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सहायता परम धर्म
हम सब जानते है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। इस नाते हर व्यक्ति को एक दुसरे की आवश्यकता होती है। व्यक्ति अमीर हो या गरीब, शिक्षित हो या अशिक्षित, छोटा हो या बड़ा सभी को एक दुसरे की आवश्यकता होती है। इसलिए समाज मे रहने वाले एक – एक व्यक्ति महत्वपूर्ण होता है क्योंकि कब किसकी आवश्यकता पड़ जाए यह कोई नही जानता। यह सर्वविदित है कि दुनिया को भवसागर से पार उतारने वाले भगवान श्रीराम को भी मात्र सरयू नदी पार होने के लिए केवट की आवश्यकता पड़ गई थी। सामाजिक प्राणी होने के नाते हमारा पहला कर्तव्य है एक दुसरे की सहायता करना। त्रेता युग मे सुग्रीव तथा समस्त वानर सेना प्रभु श्रीराम की सहायता की थी। इतना सहायता करने की सामर्थ्य व शक्ति हम मे तो नहीं है परन्तु कहने का तात्पर्य यह है कि हम भी एक दुसरो की छोटी – छोटी सहायता कर परम धर्म को अपना सकते है। जिसे हम छोटा समझते है वह जरूरतमंद के लिए बड़ी सहायता हो सकती है जैसे किसी भटके हुए राहगीर को सही राह बता देना उसके लिए बहुत बड़ी सहायता होती है। किसी वृद्ध व्यक्ति को सड़क पार करा देना भी एक सहायता है भले ही यह हमारे लिए छोटी बात है पर उस वृद्ध के लिए बहुत बड़ी सहायता है। सताए हुए को सहारा बनना, हारे हुए को हिम्मत देना, डरे हुए को साहस देना भी परम सहायता है। मोटर वाहन से आते या जाते वक़्त किसी पैदल यात्री को उसके इच्छा पर अपने मोटरवाहन पर सवार कराके उनको आगे तक पहुंचा देना भी बड़ी सहायता है। किसी को सही उपदेश और दिशा दिखाना भी सहायता के श्रेणी मे आता है। किसी असमर्थ व्यक्ति को किसी प्रकार की प्रपत्र भर देना, आवेदन लिख देना, समस्या सुलझा देना, वाहन मे यात्रा के दौरान बुजुर्गों के लिए सीट छोड़ देना, इत्यादि- इत्यादि सहायता करना हमारा परम कर्तव्य होना चाहिए। निस्वार्थ भाव से सहायता कर मन मे जो सुकून मिलती है उसकी तुलना हम नही कर सकते है अर्थात परमानन्द मिलती है। हमें अपने सामर्थ्य के अनुसार जब चाहे, कही भी सच्ची निस्वार्थ भाव से सहायता करने से पीछे नही हटना चाहिए।
पवन कुमार शर्मा ( शिक्षक)
दुमदुमा (असम)
मो.नं.9954327677




















