व को भी बदलने में संकोच नहीं करने वाला है। क्या इसे जनता की भाषा में एम. के. स्टालिन का ‘अपराजेय’ होने का जबरिया मुगालता पालना नहीं कहेंगे!
    राजनीतिक दृष्टि से विश्लेषण करें तो मतदाताओं द्वारा दी गई चोट के साथ यह ध्रुवीकरण और प्रबंधन का खेला भी है, क्योंकि इन परिणामों के पीछे भाजपा का वह संगठनात्मक ढांचा है, जो ज्ञानेश कुमार गुप्ता जैसे रणनीतिकारों और पर्दे के पीछे काम करने वाले ‘एस.आई.आर.’ (रणनीतिक तंत्र) की मेहनत से खड़ा हुआ है। विपक्षी मतों का ध्रुवीकरण और उन्हें अपने पाले में लाने की भाजपाई कला ने चुनाव को पूरी तरह से एकतरफा मुकाबले से हटाकर काँटे की टक्कर में बदल दिया।
    भाजपा लगातार काम करती है, सिर्फ चुनाव में नहीं जागती है, कड़े निर्णय लेती है, कार्यकर्ताओं पर विश्वास करती है और उनको बड़ा भी बनाती है, इसलिए ‘महीन प्रबंधन’ यानी मतदान केंद्र स्तर तक की पकड़ पर पूरी मेहनत की गई। भाजपा का छोटा-बड़ा प्रबंधन इस बार केवल कागजों पर नहीं, बल्कि हर उस बूथ पर दिखा, जहाँ कभी तृणमूल का एकतरफा राज था। इसने यह पक्का किया कि सरकार विरोधी लहर को सही दिशा दी जाए। दूसरी ओर, सत्ताधारी दलों के भीतर का ‘अहंकार’ और ‘अजेय’ होने का भ्रम उनकी पराजय का सबसे बड़ा कारण बना है।
   इन चुनावी परिणामों का सबसे बड़ा निष्कर्ष बनाम नसीहत, चेतावनी और संदेश यही है, कि लोकतंत्र में किसी भी दल के लिए कोई भी गढ़ स्थायी नहीं होता। जनता जब बदलाव का मन बनाती है, तो वह न तो किसी का कद देखती है और न ही पिछला कीर्तिमान। भले ही राज्य या देश की सत्ता आपके पास 15-20 साल से हो, पर जब बेरोजगारी, विकास की कमी और प्रशासन में पारदर्शिता का अभाव बढ़ जाता है, तो ऐसे मुद्दे किसी भी सत्ता की नींव सहजता से हिला देते हैं।
   इसलिए, नेताओं और नेतृत्व को यह समझना होगा कि ‘जनता का हित’ सर्वोपरि है। कल्याणकारी योजनाएं तब तक सफल नहीं मानी जा सकतीं, जब तक वे आम आदमी के आत्मसम्मान और सुरक्षा को सुनिश्चित न करें। बंगाल, असम और तमिलनाडु के ये नतीजे राजनीतिज्ञों के लिए चेतावनी हैं, तो अवसर भी—आत्मचिंतन करने का और अपनी प्राथमिकताओं को फिर से तय करने का।
  अंततः, अब देखना यह होगा कि क्या सत्ता के गलियारों में बैठे लोग इस गूँज को सुनकर अपनी नीतियों और आचरण में बदलाव लाते हैं, या फिर ‘इतिहास’ खुद को दोहराने के लिए तैयार खड़ा है। दलों को याद रखना होगा कि जब’अपराजेय’ कोई नहीं, इसलिए जन-हित को न भूलिए, क्योंकि जनभावना का बांध टूटता है, तो मजबूत किलों की दीवारें भी रेत की तरह ढह जाती हैं। कारण कि राजनीति संभावनाओं का खेल है, लेकिन कोई भी दल यह नहीं भूले कि इन संभावनाओं की चाबी केवल और केवल आम जनता के हाथ में होती है।

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