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यह कविता नहीं, यह चार्जशीट है…
Sudhir Dhawale
बैंक के दरवाज़े पर
आज कोई ग्राहक नहीं आया
आज एक सवाल आया है
उसके हाथ में पासबुक नहीं
एक कंकाल है
वो फॉर्म नहीं भर सकता
वो हस्ताक्षर नहीं कर सकता
पर उसने इतिहास पर
एक गाढ़ा निशान बना दिया है
हड्डियों से
कब्र की मिट्टी अभी भीगी थी
जैसे बहन की आख़िरी साँसें
धरती में फंसी रह गई हों
और एक भाई
अपने ही खून की हड्डियाँ खोदता हुआ
राज्य के दरवाज़े पर दस्तक दे रहा था
“सबूत लाओ : जिंदा या मरा हुआ”
काग़ज़ों के जंगल में बैठे
मुँह में नियमों की कील ठोके अफ़सरों ने कहा
कहते हैं
यह ‘प्रणाली’ है
नियम हैं, प्रक्रिया है, कानून है…
पर आज
एक गरीब आदिवासी ने
तुम्हारे नियमों को
अपनी बहन की हड्डियों में लपेटकर
तुम्हारे सामने पटक दिया है
तुम कहते हो
“खाता धारक आएगा, तभी पैसा मिलेगा।”
वो पूछता है
“मरने के बाद कौन आता है?”
तुम्हारे पास कोई जवाब नहीं
सिर्फ़ खामोशी है
और वो भी
एसी के भीतर बैठी हुई
दो महीने तक
वो तुम्हारे दरवाज़े पर
इंसान बनकर आता रहा
तुमने उसे भगा दिया
आज वो कंकाल बनकर आया है
और तुम डर गए
सुनो
यह डर उसी का है
जिसे तुमने पैदा किया है
यह कंकाल
सिर्फ़ एक बहन का नहीं
तुम्हारी इंसानियत का है
जो कब की मर चुकी है
गाँव वालों ने उसे पागल कहा
बैंक वालों ने नियम बताया
पुलिस ने मामला बनाया
पर किसी ने नहीं देखा
कि यह आदमी
दरअसल सबसे होशियार है
क्योंकि उसने समझ लिया है :
इस देश में
ज़िंदा इंसान की कोई पहचान नहीं
पर मरे हुए शरीर का
पोस्टमॉर्टम हो सकता है
यहाँ इंसान नहीं
लाशें ही मान्य दस्तावेज़ हैं
यह सिर्फ एक भाई नहीं
यह पूरे समाज की उघड़ी हुई नस है
जिससे खून नहीं
व्यवस्था की सड़ांध टपक रही है
कब्र से निकला कंकाल
अब सिर्फ बहन का नहीं रहा
वह इस लोकतंत्र की रीढ़ है
जो बहुत पहले टूट चुकी थी
आज वो खड़ा है भीड़ के बीच
हँसी और डर के बीच
एक सवाल बनकर
“अब मानोगे?”
और सत्ता?
वो सिर झुकाकर फाइल पलट रही है…
क्योंकि
उसके पास हर मौत का रिकॉर्ड है
पर हर अन्याय का नहीं
यह कविता नहीं यह चार्जशीट है
जिसमें आरोपी है :
तुम्हारी व्यवस्था
तुम्हारा कानून
और वो पूरा ढांचा
जो गरीब से कहता है
“पहले मरने का सबूत लाओ
फिर जीने का हक़ मिलेगा।”
(28 अप्रेल 2026)




















