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भूकम्प : कारण एवं बचाव – ई0 प्रभात किशोर       

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भूकम्प : कारण एवं बचाव                                                                           – ई0 प्रभात किशोर

भूकम्प यानी धरती डोलने के नाममात्र से मानव मस्तिष्क में कंपकंपी छा जाती है । इसमें उन्हें संभलने का मौका नहीं मिलता और पलक झपकते सब कुछ प्रकृति की भेंट चढ़ जाती है । हालांकि यह निर्विवाद सत्य है कि कुछेक अपवादों को छोड़कर भूकंप से लोगों की मौत नहीं होती । मौत होती है असुरक्षित निर्माण की वजह से ।

भूकम्प के लिए पृथ्वी की भौगोलिक संरचना, विविधताएं एवं आंतरिक हलचल जिम्मेवार है । पूरी धरती 12 बड़े टैक्टोनिक प्लेटों पर स्थित है । ये हैं – भारतीय प्लेट, यूरेशियाई प्लेट, भारतीय- ऑस्ट्रेलियाई प्लेट, फिलीपिंस प्लेट, अंटाकर्टिक प्लेट, अफ्रिकी प्लेट, अरेबियन प्लेट, दक्षिण अमेरिकी प्लेट, उत्तरी अमेरिकी प्लेट, कैरेबियन प्लेट और पेसिफिक प्लेट । ये प्लेटें अपने नीचे स्थित तरल पदार्थ लावा पर तैर रही हैं । ये प्लेटें धीरे-धीरे घुमती रहती हैं और हर साल अपने स्थान से लगभग 4-5 से0मी0 खिसक जाती हैं । कभी कोई प्लेट किसी प्लेट के निकट आती है तो कोई प्लेट किसी से दूर चली जाती है । कभी-कभी ये आपस में टकरा जाती हैं । जहां एक प्लेट दूसरी प्लेट की बाउन्डरी से टकराती हैं तो फॉल्ट उत्पन्न होते हैं जिससे धरती के नीचे की ऊर्जा बाहर निकलती है और भूकम्प आता है ।

भारतीय प्लेट हिमालय पर्वत से लेकर अंटाकर्टिक तक फैली हुई है । यह पाकिस्तान सीमा को छुती भर है । यह हिमालय के दक्षिण में है जबकि यूरेशियाई प्लेट (जिनमें चीन आदि देश आते हैं) हिमालय के उत्तर में हैं । भारतीय प्लेट उत्तर-पूर्व दिशा में हरेक साल 4.7 सेमी की गति से ऊपर की ओर बढ़ रही है जबकि यूरेशियन प्लेट उतर की तरफ 2 सेमी की गतिसे बढ़ रही है । ऐसे में यहां दोनों प्लेटों की टक्कर से भूकंप आने की संभावना बनी रहती है ।

भूकंप का केन्द्र वह स्थान होता है जिसके ठीक नीचे प्लेटों में हलचल से भूगर्भीय ऊर्जा निकलती हैं । इस स्थान पर भूकंप का कंपन ज्यादा होता है और झटका तेज । कंपन का दायरा जैसे-जैसे दूर होता जाता है उसका प्रभाव भी घटते जाता है । भूकंप की तीव्रता इस बात पर निर्भर करती है कि भूकंपकीय आवृति ऊपर की तरफ है या दायरे में । कंपन की आवृति ऊपर की तरफ होने की स्थिति में कम क्षेत्र प्रभावित होते हैं ।

भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर मापी जाती है । भूकंप के दौरान धरती के अंदर से जो ऊर्जा निकलती है उसकी तीव्रता को इससे मापा जाता है । रिक्टर पैमाने पर 5 से कम तीव्रता वाले भूकंपों को हल्का माना जाता है । हालांकि यह क्षेत्र की संरचना पर भी निर्भर करता है । यदि भूकंप का केन्द्र नदी का तट हो और वहां बिना भूकंपरोधी तकनीक के ऊॅंची इमारतें खड़ी हों, तो 5 की तीव्रता वाला भूकंप भी खतरनाक हो सकता है । 2 या इससे कम तीव्रता वाले भूकंपों को रिकॉर्ड करना मुश्किल है । इन्हें महसूस नहीं किया जाता । 5-5.9 की तीव्रता वाले भूकम्प को मध्यम तथा 6 से अधिक की तीव्रता वाले भूकंपों को घातक माना जाता है ।

तीव्रता के आधार पर ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैन्डर्डस् द्वारा (आई0 एस0 कोड 1893-2002) भारतवर्ष में भूकंप के पांच जोन बनाये गये हैं, जिनमें से अध्ययनों के आधार पर वर्तमान में चार मान्य हैं क्योंकि जोन-1 का जोन-2 में विलय कर दिया गया है । सिस्मिक जोन-5 को सबसे अधिक सक्रिय यानी खतरनाक तथा जोन-2 को सबसे कम सक्रिय यानी सुरक्षित माना गया है । जोन-2 में 4 मैग्नीट्यूड से कम, जोन-3 में 5, जोन-4 में 7 तथा जोन-5 में 8 मैगनीट्यूड से अधिक तीव्रता होती है । जोन-5 में पूरा उतरी-पूर्वी राज्य, जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्से, हिमाचल, उत्तराखंड, कच्छ का रण, बिहार के कुछ हिस्से, एवं अंडमान-निकोबार, जोन-4 में जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्से, लदाख, हिमाचल, दिल्ली, उत्तरी पंजाब, उतरी एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, गुजरात व महाराष्ट्र के कुछ हिस्से, एवं पश्चिम राजस्थान, जोन-3 में केरल, लक्षद्वीप, उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से, गुजरात, बंगाल के कुछ हिस्से, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, कर्णाटक, तथा जोन-2 में देश के शेष हिस्से और दक्षिण भारत का बड़ा भू-भाग आता है ।

सम्पूर्ण हिमालयी रेंज भूकंप की अति तीव्रता वाले दायरे में आते हैं । सन् 1897 में शिलौंग (8.7 रिक्टर स्केल), 1905 में कांगड़ा (8.0 रिक्टर स्केल), 1934 में बिहार-नेपाल (8.3 रिक्टर स्केल), व 1950 में असम-तिब्बत (8.6 रिक्टर स्केल) में बड़े भूकंप के झटके आये थे ।

Er Prabhat Kishore, Patna

Mob-8544128428

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